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राज से लेकर स्वराज तक की सैन्य यात्रा के गवाह थे ‘सेंचुरियन’ कर्नल राम सिंह

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: November 11, 2019, 11:00 PM IST
राज से लेकर स्वराज तक की सैन्य यात्रा के गवाह थे ‘सेंचुरियन’ कर्नल राम सिंह
कर्नल राम सिंह नहीं रहे. करीब 102 साल का लंबा जीवन जीने के बाद उनका दो दिन पहले, 9 नवंबर को जयपुर में देहांत हो गया

कर्नल राम सिंह के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था कि उनसे हुई एक मात्र मुलाकात को मैं कभी भूल नहीं पाया. जब मई 2008 में गर्मी की छुट्टियों के दौरान सपरिवार मेरा उत्तराखंड जाना हुआ था, उसी समय की बात है ये.

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  • Last Updated: November 11, 2019, 11:00 PM IST
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भारतीय सेना की गर्वीली परंपरा के वाहक कर्नल राम सिंह 102 साल की लंबी पारी खेलकर परलोक सिधार गये. लेकिन इस सैन्य अधिकारी का जीवन भारतीय सेना की नई पौध को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा. ईमानदारी, अनुशासन और साहस के पर्याय रहे कर्नल राम सिंह पर्वतीय शहर रानीखेत के भी करीब सात दशक तक सबसे चमकते सितारे रहे थे. फील्ड मार्शल रोमेल को अपनी आंखों के सामने पाने वाले कर्नल राम सिंह जनरल थिमैया के प्रिय अधिकारियों में भी थे.

कर्नल राम सिंह नहीं रहे. करीब 102 साल का लंबा जीवन जीने के बाद उनका दो दिन पहले, 9 नवंबर को जयपुर में देहांत हो गया, जहां वो पिछले कुछ वर्षों से अपने डॉक्टर पौत्र के साथ रह रहे थे. सवाल उठता है कि कर्नल राम सिंह की चर्चा मैं क्यों कर रहा हूं और वो भी उनसे पहली औऱ आखिरी मुलाकात के करीब साढ़े ग्यारह साल बाद.

दरअसल कर्नल राम सिंह के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था कि उनसे हुई एक मात्र मुलाकात को मैं कभी भूल नहीं पाया. जब मई 2008 में गर्मी की छुट्टियों के दौरान सपरिवार मेरा उत्तराखंड जाना हुआ था, उसी समय की बात है ये. नैनीताल के बाद रानीखेत गया था मैं और वहां कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर के गेस्ट हाउस कुमाऊं विला के एक कमरे त्रिशूल में रुका हुआ था. जैसा कि सैन्य अतिथि गृहों में रिवाज है, मेज पर स्टेशन डायरी रखी हुई थी, जिसमें कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर से जुड़ी हुई सारी जानकारी मुहैया थी, महत्वपूर्ण नंबरों के साथ रानीखेत के इतिहास और भूगोल के बारे में भी उपयोगी सूचनाएं थीं. इसी स्टेशन डायरी में एक अधिकारी का जीवन वृत भी लगा हुआ था और ये अधिकारी थे कर्नल राम सिंह. सहज ही उत्कंठा हुई कि आखिर कुमाऊं रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास में सैकड़ों मशहूर वीर अधिकारी और जवान रहे हैं फिर आखिर कर्नल राम सिंह का ही उल्लेख क्यों, उन्हीं का प्रोफाइल क्यों.



