यादें: कैप्‍टन सतीश शर्मा के जाने से सोनिया गांधी ने खो दी इंदिरा-राजीव के समय की अनमोल कड़ी

कैप्‍टन सतीश शर्मा का हुआ निधन. (File pic)

राजीव गांधी के साथ कैप्‍टन सतीश शर्मा की दोस्ती का अंदाजा इसी बात से लगाई जा सकता है कि अगर वह न होते तो प्रियंका गांधी वाड्रा का नाम आज सारिका होता.

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नई दिल्‍ली. कई लोगों के लिए कैप्‍पी थे तो किसी के लिए पंडित जी, लेकिन अब वह नहीं रहे. कैप्टन सतीश शर्मा (Captain Satish Sharma) के निधन से सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) और इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के जीवन और समय की एक अनमोल कड़ी खो दी है. राजीव गांधी के साथ कैप्‍टन सतीश शर्मा की दोस्ती राजनीति में आने से पहले की थी. इंडियन एयरलाइंस में राजीव के दोस्तों की एक विस्तृत मंडली थी, जिसमें 'कैप्‍पी' कैप्‍टन शर्मा और एचआर सिंह भी थे.

संजय गांधी के निधन के कुछ महीनों बाद इंदिरा गांधी के घर से मेनका गांधी के बाहर चले जाने पर एचआर सिंह राजीव गांधी से दूर हो गए, लेकिन कैप्टन सतीश शर्मा राजीव की छाया की तरह उनके साथ तब भी साथ रहे, जब उन्होंने 1981 में अपने छोटे भाई के निधन के बाद राजनीति में प्रवेश किया. कैप्टन शर्मा ने अमेरिका के मिसूरी के कंसैस शहर में पायलट की ट्रेनिंग ली थी, लेकिन राजनीति में शामिल होने के लिए उन्‍होंने यह नौकरी छोड़ दी.

एमएल फोतेदार के अनुसार, सतीश शर्मा अगर राजीव के इतने करीबी नहीं होते तो शायद प्रियंका गांधी का एक अलग नाम हो सकता था- 'सारिका'. इंदिरा गांधी नेहरू परिवार की पूज्‍य 18 भुजाओं वाली देवी सारिका भगवती (अष्टादश) के नाम पर अपनी पोती का नाम रखना चाहती थीं.

इसे किस्‍मत ही कह सकते हैं कि सोनिया गांधी और कैप्टन शर्मा की पत्नी स्‍टेरे एक ही समय गर्भवती थीं. शर्मा को एक बेटी हुई. उन्होंने अपनी बच्‍ची के नामकरण के लिए इंदिरा गांधी से संपर्क किया. फोतेदार  इंदिरा के हवाले से बताते हैं, 'सारिका मेरे दिमाग में थीं और मैं बस इसका जिक्र करने का विरोध नहीं कर सकती थी, इसलिए उनके बच्चे को यह नाम दिया गया.' यह उदाहरण नेहरू-गांधी परिवार से कैप्‍टन शर्मा की निकटता को दर्शाता है.

कैप्‍टन शर्मा विजय धर, ललित सूरी, अमिताभ बच्चन और अरुण सिंह के साथ राजीव गांधी के दरबार के प्रमुख सदस्य बन गए. जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब कैप्‍टन शर्मा का काम मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र अमेठी की देखभाल करने का था. उनका काम राजीव गांधी और मतदाताओं के बीच कड़ी के लिए एक चेहरे की तरह काम करने का भी था. वह अक्सर सोनिया गांधी के साथ अमेठी में मेडिकल सुविधाएं बांटने और अन्य कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत करने के लिए जाते थे. वो लोगों की शिकायतें सुनते थे.

सोनिया उन दिनों राजनीतिक भाषण देने से बचती थीं. 'पति जी को वोट दीजिए (मेरे पति के लिए वोट)', उनके पसंदीदा वाक्यों में से एक था. 1986 में सतीश शर्मा को राज्यसभा में प्रवेश मिला. 7, रेस कोर्स रोड और उसके पास के 5, रेस कोर्स रोड के बीच एक सख्त सीमांकन था जो कि प्रधानमंत्री के घर के अंदर राजीव के कार्यालय और आवास का हिस्सा था.

भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के अधिकारी मणिशंकर अय्यर और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्ला, जो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में थे और सैम पित्रोदा व पी चिदंबरम जैसे करीबी सहयोगियों को भी राजीव गांधी के घर में बेरोक-टोक जाने की अनुमति नहीं थी. मणिशंकर और हबीबुल्ला ने राजीव गांधी के साथ दून स्कूल में पढ़ाई की थी, लेकिन उनकी यह निकटता और मित्रता उनके घर के अंदर प्रवेश के लिए पर्याप्‍त नहीं थी.

कैप्टन सतीश शर्मा ने 7 और 5 के बीच रेस कोर्स रोड पर बिना किसी बाधा के प्रवेश किया. चूंकि वह राजीव के काफी करीब थे तो वह बहुत से लोगों को नापसंद थे. अमेठी के पूर्व राजा संजय सिंह, ऐसे ही प्रमुख नेताओं में से एक थे.

हालांकि कैप्‍टन शर्मा, सुमन दुबे, अमिताभ बच्चन, अरुण सिंह, मोहन थडानी, माइकल अल्बुकर्क जैसे कुछ मुट्ठी भर लोगों के लीग में बने रहे, जिन्हें प्रधानमंत्री का करीबी दोस्त माना जाता था और कभी-कभार प्रधानमंत्री के यहां भोजन करते हुए देखा गया था. माधवराव सिंधिया की तरह उन्हें भी राजीव गांधी से मिलने के लिए पहले एमएल फोतेदार, आरके धवन या वी जॉर्ज की जरूरत नहीं थी.

दोपहर के भोजन के दौरान कैप्‍टन शर्मा चाणक्यपुरी इलाके के होटल अशोका में घूमते और सार्वजनिक चकाचौंध से दूर आखिरी मेज पर कब्जा कर लेते थे. वह चुपचाप सूप पीते और सैंडविच खाते थे. बिल चुकाते थे और वापस 7, रेसकोर्स रोड स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय व निवास पर काम करते थे.

16 अप्रैल, 1987 तक राजीव के लिए चीजें सुचारू रूप से आगे बढ़ रही थीं, जब एक स्वीडिश रेडियो स्टेशन ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया, जिसकी गूंज राजीव के आसपास तक महसूस की गई. राजीव के आसपास के कई लोगों की जिंदगी में उथलपुथल आई और वीपी सिंह ने अपने पूर्व बॉस राजीव के साथ उनके करीबी कैप्‍टन शर्मा को लगातार निशाना बनाया.

राजीव गांधी की हत्या के बाद, सितंबर 1991 में चुनाव आयोग ने अमेठी लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव की घोषणा की जिसका प्रतिनिधित्व राजीव ने किया था. इसके बाद सोनिया ब्रिगेड हरकत में आ गई. रत्नाकर पांडे, एसएस अहलूवालिया और सुरेश पचौरी ने खुले तौर पर प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से कहा कि वो सोनिया को फोन करके राजीव के उत्तराधिकारी के रूप में अमेठी से चुनाव लड़ने के लिए कहें.

(यह आर्टिकल अंग्रेजी से अनुवादित है. इसे पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करें.)

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