केंद्र ने हाईकोर्ट में समलैंगिकों की शादी का किया विरोध, 21 अक्टूबर को सुनवाई

केंद्र ने हाईकोर्ट में समलैंगिकों की शादी का किया विरोध, 21 अक्टूबर को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2018 को समलैंगिकता को अवैध बताने वाली IPC की धारा 377 (Section 377) की वैधता पर अहम फैसला सुनाया था (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के चार सदस्यों ने मिलकर 8 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में एक जनहित याचिका दायर की थी. इस याचिका में कहा गया है कि हिंदू मैरिज एक्ट ये नहीं कहता कि शादी महिला-पुरुष के बीच ही हो. साल 2018 से भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं है, लेकिन फिर भी समलैंगिक शादी (Homosexual Marriage) अपराध क्यों है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 14, 2020, 1:58 PM IST
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार (Centre Govt) ने हिंदू मैरिज एक्ट (Hindi Marriage Act) के तहत समलैंगिकों की शादी (Homosexual Marriage) का दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में विरोध किया है. सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने दलील दी कि अदालत को ध्यान में रखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केवल समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया है, इससे ज्यादा कुछ नहीं. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि शीर्ष अदालत ने समलैंगिकों की शादी को लेकर कोई फैसला नहीं दिया है. लिहाजा याचिकाकर्ता समलैंगिकों की शादी को कानूनी मान्यता की मांग नहीं कर सकते. इस मामले पर अब 21 अक्टूबर को अगली सुनवाई होगी.

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में  समलैंगिक विवाह को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने के लिए लगाई गई जनहित याचिका (PIL) पर आज सुनवाई हुई. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से उन लोगों की लिस्ट सौंपने के लिए कहा जिन लोगों को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक शादी का रजिस्ट्रेशन करने से मना कर दिया गया था. वहीं केंद्र सरकार ने भी संस्कृति और कानून का हवाला देते हुए कोर्ट में समलैंगिक शादी का विरोध किया, जबकि कोर्ट ने यह बात मानी कि दुनिया में अब काफी बदलाव हो रहे हैं.

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किसने दायर की है याचिका?
दरअसल, एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के चार सदस्यों ने मिलकर 8 सितंबर को एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई दिल्ली के चीफ जस्टिस एचसी डीएन पटेल और जज प्रतीक जालान की बेंच कर रही है. इस याचिका में कहा गया है कि हिंदू मैरिज एक्ट ये नहीं कहता कि शादी महिला-पुरुष के बीच ही हो. साल 2018 से भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं है, लेकिन फिर भी समलैंगिक शादी अपराध क्यों है. याचिकाकर्ताओं के वकील राघव अवस्थी का कहना है कि जब एलजीबीटी (LGBT) समुदाय को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है, तो फिर शादी को मान्यता न देना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा.

वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या किसी समलैंगिक जोड़े ने शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया, लेकिन उसे इनकार कर दिया गया. अवस्थी ने कहा कि हां, लेकिन वे कोर्ट के सामने आने को तैयार नहीं थे, इसलिए जनहित याचिका दाखिल की गई है. इस दौरान SG ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध संबंधों की डिग्री के खंड को पढ़ा और कहा कि यह "पुरुष" और "महिला" को संदर्भित करता है.

अदालत ने कहा, 'फिलहाल हम पूछ रहे हैं कि जनहित याचिका क्या सुनवाई योग्य है?' हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पीड़ित हैं, तो वे आ सकते हैं. जनहित याचिका का कोई सवाल नहीं है. अदालत ने याचिकाकर्ताओं से उन याचिकाकर्ताओं की लिस्ट पेश करने के लिए कहा, जिनकी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक होने पर शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं किया गया.


सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बोले- वैधानिक प्रावधानों पर भरोसा करूंगा
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैंने कानून की जांच की. अदालत कानून नहीं बना सकती. मैं हलफनामा भी दाखिल नहीं करूंगा. मैं वैधानिक प्रावधानों पर भरोसा करूंगा. जस्टिस प्रतीक जालान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कारण भी दिए हैं.

याचिकाकर्ताओं ने दिए ये तर्क
याचिकाकर्ताओं के वकील राघव अवस्थी ने कहा कि 21 वीं सदी में दूसरी शादियों की तरह समलैंगिक शादियों को समान अधिकार न दिए जाने का कोई कारण नहीं है. वहीं याचिकाकर्ता गोपी शंकर ने कहा कि समानता बहुत जरूरी है. एलजीबीटी (LGBT) समुदाय के बहुत से लोग हैं, जिनकी शादी को रजिस्ट्रार द्वारा रजिस्टर नहीं किया जा रहा है. वह भी समलैंगिक शादी करना चाहते हैं और उपने रिश्ते को रजिस्टर कराना चाहते हैं. इसके साथ ही गोपी शंकर ने 2019 के मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले की ओर इशारा किया, जिसमें एक आदमी और एक ट्रांसवुमन की शादी को बरकरार रखा गया था. फैसले में कहा गया था कि हिंदू मैरिज एक्ट में ‘दुल्हन’ शब्द में एक ट्रांसवुमन भी शामिल है.

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सेक्शन 377 को लेकर क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2018 को समलैंगिकता को अवैध बताने वाली IPC की धारा 377 (Section 377) की वैधता पर अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक संबंध अब से अपराध नहीं हैं. संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध को एक मत से अपराध के दायरे से बाहर कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के एक हिस्से को, जो सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध बताता है, तर्कहीन, बचाव नहीं करने वाला और मनमाना करार दिया.
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