कर्नल राम सिंह से बिना मिले लगा सहज जुड़ाव
प्रोफाइल पढ़ना शुरू किया, तो उसमें कर्नल राम सिंह के आरंभिक जीवन की जानकारी मिली, पता चला कि उनका संबंध गुजरात के वरसोड़ा से है, जो चावड़ा राजपूतों से जुड़ी हुई एक रियासत हुआ करती थी. चूंकि उस दौरान मेरा गुजरात में ही रहना हुआ करता था, इसलिए कर्नल राम सिंह से सहज जुड़ाव सा लगा, वो भी बिना मिले हुए. आखिर आज का गुजरात, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य के तौर पर हमेशा चर्चा में बना रहता है, उस गुजरात को भारतीय इतिहास में पहली दफा उसी चावड़ा वंश के प्रतापी शासक वनराज चावड़ा लेकर आये थे, जिनका जन्म तो गीर के इलाके में कंकावटी नामक जगह पर हुआ था, लेकिन बाद में वो वणोद गये और आखिरकार सरस्वती नदी के किनारे पाटण को अपने उस राज्य की राजधानी के तौर पर बसाया, जिसको उन्हें नाम दिया गुर्जर राष्ट्र, जो अरबी भाषा के असर में आकर कालांतर में गुजरात बन गया.

ईस्वी सन 842 में वनराज चावड़ा ने जिस गुजरात को तत्कालीन कन्नौज से अलग कर स्वतंत्र राजसत्ता के तौर पर आकार दिया, वो सिंध से लेकर धार और नागौर से लेकर कल्याण तक फैला हुआ था. कालांतर में चावड़ा वंश की ताकत कमजोर पड़ी, सोलंकी वंश का गुजरात पर शासन शुरू हुआ और फिर सोलंकियों के बाद वाघेला राजवंश ने पाटण से गुजरात पर राज किया और वाघेला वंश के अंतिम शासक कर्णदेव वाघेला की कड़ी के युद्ध में हार हुई और गुजरात में चौदहवीं शताब्दी में सल्तनत काल का आरंभ हुआ, जिस दौरान गुजरात की राजधानी पाटण से बदलकर अहमदाबाद आ गई, जिसे सुल्तान अहमद शाह ने तत्कालीन कर्णावती को नया आकार देते हुए अहमदाबाद के तौर पर बसाया, जो शहर कभी असावल के तौर पर भी पहले जाना गया.
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चावड़ा वंश की गुजरात के मामले में जो ऐतिहासिक महत्ता रही है, उसी मद्देनजर कर्नल राम सिंह से मिलने की इच्छा बलवती हुई. कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर के मेस हवलदार ने बताया कि कर्नल साहब रानीखेत के माल रोड पर ही प्रायोरी नामक बंगले में रहते हैं, जिसके रास्ते के बारे में कोई भी जानकारी दे देगा. आगे बढ़ा तो राह चलते एक आदमी से कर्नल राम सिंह के बारे में पूछा. उसने उनका नाम सुनते ही मुझे कहा कि चलिए मैं आपको पहुंचाकर आता हूं. थोड़ी दूर ही प्रायोरी नामक वो ऐतिहासिक बंगला था, कभी ब्रिटिश सैन्य अधिकारी का आवास हुआ करता था और उसके मौजूदा मालिक ने रहने के लिए कर्नल राम सिंह को दिया हुआ था. ये बात मुझे कर्नल राम सिंह से हुई मुलाकात के दौरान ही ध्यान में आई.



90 साल की उम्र में भी याद थी हर एक बात
16 मई 2008 की सुबह मैं जब प्रायोरी के अंदर पहुंचा, तो लॉन में दो लोग बैठे थे. नजदीक जाकर अपना परिचय दिया और आने का उद्देश्य बताया, तो बड़ी गर्मजोशी से दोनों खड़े हुए. पता चला कि चेक शर्ट में दाढ़ी रखे जो सज्जन बैठे थे, वो कर्नल राम सिंह थे और उनके बगल में बैठे सज्जन उनके बेटे कर्नल विजय सिंह थे. अहमदाबाद से मेरा संबंध जानकर कर्नल राम सिंह को और खुशी हुई और उन्होंने गुजरात से अपना संबंध बताना शुरू कर दिया. खास बात ये थी कि जिस वक्त कर्नल राम सिंह इतिहास के झरोखे में झांक रहे थे, उस वक्त भी उनकी उम्र नब्बे साल से अधिक की थी, लेकिन अतीत की एक-एक बात याद थी.

