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सीबीआईvsसीबीआई: इस 'जासूसी' में नया क्या है ?

सीबीआईvsसीबीआई: इस 'जासूसी' में नया क्या है ?

(File photo)

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हालात तो ये है कि कई बार सरकार में बैठे लोग पार्टी के टिकटों का बटावारा करने, बड़े नेताओं को पद देने के पहले भी खुफिया विभाग की रिपोर्ट का इंतजार करते हैं.

    (अनिल राय)

    सीबीआई बनाम सीबीआई के खेल में 25 अक्टूबर की सुबह बड़ा ड्रामा हुआ. राजधानी की सड़कों पर दिल्ली पुलिस चार लोगों को लगभग घसीटते हुए ले जाती दिखी. इन्हें संदिग्ध कहा गया, जासूस बताया गया. दोपहर बाद ये कथित संदिग्ध आईबी के निकले. मीडिया में हंगामा खड़ा हो गया. लेकिन सीबीआई निदेशक के घर के सामने पकड़े जाने पर आखिर हंगामा क्यों बरपा है? क्या जो कुछ भी सीबीआई चीफ के घर के बाहर हो रहा था वो रूटीन नहीं था?

    दरअसल, जब भी केन्द्र या प्रदेश की सरकार कुछ बड़े राजनीतिक या नौकरशाही के फैसले लेती है, तो उसके असर को जानने के लिए आईबी या एलआईयू के लोगों को उन सबके पीछे लगा दिया जाता है, जिनके किसी कदम का असर सरकार के फैसले पर पड़ रहा हो. ये एक सामान्य प्रक्रिया है.

    ऐसे में सरकारी नजरिए से देखें तो आलोक वर्मा पर नज़र ऱखना तो बनता ही है. देखें तो अपने देश में पुलिस की कार्यप्रणाणी का दुर्भाग्य है कि जिन जांच एजेंसियों को देश विरोधी तत्वों, अपराधियों के पीछे लगा होना चाहिए वो सत्ता में बैठे अपने आकाओं के लिए उनके खिलाफ लगे लोगों की मुखबिरी करने लगती हैं.

    अगर हम लोकल स्तर पर (राज्य सरकारों के अधीन) काम करने वाली पुलिस की खुफिया यूनिट एलआईयू के रोजमर्रा के काम को देखें तो वो नेताओं, मजदूर यूनियनों की सभाओं की रिपोर्ट बनाने, पासपोर्ट वीजा का वेरिफिकेशन करने, आर्म्स लाइसेंस का वेरिफिकेशन करने, नेताओं को सुरक्षाकर्मी देने की रिपोर्ट तैयार करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि जिले के अपराधियों के बारे में सूचना इकट्ठा करने का समय शायद ही मिल पाता हो.

    हालात तो ये है कि कई बार सरकार में बैठे लोग पार्टी के टिकटों का बंटवारा करने, बड़े नेताओं को पद देने के पहले भी खुफिया विभाग की रिपोर्ट का इंतजार करते हैं. राज्य के मुख्यमंत्रियों की दिनचर्या को देखें तो हर मुख्यमंत्री अपने पुलिस प्रमुख से ज्यादा बार खुफिया विभाग के प्रमुख से मिलता है. कुछ राज्यों में तो मुख्यमंत्री से मिलने वाला अंतिम व्यक्ति ही वहां का खुफिया विभाग का प्रमुख होता है. लेकिन उसका मकसद सिर्फ राजनीतिक होता है.


    हालांकि, केन्द्र में बैठी सरकारों पर आईबी के दुरुपयोग का आरोप पहली बार नहीं लगा है. इसके पहले कई बार सरकारों पर राजनीतिक लोगों के फोन टेप कराने और उनकी जासूसी करने के आरोप लगे हैं और कई बार ये टेप और जानकारियां सार्वजनिक भी हुई हैं. लेकिन किसी अधिकारी के घर से आईबी के लोगों का पकड़े जाने की घटना शायद पहली बार हुई है.

    वैसे इस घटना से नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों की याद ताजा हो गई है, जब राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार पर अपनी जासूसी कराने के आरोप लगाए थे. इस एक बात पर ही तब चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी. इस लिहाज से देखें तो समझा जा सकता है कि आलोक वर्मा के घर पर मौजूद चार लोगों का मामला कितना गंभीर है? क्योंकि अब ये आधिकारिक रूप से मान लिया गया है कि वो आईबी के लोग थे. क्योंकि वे वहां क्यों थे, इसकी गृह मंत्रालय की ओर से आई सफाई को कौन स्वीकार करता है और कौन नहीं ये भी महत्वपूर्ण है.

    बहरहाल, सत्ता में बैठा हर व्यक्ति अपने फैसले के असर के बारे में जानना चाहता है. पहले ये काम पार्टी के कुछ खास नेता ही करते थे. लेकिन बाद में जिस तरह कांग्रेस में पार्टी के अंदर इन्दिरा गांधी को बाहर करने की साज़िश हुई, उसके बाद राजनीतिक फैसलों के असर को आंकने का काम भी आईबी जैसी संस्था के जिम्मे आ गया.

    पार्टी और संगठन पर कमजोर पकड़ रखने वाले प्रधानमंत्री हमेशा आईबी की रिपोर्ट के सहारे ही अपने विरोधियों के खिलाफ रणनीति बनाते रहे हैं. धीरे-धीरे ये प्रचलन ऐसा बढ़ा कि अब आईबी जैसी संस्था की प्राथमिकता ही राजनीतिक जासूसी हो गई है.

    Tags: CBI, Central Bureau of Investigation, Congress, Narendra modi, Rafale, Rahul gandhi

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