ISRO चीफ का ऐसा रहा सफर, कॉलेज में आकर पहली बार पहने थे सैंडल, करते थे खेती

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Updated: September 7, 2019, 11:48 PM IST
ISRO चीफ का ऐसा रहा सफर, कॉलेज में आकर पहली बार पहने थे सैंडल, करते थे खेती
2018 में डॉ. के सिवन को इसरो का प्रमुख बनाया गया. फोटो: एपी

डॉ. के. सिवन (Dr K. Sivan) के नेतृत्‍व में इसरो ने कई ऐतिहासिक पल देखे हैं. खुद डॉ. सिवन की अपनी यात्रा कमाल और दूसरों के लिए प्रेरणादायक है. के. सिवन तमिलनाडु के रहने वाले हैं. उनका संबंध एक साधारण किसान परिवार से हैंं.

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  • Last Updated: September 7, 2019, 11:48 PM IST
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नई दिल्‍ली: देश के सबसे अहम मून मिशन (India Moon Mission) चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) भले अभी पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाया हो, लेकिन पहले ही प्रयास में अपने लक्ष्‍य के इतने करीब पहुंचने के लिए इसरो की तारीफ हो रही है. चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2)  के लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने के बाद सबसे भावुक क्षण तब आया, जब आंखों में आंसू लिए इसरो प्रमुख डॉ. के सिवन को पीएम मोदी ने गले से लगाया. उन्‍होंने डॉ. सिवन का हौसला बढ़ाया और उनसे कहा, पूरा देश आपके साथ है. पहले ही प्रयास में इतनी दूर आना बड़ी कामयाबी है. डॉ. सिवन के नेतृत्‍व में ही इसरो ने सफलता पूर्वक चंद्रयान-2 को लॉन्‍च किया था.

डॉ. के. सिवन के नेतृत्‍व में इसरो ने कई ऐतिहासिक पल देखे हैं. खुद डॉ. सिवन की अपनी यात्रा कमाल और दूसरों के लिए प्रेरणादायक है. के. सिवन तमिलनाडु के रहने वाले हैं. उनका संबंध एक साधारण किसान परिवार से हैंं. लेकिन उन्‍होंने इसरो तक का सफर अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्‍प के दम पर हासिल किया.



एमआईटी आए तब पहली बार पहली पैंट

के. सिवन ने एक सरकारी स्कूल से तमिल माध्यम से पढ़ाई की है. वे बताते हैं कि जब वे कॉलेज में थे तो खेतों में पिता की मदद किया करते थे. इसी कारण उनका दाखिला घर के पास वाले कॉलेज में कराया गया. हालांकि 100 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी (गणित) पूरी करने के बाद उन्होंने अपना मन बदल लिया. उनका बचपन बिना जूतों और सैंडल के गुजरा था. सिवन के अनुसार वे कॉलेज तक धोती पहनते थे. जब वे एमआईटी में गए तो पहली बार पैंट पहनी थी.

आम के बागान में करते थे पिता के साथ काम
सिवन के पिता गर्मियों में आम का कारोबार भी करते थे. खुद सिवन उनके साथ आम के बाग में काम करते थे. वह याद करते हुए बताते हैं कि जब मैं घर पर होता था तो मेरे पिता मजदूरों को नहीं बुलाते थे. वह मुझसे ही काम कराते थे. कॉलेज के दिनों में जब वह अपने गांव में होते तो पिता की खेतों में मदद किया करते थे.
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घर के पास के कॉलेज में दिलाया दाखिला
सिवन बताते हैं कि उनके पिता ने जानबूझकर उन्‍हें उस कॉलेज में दाखिला दिलाया, जो उनके घर के सबसे करीब था. ऐसा उन्‍होंने इसलिए किया ताकि मैं कॉलेज के बाद उनकी मदद कर सकूं. वह कहते हैं कि मैंने पहली बार सेंडल तब पहने जब मैं मद्रास इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी में पढ़ने के लिए गया. उससे पहले मैं आमतौर पर नंगे पैर ही रहता था.

सिवन ने वर्ष 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया. वर्ष 1982 में बेंगलुरु के आईआईएससी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर किया. आईआईटी बॉम्बे से उन्होंने वर्ष 2006 में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी पूरी की. सिवन वर्ष 1982 में इसरो में आए. उन्होंने वहां पीएसएलवी परियोजना पर काम शुरू किया. उन्होंने एंड टू ऐंड मिशन प्लानिंग, मिशन डिजाइन, मिशन इंटीग्रेशन ऐंड ऐनालिसिस में काफी योगदान दिया.



वह इंडियन नेशनल ऐकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, एयरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया और सिस्टम्स सोसाइटी ऑफ इंडिया में फैलो हैं. कई जर्नल में उनके पेपर प्रकाशित हुए हैं. उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया है. इसमें चेन्नई की सत्यभामा यूनिवर्सिटी से अप्रैल 2014 में मिला डॉक्टर ऑफ साइंस और वर्ष 1999 में मिला श्री हरी ओम आश्रम प्रेरित डॉ विक्रम साराभाई रिसर्च अवॉर्ड शामिल है.

2018 में वैज्ञानिक के सिवन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. उन्‍होंने एएस किरण कुमार की जगह ली. उनका कार्यकाल तीन साल का है.

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First published: September 7, 2019, 4:39 PM IST
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