बातचीत का वो दौर करीब ढाई घंटे लंबा चला. कर्नल राम सिंह ने बताया कि उनके पिता लक्ष्मण सिंह चावड़ा की कुल दस संतानें थीं, पांच बेटे और पांच बेटियां, जिसमें उनका नंबर छठा था. वरसोड़ा भारत संघ में आजादी के समय विलय होने वाली करीब 565 रियासतों में से एक थी, जो 1517 ईस्वी में अस्तित्व में आई थी, जब चावड़ा वंश के तत्कालीन मुखिया सामंतसिंह द्वितीय ने अपने कब्जे में रहे इलाकों को तीन हिस्सों में बांट दिया था और हर हिस्से में 108 गांव आये थे. ये तीन हिस्से ही माणसा, वरसोड़ा और अंबोड़ के तौर पर अस्तित्व में आये, जिनमें से वरसोड़ा राजपरिवार की कनिष्ठ शाखा, जिसे छोटा पाना कहा जाता था, से कर्नल राम सिंह के पिता लक्ष्मण सिंह चावड़ा का संबंध था.

हर खेल में पारंगत थे राम सिंह
कर्नल राम सिंह का आरंभिक जीवन वरसोड़ा के साथ ही उदयपुर में भी बीता, क्योंकि उनके पिता की बुआ का विवाह मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह से हुआ था. राम सिंह बचपन से ही तेज तर्रार थे, जिसकी झलक मेयो कॉलेज में उनकी शिक्षा-दीक्षा के दौरान भी मिली. राम सिंह 1930 से 1935 के बीच मेयो कॉलेज में रहे और पढ़ाई के साथ ही हर महत्वपूर्ण खेल में अपनी धाम जमाई. क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल और स्क्वैश, सबमें पारंगत थे राम सिंह और खूब सारे पुरस्कार और ट्रॉफियां जीतीं.

मेवाड़ के साथ राम सिंह का रिश्ता तो था ही, ऐसे में मेयो कॉलेज से शिक्षा हासिल करने के बाद वो 15 मार्च 1936 से 15 अक्टूबर 1937 के बीच मेवाड़ स्टेट फोर्सेज में कैडेट रहे और इसी दौरान शाही सुरक्षा दस्ता, जो शंभू कैवलरी के तौर पर जाना जाता था, उसके कमांडेंट भी रहे.

शादी के तुरंत बाद द्वितीय युद्ध में हुए शामिल
राम सिंह 1937 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी, आईएमए गये और वहां भी संस्थान की क्रिकेट टीम के कप्तान रहे. आईएमए का कोर्स करने के बाद 1939 में मेवाड़ लांसर्स में उनकी नियुक्ति हुई, तब तक द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी. 1940 की शुरुआत में राम सिंह की शादी हुई, लेकिन नई-नई शादी और दुल्हन की परवाह किये बगैर राम सिंह मेवाड़ इंफैंट्री के साथ ब्रिटिश सरकार की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हुए. यहां काहिरा, अदन और एल अलामीन के ऑपरेशन में उन्होंने भाग लिया. अफ्रीका में एल अलामीन की लड़ाई के दौरान ही राम सिंह के दाहिने कंधे में तोप का गोला लगा था.
एल अलामीन की चर्चा करते समय कर्नल राम सिंह की आंखों में चमक आ गई थी. आखिर यही वो मोर्चा था, जहां से ब्रिटेश सेना को जीत का स्वाद मिला था और जिस अफ्रीका में नाजी जर्मनी के सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल जनरल रोमेल ने दो साल तक अंग्रेजों और फ्रांसिसियों के छक्के छुड़ाए थे, जिसकी वजह से रोमेल को डेजर्ट फॉक्स की उपाधि मिली थी. राम सिंह को लगता था कि शायद जब वो अस्पताल में घायल पड़े थे, फील्ड मार्शल रोमेल घायल दुश्मन सैनिकों के इस अस्पताल में भी आये थे, एक सामान्य सैनिक के भेष में हाल-चाल जानने के लिए. फील्ड मार्शल रोमेल की सामरिक रणनीति तो सैन्य इतिहास के अध्यायों का स्वर्णिम अध्याय तो है ही, उनसे जुड़ी किवंदतियां भी हजारों हैं, और उन्हीं में से कुछ उस सुबह मैंने कर्नल राम सिंह से भी सुनी थीं. राम सिंह 1940 से लेकर 1945 तक उत्तर अफ्रीका के सैन्य अभियानों में लगे रहे, उस वक्त कैप्टन से मेजर भी बने, 1941 में छह महीने तक वो एल अलामीन में तैनात रहे थे.



