बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी दल की राह आसान नहीं होगी

पीएम मोदी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार की फाइल फोटो
पीएम मोदी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार की फाइल फोटो

इस बार राजद (RJD), कांग्रेस (Congress), जेएमएम (JMM), सीपीआई (CPI), सीपीएम (CPM) आदि पार्टियां महागठबंधन में लड़कर लोजपा के नहीं होने की कमी पूरी करेंगी. रालोसपा (RLSP) महागठबंधन में रहेगी तो लोजपा (LJP) का एनडीए (NDA) के साथ रहना निश्चित नहीं है.

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  • Last Updated: September 28, 2020, 7:35 PM IST
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(सुदीप श्रीवास्तव)

नई दिल्ली. बिहार (Bihar) की क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janata Dal) के मुखिया लालू यादव (Lalu Yadav) अभी जेल में हैं और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (Hindustani Awam Morcha) के संस्थापक जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) महागठबंधन छोड़कर फिर से एनडीए (NDA) में शामिल हो गए हैं. उधर रालोसपा (RLSP) का भी महागठबंधन से कोई अच्छा रिश्ता नहीं है, ऐसे में नीतीश कुमार और बीजेपी (BJP) का गठबंधन पूरी तरह से शक्तिशाली है. इसके बाद भी बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) आसन नहीं होंगे. यह विश्लेषण पिछले चुनाव पर आधारित नहीं है जहां महागठबंधन (Grand Alliance) ने चुनाव में विपक्ष का सफाया किया था. यह 2010 के उस विधानसभा चुनाव के विश्लेषण पर आधारित है जहां बीजेपी और जदयू (JDU) ने मिलकर 243 में से 206 सीटों पर कब्जा जमाया था.

इस प्रदर्शन के बाद भी कम लोगों को ही पता होगा कि बीजेपी और जदयू (JDU) का कुल वोट प्रतिशत 40 से कम था. बीजेपी (BJP) ने 102 में से 91 सीट जीती थी और उनका वोट परसेंट 39.56 था. जदयू ने 141 सीट पर 38.77 वोट के साथ 115 सीट जीती. सामान्यतः तीन चौथाई बहुमत आने के बाद सत्ताधारी दलों (Ruling parties) का वोट परसेंट 45 वोट शेयर पार कर जाता है और उपचुनाव (By-election) में यह 50 फीसदी भी हो जाता है. 40 फीसदी वोट के साथ बीजेपी और जदयू ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था. आरजेडी (RJD) और लोजपा (LJP) ने साथ में चुनाव लड़ा था. कांग्रेस और बीएसपी (BSP) ने लगभग सभी सीटों पर अकेले लड़ाई लड़ी थी.



बीजेपी ने जेडीयू के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए इच्छा जताई है
राजद और लोजपा के साथ उस समय 2004 लोकसभा चुनाव या 2005 के विधानसभा चुनाव की तरह कांग्रेस होती तो बीजेपी और जदयू को इस तरह बड़ी जीत नहीं मिलती. सीपीआई और सीपीएम दोनों के वोट मिलकर बीजेपी से ज्यादा नहीं होते, उन्हें सात फीसदी वोट मिले थे और वे रिजल्ट को प्रभावित कर सकते थे. एनसीपी ने भी 1.82 फीसदी वोट शेयर के साथ 171 सीटों पर मामला खराब किया था. यह धारणा थी कि किसी सुरक्षित पार्टी के वोट दूसरी पार्टी को नहीं मिलेंगे लेकिन ऐसा नहीं था और राजद को इनमें से आठ फीसदी वोट आसानी से मिल जाते. उस मामले में बीजेपी और जदयू गठबंधन को 206 सीट जीतने को नहीं मिलती.

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2010 में परिणाम ऐसा आया क्योंकि नीतीश कुमार आकर्षण सबसे ज्यादा था और लालू यादव के लिए जनता में नफरत थी. 15 साल की विरोधी लहर के कारण अब नीतीश कुमार पहले के मामले में ज्यादा वोट खींचने वाला चेहरा नहीं कहे जा सकते. अल्पसंख्यकों और कोर सोशलिस्ट वोटरों में उनकी प्रतिष्ठा में गिरावट आई है. बीजेपी ने इस बात को भांपते हुए बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए इच्छा जताई है. पहले जदयू ने 141 और बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इस बार राजद, कांग्रेस, जेएमएम, सीपीआई, सीपीएम आदि पार्टियां महागठबंधन में लड़कर लोजपा के नहीं होने की कमी पूरी करेंगी. रालोसपा महागठबंधन में रहेगी तो लोजपा का एनडीए के साथ रहना निश्चित नहीं है. बिहार विधानसभा चुनाव खुला गेम है जो किसी के भी पाले में जा सकता है. यह स्पर्धा सीट दर सीट, जिला दर जिला और क्षेत्र दर क्षेत्र होगी.
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