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OPINION| क्या अब 'गैर हिंदू' कर सकेंगे जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश?


6 सितंबर 2017 को रथ यात्रा के पूर्व पुजारी भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की पूजा करते हुए

6 सितंबर 2017 को रथ यात्रा के पूर्व पुजारी भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की पूजा करते हुए

जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं को जाने की इज़ाजत नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि पूरी जांच परख के बाद गैर हिंदुओं को भी मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए.

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    संदीप साहू
    ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रतिभा रे एक घटना को याद करते हुए बताती हैं कि दिसंबर 1987 में एक बार वह पुरी के जगन्नाथ मंदिर गई थीं. उनके साथ एक महिला भी थी. महिला के गोरे रंग की वजह से वहां मौजूद पंडों को शक हुआ कि वह गैर-हिंदू है, जिसकी वजह से उनके साथ बेहद बुरा बर्ताव किया गया, गंदे शब्दों का प्रयोग किया गया और धक्का-मुक्की भी की गई. चूंकि महिला उत्तर भारत से थी, उसका रंग साफ था, इसलिए शायद सेवादारों को शक हुआ कि वह हिंदू धर्म से नहीं.

    वह बताती हैं कि उस दिन उन्होंने कसम खाई थी कि अब वह कभी इस मंदिर में कदम नहीं रखेंगी. तब से लेकर आज तीन दशक बीत चुके हैं और प्रतिभा रे 12वीं सदी की इस मंदिर के नियमों में बदलाव को लेकर संघर्ष कर रही हैं.

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    विश्व विख्यात इस मंदिर में जारी इस नियम के कारण सुप्रीम कोर्ट को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि दूसरे धर्मों के लोगों को भी पूरी तरह से जांच-परख (स्क्रूटिनी) करने के बाद मंदिर में अंदर जाने की अनुमति देनी चाहिए. लेकिन इस मुद्दे पर सेवादार और उनके समर्थक सुप्रीम कोर्ट का भी विरोध करने पर उतारू हो गए हैं. वे लोग लंबे समय से चले आ रहे नियमों को परंपरा के नाम पर बदलना नहीं चाहते.

    जगन्नाथ संस्कृति के एक्सपर्ट पंडित सूर्यनारायण शर्मा का कहना है, "यह ईशनिंदा है. मंदिर के बाहर एक नोटिस लगा हुआ था, जिसमें लिखा हुआ था कि केवल 'कट्टर हिंदूओं' को ही अंदर आने की अनुमति है. हमने इस नियम को और हल्का कर दिया जिससे अब सारे ही हिंदू इसमें प्रवेश पा सकते हैं. यह हिंदू और जगन्नाथ संस्कृति के खिलाफ है, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता."

    सेवादार सदियों से अपनी मान्यताओं से ज़रा सा भी नहीं हिले हैं. 17वीं सदी में भगवान जगन्नाथ के प्रसिद्ध भक्त सालबेग के लिए भी मंदिर के दरवाज़े बंद थे, क्योंकि वह मुस्लिम थे. सालबेग ने भगवान जगन्नाथ के लिए काफी भजन भी लिखे थे. यहां तक कि रथयात्रा के दौरान सालबेग की समाधि के सामने आज भी रथ को रोका जाता है, लेकिन उन्हें कभी मंदिर में घुसने की अनुमति नहीं दी गई. यही नहीं सन 1900 में भारत के तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया. उस समय ब्रिटिश अंपायर का भारत पर राज था.

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    इसके बावजूद गुरुवार को पुरी जिला अदालत द्वारा सुझाए गए 12 सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार करने के बाद भी सेवादार पूरी तरह से विरोध की मुद्रा में हैं. उन्होंने मंदिर प्रशासन सहित आज तक किसी की बात नहीं मानी चाहे वो कोई प्राधिकारी हो या कि राज्य सरकार.

    यही नहीं महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और आंबेडकर को भी मंदिर में प्रवेश से रोका गया. 1934 में महात्मा गांधी को मंदिर में इसलिए प्रवेश नहीं करने दिया गया, क्योंकि उनके साथ कुछ मुस्लिम और ईसाई थे. और पारसी (फिरोज़ गांधी) से शादी करने की वजह से इंदिरा गांधी को भी 1984 में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई. इंदिरा गांधी ने भी इस मुद्दे को तूल देना उचित नहीं समझा और मंदिर में प्रवेश करने के लिए दबाव नहीं बनाया, बल्कि मंदिर के सामने स्थित लाइब्रेरी से दर्शन किया.

    'संविधान के पिता' कहे जाने वाले डॉ. बीआर अंबेडकर को भी 1945 में मंदिर में प्रवेश देने से मना किया गया था. ये स्वतंत्रता के तुरंत पहले की बात है जब मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता था. स्वतंत्रता के बाद ही जगन्नाथ मंदिर सहित भारत के कई मंदिरों में दलितों को प्रवेश की अनुमति दी गई.

    हाल ही में 18 मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जगन्नाथ मंदिर के दर्शन किए. उस समय ये कयास लगाए जा रहे थे कि कहीं सेवादारों द्वारा उनके साथ भी तो बुरा बर्ताव तो नहीं किया जाएगा.

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    सेवादारों की 'गैर-हिंदूओं' की अपनी ही परिभाषा है. भले ही इस्कॉन ने जगन्नाथ यात्रा को पुरी से लेकर पूरे विश्व में फैलाया हो, लेकिन इसके संस्थापक प्रभुपाद जी 1977 में जब दर्शन के लिए पुरी गए तो उन्हें मंदिर में प्रवेश देने से मना कर दिया गया, क्योंकि पुजारियों का मानना था कि वो 'गैर-हिंदू' हैं.

    एक्सपर्ट्स और भक्तों का कहना है कि जगन्नाथ रथ यात्रा इसीलिए निकाली जाती है कि जो लोग मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते वो लोग भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर सकें. लेकिन जुलाई 2013 में रथयात्रा के दौरान जब ओडिसी डांसर पद्मश्री इलियाना सिटारिस्टी ने रथ पर चढ़ना चाहा तो दो पुजारियों ने उन्हें धकेलने की कोशिश की. इलियाना इटैलियन मूल की हैं, लेकिन अब वो भारत में हीं बस गई हैं और ओडिशा में ही रहती हैं.

    पूर्व में जिन लोगों को 'गैर-हिंदू' होने या जिनके साथ किसी 'गैर-हिंदू' होने के कारण मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया उनकी फेररिस्त बहुत लंबी है और सेवादारों का रवैया देखते हुए ऐसा लगता है कि ये लिस्ट और भी लंबी होने वाली है.

    चूंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ सलाह ही दिया है इसलिए राज्य सरकार ही मज़बूत नियम बनाकर इन पावरफुल पंडों के खिलाफ लड़ सकती है. हालांकि नवीन पटनायक सरकार के लिए ये एक बड़ी चुनौती है.

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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