योग्य नेतृत्व से दूर कीं अनुशासन भंग की शिकायतें
बीयर की चुस्की लगाते मई की उस सुबह कर्नल राम सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का अपना जीवन वृतांत भी बताया था. आजादी के बाद जब देशी रियासतों की फौजों का भारतीय सेना के साथ 1948-49 में विलय शुरू हुआ, तो उस वक्त इंदौर इंफैंट्री को 15 कुमाऊं का नाम दिया गया. इसी बटालियन के दूसरे कमांडिंग ऑफिसर बने कर्नल राम सिंह 7 जुलाई 1951 को और 1954 तक वो इस बटालियन की अगुआई करते रहे. इस दौरान कर्नल राम सिंह ने जम्मू-कश्मीर में भी अपनी सेवा दी. बाद में वो असम राइफल्स गये, कारण रहा दोनों बच्चों की मेयो कॉलेज में चल रही पढ़ाई का महंगा खर्च. असम राइफल्स में डेपुटेशन से उनकी आय में बढ़ोतरी हुई और बेटे नरेंद्र और बीरेंद्र की पढ़ाई का खर्चा उठाना आसान हुआ. असम राइफल्स की जिस तीसरी बटालियन की अगुआई कर रहे थे कर्नल राम सिंह, उसमें अनुशासन भंग की बड़ी शिकायतें थीं. अपने योग्य नेतृत्व के कारण कर्नल राम सिंह ने इस बटालियन की सारी गड़बड़ियां दूर की और इस तरह वो तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल थिमैया की नजर में भी आए. आगे चलकर कर्नल राम सिंह जनरल थिमैया के सबसे चहेते अधिकारियों में से एक बने और इसी कारण अपने कई वरिष्ठों और साथियों की जलन का शिकार भी हुए.

जनरल थिमैया ने कुमाऊं रेजिमेंटर सेंटर के कमांडेंट के तौर पर कर्नल राम सिंह को तैनात किया. 11 जुलाई 1957 से 1 जनवरी 1962 तक वो इस पद पर बने रहे. इस दौरान न सिर्फ उन्होंने कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर को व्यवस्थित किया, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण का ऐसा उंचा मानक स्थापित किया, जिससे कुमाऊं रेजिमेंट की प्रतिष्ठा को चार चांद लगे और इसकी शोहरत लगातार बढ़ती चली गई. इसी दौरान देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का रानीखेत भी आना हुआ, जो पर्वतीय शहर 1950 में कुमाऊं रेजिमेंट का रेजिमेंटल सेंटर बना. खुद जनरल थिमैया हर साल पंद्रह दिनों के लिए रानीखेत आते रहते थे और इस दौरान अपने मेहमानों को भी बुलाते थे.



