सिर्फ ये शख्स करवा सकता है जम्मू-कश्मीर का नया परिसीमन और PoK में विधानसभा चुनाव!

2002 में अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1957 और जम्मू-कश्मीर के संविधान में बदलाव कर नए परिसीमन को रद्द कर दिया था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया था. लेकिन अब फिर से परिसीमन के प्रयास की सुगबुगाहट है.

News18Hindi
Updated: June 4, 2019, 11:21 PM IST
सिर्फ ये शख्स करवा सकता है जम्मू-कश्मीर का नया परिसीमन और PoK में विधानसभा चुनाव!
गृहमंत्री अमित शाह के साथ जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक (फाइल फोटो)
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Updated: June 4, 2019, 11:21 PM IST
गृहमंत्री बनने के बाद से अमित शाह लगातार एक्शन में हैं. सूत्रों के मुताबिक अब वे जम्मू-कश्मीर में परिसीमन आयोग के गठन पर विचार कर रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार परिसीमन 1995 में हुआ था. 1995 में राज्यपाल जगमोहन के आदेश पर जम्मू-कश्मीर में 87 सीटों का गठन किया गया था. वहीं चुनाव आयोग ने भी जम्मू-कश्मीर में साल के आखिरी में चुनाव कराने की बात कह दी है.

दरअसल जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान है. इस संविधान के मुताबिक हर 10 साल बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया जाना चाहिए. ऐसे में राज्य में सीटों का परिसीमन 2005 में होना था लेकिन राज्य में 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला की सरकार ने इस पर 2026 तक रोक लगा दी थी. 2002 में अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू-कश्मीर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1957 और जम्मू-कश्मीर के संविधान में बदलाव करते हुए यह फैसला लिया था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया था. लेकिन अब फिर से परिसीमन के प्रयास किए जाने की बात चल रही है.

परिसीमन के मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती ने यह ट्वीट किया


इससे परेशान हैं महबूबा मुफ्ती

इस मामले में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने एक ट्वीट कर इस मामले में अपनी परेशानी जाहिर की है. उन्होंने लिखा है, जम्मू-कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों को पुर्नसीमन की भारत सरकार की योजना के बारे में सुनकर परेशान हूं. थोपा हुआ परिसीमन राज्य के एक और भावनात्मक विभाजन को सांप्रदायिक आधार पर भड़काने का एक स्पष्ट प्रयास है. पुराने घावों को ठीक करने के बजाए इसका मकसद कश्मीरियों के दर्द को और बढ़ाना है.

इस तरीके से कराया जा सकता है परिसीमन
जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के प्रमुख प्रोफेसर भीम सिंह का कहना है कि कुछ हठी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को गलत ढंग से उद्धृत किया है. यह कहना की सुप्रीम कोर्ट ने 2026 तक नए परिसीमन पर रोक लगा रखी है, सही व्याख्या नहीं है. राष्ट्रपति शासन के दौरान जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल की शक्तियां भारत के राष्ट्रपति के हस्तक्षेप और आदेशों से प्रभावित हो सकती हैं. ऐसा भारतीय संविधान के आर्टिकल 370 के कारण होता है. NPP प्रमुख ने राष्ट्रपति से विधानसभा के परिसीमन पर राज्य विधानसभा चुनावों से पहले बिना देरी रोक हटाने की सिफारिश की थी.
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पिछले चुनाव में क्या था कश्मीर का हाल?
साल 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 87 सीटों में पीपुल्स डेमोक्रे‌टिक पार्टी (PDP) ने 28, बीजेपी ने 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने 15, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने 12 व दूसरी छोटी पार्टियों व निर्दलीय उम्मीदवारों ने सात सीटें जीती थीं. इसके बाद बीजेपी और पीडीपी ने चुनाव बाद गठबंधन कर पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में सरकार बनाई थी, लेकिन साल 2018 में बीजेपी ने पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया और अब दिसंबर तक जम्मू-कश्मीर में फिर से विधानसभा होने की सुगबुगाहट है. इसके पहले ख़बर आई थी बीजेपी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चुनाव कराने को चुनावी मुद्दा भी बनाएगी.

अभी जम्मू-कश्मीर में कितनी सीटें
जम्मू-कश्मीर में कुल 111 सीटें हैं लेकिन 24 खाली हैं. दरअसल ये 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर क्षेत्र में आती हैं. जिन्हें जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक खाली छोड़ा गया है. बाकी पर चुनाव होता है. इनमें 46 कश्मीर डिवीजन में आती हैं, जबकि 37 सीटें जम्मू और चार सीटें लद्दाख डिवीजन में हैं. इसके अलावा दो अन्य सीटों पर प्रतिनिधि नामांकित किए जाते हैं.

क्या है प्लान, कैसे होंगे पीओके में चुनाव?
बीजेपी के अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर के निवासी एक तिहाई से ज्यादा लोग एलओसी के इस पार प्रवास कर चुके हैं. ऐसे में अगर वहां के मतदाता इस पार आ रहे हैं तो क्यों नहीं उन्हें मतदान का मौका दिया जाए. इसके लिए बीजेपी ने जिस तरह से कश्मीरी पंडितों के लिए 'एम फॉर्म' की व्यवस्‍था की गई है, उसी तरह से पीओके के प्रवासी भारतीयों के लिए यह व्यवस्‍था सुझाई है.

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एम फॉर्म के अनुसार कश्मीरी पंडित भारत के किसी अन्य क्षेत्र में रहते हुए अपना वोट दे सकते हैं. इसी तरह सुझाया गया है, भारत में रह रहे पीओके से आए लोगों को अपने विधानसभा क्षेत्रों के नाम लिखते हुए चुनाव में शामिल होने की छूट मिले. वे अपने एम फॉर्म में अपने पीओके वाले विधानसभा क्षेत्र की जानकारी दें और वोटिंग में शामिल हों. एम फॉर्म एक विस्तृत फॉर्म होता है जिसमें अपने निवास और नागरिकता को लेकर व्यापक साक्ष्य देने होते हैं.

पीओके में चुनाव का इतिहास
भारत की आजादी से पहले और आजादी वक्त तक कश्मीर राजा हरिसिंह की रियासत हुआ करती थी. लेकिन बंटावारे के समय भूभाग को लेकर विवाद हो गया. बाद में जब जम्मू-कश्मीर विधानसभाओं का परिसीमन हुआ तो पाकिस्तान और चीन ने भारत के 24 विधानसभा क्षेत्रों को कब्जा कर चुके थे. तब इलेक्‍शन कमीशन ने इन 24 विधानसभा क्षेत्रों को रिजर्व रखा है.

पीओके के नागरिक मांगते हैं अपना प्रतिनिधि
जब जम्मू कश्मीर में धारा 370 और 35A लगने के बाद चुनावों की शुरुआत हुई. लेकिन इनमें पीओके में रहने वालों का कोई प्रतिनिधित्व शामिल नहीं हो पाया. बाद में पीओके में रहने वाले लोग हिंसा से बचने के लिए घाटी में आकर रहने लगे. अब वे अपने अधिकारों के लिए लगातार अपने बीच के लोगों में से कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व मांगते हैं. बीजेपी इसके लिए एक प्लान लेकर आ रही है.

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First published: June 4, 2019, 9:40 PM IST
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