बिहार में सरकार बनाने के बाद अब बीजेपी के सामने हैं ये तीन चुनौतियां

बिहार में बीजेपी ने अकेले 74 सीटें जीती हैं.
बिहार में बीजेपी ने अकेले 74 सीटें जीती हैं.

बिहार में सोमवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में पदों में फेरबदल यह रेखांकित करता है कि बीजेपी (BJP) अब किस तरह से आगे बढ़ रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 17, 2020, 5:48 PM IST
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नई दिल्‍ली. बिहार चुनाव (Bihar election 2020) में जीत के बाद बीजेपी (BJP) राज्‍य में अपने जमीनी पकड़ को मजबूत कर रही है. सत्‍ता की राजनीति के संबंध में बिहार में सरकार को बनाए रखना एक उपलब्धि है. ऐसा बीजेपी चुनाव परिणाम आने के बाद से ही कहती आ रही है. सोमवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में पदों में फेरबदल यह रेखांकित करता है कि पार्टी अब किस तरह से आगे बढ़ रही है.

बिहार में एक नहीं बल्कि दो-दो उप मुख्यमंत्रियों तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी का पदभार दर्शाता है कि बीजेपी किस तरह से मंथन कर रही है. पूर्व डिप्टी सीएम सुशील मोदी के राज्य की राजनीति से निष्कासन ने इस संकेत को रेखांकित किया है. पार्टी 74 सीटों पर अपनी जीत का हवाला देते हुए बड़ा चेहरा पेश कर सकती है लेकिन सूत्रों का कहना है कि जदयू के साथ गठबंधन में यह उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं है. बीजेपी ने 2010 में जदयू के साथ गठबंधन में 91 विधानसभा सीटें (102 सीटों पर लड़ी थी) जीती थीं. यह गठबंधन में वरिष्‍ठ भागीदार बन गया है.

पार्टी के नेताओं का कहना है कि 2010 की तुलना 2020 से करना अनुचित है. 2020 कोरोना से प्रभावित था और राज्य के प्रवासी श्रमिकों पर इसका प्रभाव था. हालांकि, बीजेपी इस करीबी चुनावी फैसले के जरिये उत्‍पन्‍न चुनौतियों के प्रति जागरूक है. आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने लगभग समान वोट शेयर हासिल किया, यह लाल खतरा है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता स्वीकार करते हैं कि यह संकेत है कि राजद गठबंधन ने एनडीए की परिकल्पना की तुलना में व्यापक समर्थन समूह को कैसे प्रबंधित किया है. इससे यह भी पता चलता है कि गैर-यादव हिंदू मतदाताओं ने संकेत दिया है कि बीजेपी-जदयू उन्हें स्‍वीकृत नहीं कर सकते.



बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे पार्टी को सतर्क रहने की जरूरत है. राजद के इस तरह के प्रदर्शन के बाद यह मानना ​​गलत होगा कि गैर-यादव और गरीब हिंदू मतदाता भविष्य में राजद के साथ सहयोगी नहीं होंगे. राजद ने 2010 (19%) की तुलना में इस बार अधिक वोट शेयर (23% से अधिक) पर मतदान किया. तब राजद ने अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था.
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यह देखते हुए कि इस चुनाव में नीतीश कुमार कैसे सिकुड़ गए, बीजेपी ने पहले ही अपील करने का फैसला किया था कि महागठबंधन में नीतीश के योगदान को व्यापक रूप से माना जा रहा है. इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पार्टी ने ओबीसी और अति पिछड़ी जाति (ईबीसी) को संकेत दिया जब उसने ओबीसी कलवार समुदाय के तारकिशोर प्रसाद और ईबीसी नोनिया समुदाय की रेणु देवी को अपने नेताओं के रूप में चुना.

बीजेपी के लिए अन्‍य महत्वपूर्ण चुनौती है बिहार में कम्युनिस्ट पार्टियों का फिर से उठना. इन्‍होंने कैसे राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन को भोजपुर और मगध क्षेत्र में झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा तक पहुंचाने में मदद की, यह भी चुनौती है. एक बीजेपी नेता का कहना है कि लालू और उनकी राजनीति ने बिहार में कम्युनिस्टों को हाशिए पर डाल दिया था लेकिन उनके बेटे ने उन्हें जीवन का एक नया पट्टा दिया है. यह एक चुनौती है, जिसके लिए राज्य को बातचीत करनी होगी.
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