कर्नल सिंह की काबिलियत पर भरोसा करते थे जनरल थिमैया
जनरल थिमैया के चहेते रहे कर्नल राम सिंह ने कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट के तौर पर करीब साढ़े चार वर्ष लंबे अपने कार्यकाल के दौरान स्थानीय लोगों का प्रेम और स्नेह भी हासिल किया. हजारों की तादाद में स्थानीय युवकों को सैनिकों के तौर पर नियुक्त कर प्रशिक्षित किया, शहर के आसपास के लोगों के कल्याण के लिए ढेरों योजनाओं को अंजाम दिया. इस दौरान जनरल थिमैया का कई बार रानीखेत भी आना हुआ. जनरल थिमैया के साथ कर्नल राम सिंह की ये नजदीकी कई वरिष्ठ अधिकारियों को खटकती रही और एक ऐसे ही अधिकारी ने कर्नल राम सिंह का तबादला भी कराना चाहा, लेकिन उल्टे जरनल थिमैया ने उस वरिष्ठ अधिकारी का ही तत्काल तबादला कर दिया. इतना भरोसा था जनरल थिमैया को कर्नल राम सिंह पर, उनकी ईमानदारी और कार्यकुशलता पर.

वन्य प्राणी संरक्षण कानूनों के 1970 में सख्त बन जाने के बाद बाघ और शेर जैसे बड़े प्राणियों का शिकार बंद हुआ. उससे पहले खुद सेना के वरिष्ठ अधिकारी रानीखेत में शिकार करने आते थे. आधिकारिक तौर पर ऐसे शिकार के लिए पांच रुपये प्रति शिकार चुकाने होते थे. जनरल थिमैया नियम से शिकार के बाद निर्धारित रकम चुकाकर जाते थे, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्हें इस मामूली रकम में भी दिक्कत थी. इनमें एक नाम जनरल कंवर बहादुर सिंह का भी था. कर्नल राम सिंह ने बातचीत के दौरान बताया था कि जनरल थिमैया आर्मी चीफ के तौर पर चार साल का अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद 7 मई 1961 को रिटायर हुए और उसके कुछ समय बाद ही जनरल कंवर बहादुर सिंह कुमाऊं रेजिमेंट के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट बनाये गये. यही लेफ्टिनेंट जनरल बहादुर सिंह 1962 से 1966 के बीच लखनऊ स्थित सेंट्रल कमांड के प्रमुख जीओसी इन सी के तौर पर रहे, जिसके कार्यक्षेत्र में कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर भी आता था. जनरल बहादुर सिंह से कर्नल राम सिंह की नहीं बनी और आखिरकार कर्नल राम सिंह ने भारतीय सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली. सेना में भ्रष्टाचार के कई मामलों को देखकर भी कर्नल राम सिंह का मन खट्टा हो गया था.

