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OPINION: MNS के साथ BJP! क्या खुद को प्रासंगिक बनाये रख पाएगी शिवसेना

News18Hindi
Updated: March 18, 2020, 3:50 PM IST
OPINION: MNS के साथ BJP! क्या खुद को प्रासंगिक बनाये रख पाएगी शिवसेना
उद्धव ठाकरे की फाइल फोटो

पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता चंद्रकांत खैरे (Chandrakant Khaire) और कई दिग्गज नेताओं और शिवसैनिकों की स्पष्ट बेचैनी शिवसेना को पुराने दिनों में वापस ले जा सकती है.

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धवल कुलकर्णी
'वरिष्ठों की भी जरूरत होती है. सिर्फ नये खून से मदद नहीं मिलेगी....' यह बयान शिवेसना (Shiv sena) के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता चंद्रकांत खैरे (Chandrakant Khaire) के हैं. मीडिया को दिये इस बयान से यह झलक मिल रही है कि पार्टी में सब कुछ सही नहीं है. यह बयान पीढ़ियों के बीच हो रहे बंटवारे की ओर भी इशारा करते हैं. हाल ही में जनता ने कांग्रेस के भीतर नये और पुराने नेताओं के बीच कलह को देखा जिसके परिणामस्वरूप ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और कमलनाथ की सरकार भी खतरे में डाल दी. शिवसेना भी ऐसी ही पीढ़ियों के बीच विचारों के अंतर से गुजर रही है.

शिवसेना के वरिष्ठों का दावा है कि खैरे के पास नाराज होने की वजह भी है. बीते साल संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम के इम्तियाज जलील से मात खाने वाले खैरे चार बार के सांसद रह चुके हैं. इसी साल मार्च में शिवसेना के राज्यसभा सांसद राजकुमार धूत का कार्यकाल खत्म हुआ. कांग्रेस से आए प्रियंका और खैरे के बीच राज्यसभा में नामांकन के लिए नूराकुश्ती चल रही थी. हालांकि शिवसेना ने प्रियंका को टिकट दिया. पूर्व कांग्रेस प्रवक्ता चतुर्वेदी ने बीते साल लोकसभा चुनाव के पहले शिवसेना में शामिल हुईं. माना जाता है कि उन्हें महाराष्ट्र के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे का समर्थन हासिल है. बतौर राज्यसभा सांसद चतुर्वेदी दिल्ली में शिवसेना का चेहरा होंगी और अंग्रेजी-हिन्दी मीडिया में पार्टी का पक्ष रख सकेंगी.

जब शिवसेना ने कट्टर हिंदुत्व की ओर कदम बढ़ाया..



शिवसेना प्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे, पार्टी के मामलों में अपनी दखल बढ़ा रहे हैं. आदित्य के बारे में कहा जाता है कि वह पार्टी को आधुनिक रूप देने के लिए आगे आ रहे हैं. हालाँकि, इसे पार्टी के पारंपरिक वोटबेस के साथ असहमति के रूप में देखा जाता है. शिवसेना का जन्म मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में मराठी भाषियों के गुस्से के कारण हुआ था. 1980 के दशक में शिवसेना ने कट्टर हिंदुत्व की ओर कदम बढ़ाया.



पार्टी की युवा सेना के मुखिया आदित्य ठाकरे पार्टी का मेकओवर करना चाहते हैं. यहां तक कि पार्टी के आलोचक भी चाहते हैं कि इसके भीतर बदलाव हों. शिवसेना का चुनाव क्षेत्र मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में सिकुड़ रहा है. विडंबना यह है कि ऐसा पार्टी की निगरानी में हो रहा है. इसे अपने चुनावी दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता है.

शिवसेना को अपना दायरा बढ़ाने की करनी होगी कोशिश
पार्टी का एजेंडा महाराष्ट्रीयनों और पहली बार के मतदाताओं के साथ भी नहीं है जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पसंद करते हैं. प्रासंगिक बने रहने और भारत की वित्तीय राजधानी पर अपना नियंत्रण रखने के लिए, शिवसेना को अपने चुनावी दायरे को बढ़ाने के लिए नये क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनाने की जरूरत है.

हालांकि जिस तरह से खैरे का गुस्सा बाहर आया है ऐसे में यह दिख रहा है कि शिवसेना में बदलाव जिस तरह से दावा किया गया था यह उतना आसान है नहीं. ट्रांजिशन फेज के दौरान पार्टी में बेचैनी साफ दिख रही है. साल 2014 में खैरे अपने चार दशक जूनियर आदित्य के पैर छूते हुए देखा गया. हालांकि अब खैरे ने हाईकमान के विकल्पों की आलोचना करते हुए अपनी बातों का खंडन नहीं किया है, और पिछले साल के राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को बोर्ड में शामिल करने पर भी सवाल उठाया.

