2024 पर टिकी हैं गांधी परिवार की निगाहें, क्या पीके का जादू 'खेला' करेगा?

रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर का करियर काफी शानदार रहा है. (फाइल फोटो)

Prashant Kishor ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यहां तक सलाह दी कि उन्हें कब और क्या बोलना है. साथ ही ब्लॉक से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर नियुक्तियों में भी प्रशांत किशोर ने सलाह दी.

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    नई दिल्ली. कहावत है कि मुश्किल समय में मुश्किल फैसले लेने होते हैं... और ये बात कांग्रेस के लिए बिल्कुल सटीक बैठती है. 2017 के यूपी चुनाव में प्रशांत किशोर के साथ अनबन के बावजूद कांग्रेस (Congress) को अब समझ आ गया है कि अस्तित्व बचाने की लड़ाई में उसे किशोर (Prashant Kishor) के जादू की जरूरत है. पिछले यूपी चुनाव के समय कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने प्रशांत किशोर पर पार्टी के शीर्ष कमान को भ्रमित करने का आरोप लगाया था. कांग्रेस के शीर्ष सूत्रों ने न्यूज18 को बताया है कि गांधी परिवार और प्रशांत किशोर के बीच बातचीत का एजेंडा बड़ा है और 2024 के चुनावों के इर्द गिर्द जाल बुनने की कवायद है. साथ ही यह भी कि कैसे कांग्रेस को खड़ा किया जा सकता है और बीजेपी के खिलाफ विपक्षी फ्रंट में कांग्रेस की भूमिका क्या होगी.

    प्रशांत किशोर के साथ गांधी परिवार की मीटिंग में सोनिया गांधी का मौजूद रहना महत्वपूर्ण है, क्योंकि विपक्ष के ज्यादातर नेता उनके साथ डील करना पसंद करते हैं. सूत्रों के मुताबिक सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने पूछा कि कांग्रेस को कैसे मजबूत किया जा सकता है. साथ ही पार्टी को नीचे से ऊपर तक कैसे खड़ा किया जाए. इस पर भी बात हुई है. ये एक ऐसा मुद्दा है, जिसे कांग्रेस के असंतुष्ट जी-23 नेताओं ने भी सोनिया गांधी को पत्र लिखकर उठाया था कि जब तक जिला और ब्लॉक स्तर पर संगठन मजबूत नहीं किया जाएगा, पार्टी का नुकसान होता रहेगा.

    प्रशांत किशोर के साथ मीटिंग में एक बड़े एजेंडे को ध्यान में रखते हुए चर्चा हुई कि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन बेहतर क्यों नहीं है. क्यों राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब है और पार्टी खत्म होती जा रही है. साथ ही पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी अब जर्जर दिखाई देती है और समय के साथ खुद में बदलाव नहीं कर पाई. कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान तब हुआ, जब सोशल मीडिया पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उभार ने भगवा पार्टी की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा दिया, साथ ही राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भी बीजेपी को नए कलेवर में सींचा गया.

    कांग्रेस ने बहुत बाद में सोशल मीडिया ज्वॉइन किया और बहुत ज्यादा आक्रामक रही है, ट्रेंड के मामले में भी कांग्रेस का आक्रामक रवैया दिखता है. लेकिन ये सब कभी भी चुनावी जीत में नहीं बदल पाया, जहां तक कि राज्यों के चुनाव की बात है. कांग्रेस पहली नजर में आलसी और जिद्दी नजर आती है और ऐसा लगता है कि पार्टी को पता ही नहीं है कि किन मुद्दों को उठाना है. साथ ही कांग्रेस नेताओं के अलग-अलग बयान भी पार्टी को नुकसान पहुंचाते हैं, इसमें अंदरूनी झगड़े, अहंकार, अति महत्वाकांक्षा और गलतफहमी... आग में घी का काम करते हैं. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि यही वो कारण है, जिसके चलते क्षेत्रीय पार्टियां लगातार देश की सबसे पुरानी पार्टी को दबाए जा रही हैं.

    कांग्रेस की मुसीबतें तब और बढ़ जाती हैं जब पार्टी के बड़े नेता दल बदल लेते हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जैसे नेताओं के पार्टी बदलने को भले ही गद्दारी कहा गया हो, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर उसके असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सच तो ये है कि कांग्रेस पार्टी उन नेताओं को भी आकर्षक नहीं लगती है, जो बिना किसी उम्मीद के पार्टी शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों का इंतजार करते हैं.

    ऐसे समय में कांग्रेस का एक धड़ा, किसी बाहरी को पार्टी में सांगठनिक सुधार की जिम्मेदारी देने के खिलाफ है. लेकिन पार्टी को लगता है कि वो समय आ गया है, जब किसी बाहरी को सियासी बिसात पर कांग्रेस की फील्डिंग करने का मौका दिया जाए. लेकिन, ये सब आसान नहीं है. प्रशांत किशोर के करीबी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी को लेकर प्रशांत किशोर के अनुभव अलग हैं और अगर वो पार्टी से जुड़ते हैं, तो ये सशर्त होगा और वो चाहेंगे कि पश्चिम बंगाल की तरह उन्हें खुली छूट दी जाए.

    पश्चिम बंगाल में, प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यहां तक सलाह दी कि उन्हें कब और क्या बोलना है. साथ ही ब्लॉक से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर नियुक्तियों में भी प्रशांत किशोर ने सलाह दी. कांग्रेस की ही तरह, तृणमूल कांग्रेस में भी प्रशांत किशोर को लेकर असहमतियों के स्वर बुलंद थे और उनके काम करने की शैली की आलोचना की गई, लेकिन जैसे ही विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को शानदार जीत दिलाई... पीके के आलोचकों के मुंह पर ताले लग गए.

    कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के मामले में भी ऐसा हो सकता है. सूत्रों ने कहा कि जल्द ही कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे. सबसे महत्वपूर्ण बात कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा, इस मसले को भी जल्द ही सुलझा लिया जाएगा. जी-23 ग्रुप के असंतुष्ट नेताओं ने अपने पत्र में कहा था कि पार्टी में कोई क्लियर लीडरशिप नहीं होने की वजह से कांग्रेस की नैया डूब रही है. इसी डूबती सियासी नैया को बचाने के लिए कांग्रेस प्रशांत किशोर को पतवार थमाने की सोच में है.

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