हर नया कमांडेंट लेता था कर्नल राम सिंह से सीख
कर्नल राम सिंह ने भारतीय सेना से सेवानिवृति तो ले ली, लेकिन उनको जल्दी ही थिमैया फार्म विकसित करने के लिए सेवा देने के लिए कहा गया. चूंकि उनके प्रिय रहे जनरल थिमैया की याद में ये फार्म विकसित किया जाना था, इसलिए उन्होंने ये जिम्मेदारी ली, उस पर मजबूती से काम भी किया, लेकिन फिर कर्नल ऑफ द रेजिमेंट जनरल बहादुर सिंह से मतभेद होने के कारण ये काम भी उन्होंने छोड़ दिया.
सेना के साथ औपचारिक तौर पर कर्नल राम सिंह का नाता तो 1964 में खत्म हो गया, लेकिन रानीखेत के साथ उनका नाता अगले पांच दशक तक जारी रहा. कर्नल राम सिंह की कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर में होने वाली तमाम पार्टियों में पूछ बनी रही, हर नया कमांडेंट उनसे सीख लेने के लिए उनके पास जाता रहा, नये अधिकारी प्रेरणा पाने के लिए मिलते रहे और रानीखेत का आम आदमी अपने हित चिंतक के तौर पर उन्हें देखता रहा. रानीखेत के लोगों के साथ उनका संबंध इतना गहरा गया था कि शहर का क्या बच्चा और क्या बूढ़ा, हर आदमी कर्नल राम सिंह को जानता था और सम्मान के साथ उनसे व्यवहार करता था. कर्नल राम सिंह को सामाजिक प्रसंगों में बुलाया जाता था, अगर रानीखेत में किसी फिल्म की शूटिंग चलती थी, तो वहां भी सम्मानित अतिथि के तौर पर कर्नल राम सिंह बुलाये जाते थे. कर्नल राम सिंह की यही वो लोकप्रिय शख्सियत थी, जिसकी वजह से कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर की स्टेशन डायरी में एक मात्र प्रोफाइल उनका लगा हुआ था और जिसके मेस में घुसते ही उस भूस भरे बाघिन के दर्शन हो जाते थे, जिसका शिकार कभी कर्नल राम सिंह ने 1948 में वारंगल के जंगल में खुद किया था. वैसे ये शिकार कोई अकेला नहीं था, बाघिन के साथ उन्होंने बाघ को भी उसी वक्त मारा था, बाघ उनके प्रायोरी की शोभा बढ़ाता था. प्रायोरी में रहने वाले कर्नल राम सिंह रानीखेत के पर्यायवाची बन चुके थे.



बाप के नक्शे कदम पर बेटे विजय सिंह भी चले थे, जो न सिर्फ कुमाऊं रेजिमेंट में कमिशन हुए, बल्कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में भी हिस्सा लिया. इनकी भी आगे चलकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों से नहीं बनी और फिर इन्होंने भी सेवानिवृति ले ली और जयपुर में बस गये. अपने जीवन के आखिरी दिनों में कर्नल राम सिंह भी जयपुर ही चले गये थे, जहां आखिरकार दो दिन पहले उन्होंने आखिरी सांस ले ली. खास बात ये है कि अपने पुरखों की भूमि गुजरात से कर्नल राम सिंह का संबंध कट सा गया था. अहमदाबाद की आखिरी यात्रा उन्होंने 1972-73 में की थी. आखिरी दिनों में कर्नल राम सिंह की तबीयत खराब रहने लगी थी, उनके डॉक्टर भाई गोविंद सिंह चावड़ा की भी कुछ वर्षों पहले मृत्यु हो गई थी. हालांकि जब जयपुर में अपना सौवां जन्मदिन मनाया था कर्नल राम सिंह ने, उस वक्त भी उनकी स्मरण शक्ति ज्यों की त्यों बनी हुई थी. जब मैं खुद 2008 में उनसे मिला था, तो उन्हें अपने सैन्य जीवन की एक-एक बात याद थी. फौजी लोग आम तौर पर राजनीति की बात नहीं करते, लेकिन कर्नल राम सिंह ने तब कहा था कि अगर जवाहरलाल नेहरू की जगह सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री बने होते, तो देश का इतिहास कुछ और रहा होता, देश ने और तरक्की की होती.

कर्नल राम सिंह तो 102 साल की लंबी पारी खेलकर इस दुनिया से विदा हो गये, लेकिन उनसे जुड़ी यादें उन हजारों लोगों के दिल में बनी रहेगी, जो उनके संपर्क में आये और जिनका जीवन बदला कर्नल राम सिंह ने. इनमें से एक रोज मिलियन बैथ्यू भी रही थीं, जिसे मेघालय के खासी समुदाय की एक सामान्य लड़की के तौर पर कर्नल राम सिंह ने अपने साथ रखकर पाला-पोसा और 1958 में शादी भी करवाई रानीखेत में, जो रोज आगे चलकर 1992 से 1996 के बीच संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. अलविदा कर्नल राम सिंह!

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First published: November 11, 2019, 11:00 PM IST
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