मराठवाड़ा क्षेत्र में जड़ें जमाईं
पार्टी में इस असहमति का एक महत्वपूर्ण पहलू है. उद्धव द्वारा पार्टी को 'उदारीकृत' करने के पिछले प्रयासों को ज्यादा सफलता नहीं मिली, जिससे शिवसेना के भीतर ये प्रतिस्पर्धा कम हो गई है. 30 साल से अधिक वर्षों से शिव सैनिक खैरे शिवसेना के नगरसेवकों के पहले बैच से 1988 में औरंगाबाद नगर निगम के लिए चुने गए थे. अपने पारंपरिक मुंबई-थाणे बेल्ट के बाहर, शिवसेना ने पहली बार मराठवाड़ा क्षेत्र में जड़ें जमाईं जिसमें औरंगाबाद भी शामिल है.

सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मराठवाड़ा हैदराबाद के निजाम के प्रभुत्व में था और मुसलमानों का प्रतिशत काफी अधिक था. 1980 के दशक में मराठवाड़ा में शिवसेना के विस्तार ने आक्रामक हिंदुत्व में ताकत झोंक दी. औरंगाबाद को शिवसेना के हिंदुत्व के अपने प्रयोगों की प्रयोगशाला रूप में कहा जा सकता है.

शिवसेना के भाजपा से अलग होने के बाद, और इसके कट्टरपंथी एजेंडे के कमजोर पड़ने के बाद, इस मुद्दे पर अपने पूर्व सहयोगी को शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहा है. औरंगाबाद नगर निगम चुनाव भाजपा के लिए प्रमुख मौका होगा जब वह ध्रुवीकरण एजेंडे की टेस्टिंग कर सकती है.

औरंगाबाद में भाजपा, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ समझ बनाने की कोशिश कर रही है, जिसका नेतृत्व उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे कर रहे हैं. एमएनएस सत्ता के लिए कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ गठबंधन के परिणामस्वरूप अपने हिंदुत्व के एजेंडे को कम करने के लिए शिवसेना के स्पष्ट प्रयास द्वारा बनाए गए खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस और एनसीपी के मुकाबले उन्हें हार का सामना करना पड़ा
खैरे और कई दिग्गज नेताओं और शिवसैनिकों की स्पष्ट बेचैनी शिवसेना को पुराने दिनों में वापस ले जा सकती है. 2003 में उस समय शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष रहे उद्धव ने गैर-महाराष्ट्रीयनों, विशेष रूप से हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों को पार्टी में आकर्षित करने के लिए 'मी मुंबाइकर' नामक एक महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया. यह अभियान शहर की बदलती जनसांख्यिकीय और राजनीतिक वास्तविकताओं को दिखा रहा था. यह शिवसेना के अपने मूल वोट आधार से दूर जाने का जोखिम था.

इस अभियान के कारण पार्टी के भीतर बेचैनी दिखाई दी. उसी साल राज ठाकरे अपने चचेरे भाई से नाराज चल रहे थे. बतौर भारतीय विद्यार्थी संगठन नेता उन्होंने उत्तर भारतीयों पर हमला किया, जो कल्याण की रेलवे भर्ती परीक्षाओं के लिए आए थे. मुंबई में उत्तर भारतीय समुदायों के भीतर हमले बढ़ गए और अगले साल के विधानसभा चुनावों में, उन्होंने शिवसेना-भाजपा गठबंधन के खिलाफ निर्णायक रूप से मतदान किया, जिससे कांग्रेस और एनसीपी के मुकाबले उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

2005 में राज ने शिवसेना छोड़ने के बाद मनसे को लॉन्च किया. उद्धव ने भोजपुरी सम्मेलन और लाई चना कार्यक्रमों के माध्यम से उत्तर भारतीयों के प्रति अपने दृष्टिकोण में नयापन लाने की कोशिश की लेकिन साल 2008 में ऐसा नहीं हुआ और इसका नुकसान शिवसेना को उठाना पड़ा.

अब शिवसेना को नए खतरों से जूझना पड़ रहा है.भाजपा देश भर में ध्रुवीकरण के रथ पर सवार है. मनसे शिवसेना की जगह हथियाने की कोशिश में है. शिव सेना के भीतर पुराने नेता भी असहज है. ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या क्या शिवसेना अपने प्रस्तावित बदलाव को तार्किक अंत तक ले जा पाएगी? या इतिहास 2003 और 2008 की तरह खुद को दोहराएगा? (यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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First published: March 18, 2020, 3:45 PM IST
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