खुलासा: बना लेकिन लागू नहीं हुआ इंसेफेलाइटिस रोकने का प्रोग्राम, कैसे रुके मासूमों की मौत?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: August 13, 2017, 10:01 AM IST
खुलासा: बना लेकिन लागू नहीं हुआ इंसेफेलाइटिस रोकने का प्रोग्राम, कैसे रुके मासूमों की मौत?
योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस से मर रहे मासूम
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: August 13, 2017, 10:01 AM IST
पूर्वांचल की त्रासदी बन चुका जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) खत्‍म कैसे होगा. जनता के काफी संघर्ष के बाद वर्ष 2012 और 2014 में इंसेफेलाइटिस खत्‍म करने के लिए राष्ट्रीय प्रोग्राम बना, लेकिन अब तक उसे लागू नहीं किया गया है. लगभग सभी सरकारें इस मामले में संवेदनहीन रही हैं.

इस घातक बीमारी को खत्‍म करने के लिए 15 साल से संघर्ष कर रहे इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डॉ. आरएन सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार को यहां के लोगों को कम से कम 40 राउंड खून से खत लिखा है लेकिन यह प्रोग्राम लागू नहीं हुआ. प्रोग्राम दिल्‍ली की अलमारी में बंद है और बच्‍चे मर रहे हैं.

उनका कहना है कि योगी आदित्‍यनाथ ने इंसेफेलाइटिस को खत्‍म करने के लिए सड़क से लेकर संसद तक लड़ाई लड़ी है. प्रोग्राम बनाने के लिए आवाज उठाई है. लेकिन प्रोग्राम बनवाने का काम राहुल गांधी और गुलाम नबी आजाद ने करवाया है. अब इसे लागू करवाने की जिम्‍मेदारी वर्तमान सरकार की है. उसे लागू करना चाहिए.

प्रोग्राम क्‍यों नहीं लागू हुआ, यह पूछने के लिए हमने केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य राज्‍य मंत्री फग्‍गन सिंह कुलस्‍ते से सवाल किया. उन्‍होंने बात सुनी और फोन काट दिया.

gorakhpur hospital, gorakhpur hospital tragedy, baba raghav das medical college, encephalitis, UP news       गोरखपुर में हुई मासूमों की मौत के बाद भी लापरवाही सामने आ रही है.

गोरखपुर क्षेत्र में इंसेफेलाइटिस का पहला मामला 1977 में सामने आया था. यह बीमारी अब तक लगभग 18 हजार मासूमों की जान ले चुकी है. इसके बावजूद अब तक प्रोग्राम ठंडे बस्‍ते में है. पिछले कुछ समय से हर साल औसतन 600 लोग इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं. हालांकि डॉ. सिंह बताते हैं कि यह आंकड़ा सिर्फ मेडिकल कॉलेज का है. असल में करीब एक लाख बच्‍चों की मौत हो चुकी है.

हर साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक यह बीमारी मौत का तांडव लेकर आती है. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज इसकी वजह से मौत का अस्‍पताल बना रहता है. अपने बच्‍चों के जीवन की उम्‍मीद लेकर मेडिकल कॉलेज आने वाले लोग अक्‍सर यहां निराश होते हैं.

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क्‍यों संवेदनशील है यह क्षेत्र

-विशेषज्ञों का कहना है कि यह तराई का क्षेत्र है. यहां जलभराव आम है. इसलिए यह क्षेत्र जल जनित रोगों के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. मुख्य कारणों में साफ-सफाई का अभाव माना जाता है. यह क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस नामक मादा मच्छर के काटने से होती है. इसमें दिमाग के बाहरी आवरण यानी इन्सेफेलान में सूजन हो जाती है.

यह वायरस के माध्यम से फैलती है. बताया गया है कि इसके वायरस सूअर और हिरोनस नामक पानी की चिड़िया के शरीर पर भी पाए जाते हैं. अगर इन्हें काटने के बाद मच्छर किसी मनुष्य को काट लें तो उसे इंसेफेलाइटिस होने की पूरी आशंका होती है.

क्‍या है लक्षण: डॉक्‍टरों के मुताबिक इस बीमारी में रोगी को तेज बुखार, झटके आना, बेहोशी और कोमा जैसी स्थिति दिखाई देती है. ये ऐसी बीमारी बनकर सामने आ जाती है जहां 60 फीसद मरीज मारे जाते हैं. बचे हुए मरीजों में से अधिकांश लकवाग्रस्त हो जाते है.

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कोशिश जारी है....

-वर्ष 2006 के बाद हुए रिसर्च से मालूम हुआ है कि सभी मामले दिमागी बुखार के नहीं हैं. कुछ केसों में जलजनित एंटेरो वायरस की मौजूदगी पाई गई. वैज्ञानिकों ने इसे एक्यूट इनसेफेलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया है.

-वर्ष 2006 में पहली बार गोरखपुर और आसपास के जिलों में 50 लाख से अधिक बच्‍चों को इस बुखार से बचाव का टीका लगाया गया. लेकिन मौतों के आकड़ों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

-2009 में पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर में स्थापित हुई, ताकि रोग की वजहों की सही पहचान की जा सके.

-अमरीका में नए बैक्टीरिया और वायरस की खोज करने वाले संगठन सीडीसी (सेंट्रल डिजीज कंट्रोल) के वैज्ञानिक भी इन वायरसों का पता लगाने के लिए 2009 और 2012 में मेडिकल कॉलेज का दौरा कर चुके हैं.

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First published: August 12, 2017
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