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त्वरित टिप्पणी | अपराधियों में कितना डर पैदा कर पाएगी निर्भया के दोषियों को हुई फांसी?

Anil Rai | News18Hindi
Updated: March 20, 2020, 11:53 AM IST
त्वरित टिप्पणी | अपराधियों में कितना डर पैदा कर पाएगी निर्भया के दोषियों को हुई फांसी?
निर्भया के मां-पिता (PTI)

जिस तरह निर्भया के दोषियों (Nirbhaya Case) को फांसी चढ़ने में करीब 8 साल वक्त लगा उससे शायद अपराधियों में उस तरह का डर नहीं पैदा हुआ, जिसकी उम्मीद 2012 में सड़कों पर उतरी देश की युवा पीढ़ी कर रही थी.

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  • Last Updated: March 20, 2020, 11:53 AM IST
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निर्भया के दोषियों (Nirbhaya Case) को आखिरकार लंबी लड़ाई के बाद फांसी की सजा हो गई. चारों दोषियों को आज सुबह तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया. इस मामले में एक अपराधी ने पहले ही आत्महत्या कर ली थी, जबकि एक नाबालिग अपनी सजा पूरी कर आजाद हो चुका है. अभी सवाल है कि क्या इस सजा के बाद इस तरह के अपराध करने वाले अपराधियों के मन में कानून और सजा का डर पैदा होगा, क्योंकि न्याय का सिद्धांत यह भी कहता है कि अपराध का दंड इस तरह का हो जिससे आने वाले समय में अपराध करने वाले डर के कारण उस तरह का अपराध न करें, लेकिन जिस तरह निर्भया के दोषियों को फांसी चढ़ने में करीब 8 साल वक्त लगा उससे शायद अपराधियों में उस तरह का डर नहीं पैदा हुआ, जिसकी उम्मीद 2012 में सड़कों पर उतरी देश की युवा पीढ़ी कर रही थी.

कब पैदा होगा अपराधियों में कानून का डर
एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें, तो देश भर में 2018 में 33356 बलात्कार के केस दर्ज हुए. यानी देश में रोज 91 बलात्कार के मामले दर्ज हो रहे हैं. ये आंकड़ा सिर्फ उन घटनाओं का है, जिनमें मामले पुलिस तक पहुंचे और मुकदमा दर्ज हुआ. जबकि, तस्वीर इससे भी भयावह है. साल में बलात्कार के हजारों मामले ऐसे होते हैं, जो थाना-पुलिस तक पहुंचे ही नहीं और पहुंच जाते भी है तो मामला दर्ज नहीं होता. ये आंकड़े तस्दीक कर रहे हैं कि देश में अपराधियों में कानून का वो डर नहीं है.

आखिर क्यों हुई इतनी देरी?



16 दिसंबर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया केस ने पूरे देश को हिला दिया था. शायद देश में ये पहला मामला था, जिसमें किसी अपराध के बाद पूरा देश सड़कों पर उतर आया हो. इस आंदोलन की खासियत ये रही कि इसमें कोई नेता नहीं था. देश की युवा पीढ़ी इसके लिए लड़ रही थी, देश के आम आदमी अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए सड़क पर था. पहली बार किसी आंदोलन में इतना गुस्सा दिखा था.



सरकार पर इस आंदोलन का असर भी हुआ आनन-फानन में इस पूरे मामले के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया गया. दिल्ली पुलिस ने भी इस मामले में सिर्फ 17 दिनों में यानी 3 जनवरी 2013 को सभी आरोपियों के खिलाप चार्जशीट फाइल कर दी.

फास्ट ट्रैक कोर्ट नें भी करीब 9 महीने में यानी 13 सितंबर 2013 को इन दोषियों को मौत की सजा सुना दी. दिल्ली हाईकोर्ट ने फास्ट ट्रैक कोर्ट की सजा पर 6 महीने बाद यानी 13 मार्च 2013 को मुहर लगाया था. यानी अपराध होने से हाईकोर्ट तक सजा के अनुमोदन होने तक में करीब 16 महीने लग गए, लेकिन इस सजा को अमली जाना पहुंचाने में 8 साल का वक्त लग गया. ऐसे में सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस से लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट और सरकार सबने ठीक से काम किया, तो इतने जघन्य अपराध की सजा में इतनी देरी क्यों हुई?


आखिर कैसे पैदा होगा अपराधियों में सजा का डर?
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट होते हुए मामला राष्ट्रपति तक पहुंचा. कई बार तारीखें पड़ी और फाइलें भी यहां से वहां गईं, लेकिन आखिरकार निर्भया की जीत हुई. सवाल ये है इस पूरे प्रकरण में निर्भया की मां आशा देवी और देश भर की मीडिया जिस तरह खड़ी रही, क्या हर मामले में वो इस तरह खड़ी रह पाएगी? क्या हर परिवार इस तरह की लड़ाई लड़ पाएगा? इसका जबाव फिलहाल तो न में ही दिख रहा है.

ऐसे में देश के कानून बनाने और कानून का पालन कराने वालों पर जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि इस तरह का कानून बने की पीड़ित को ही बार-बार कोर्ट के चक्कर न लगाने पड़े. साथ ही इस कानून का पालन भी सही तरिके से हो, क्योंकि जब तक अपराध और सजा का आंकड़ा बराबर नहीं होगा, यानी हर अपराधी को सजा नहीं होगी, तब तक देश में न तो सजा का डर पैदा होगा न ही कानून का राज हो पाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: March 20, 2020, 10:05 AM IST
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