चांद पर 11 साल पहले चंद्रयान-1 ने फहराया था तिरंगा, ढूंढ़ी थी बर्फ, चंद्रयान-2 कर सकता है ये कारनामे

इस मिशन के चांद पर पहुंचने के बाद वहां इसकी सफलता का पता चलेगा लेकिन फिलहाल इसने प्राइवेट कंपनियों और इसरो के बीच संबंध जरूर मजबूत किए हैं. इस मिशन ने कई सारी घरेलू तकनीकों के लिए भी रास्ता भी खोला है.

News18Hindi
Updated: June 7, 2019, 7:05 PM IST
चांद पर 11 साल पहले चंद्रयान-1 ने फहराया था तिरंगा, ढूंढ़ी थी बर्फ, चंद्रयान-2 कर सकता है ये कारनामे
इसरो चंद्रयान-2 को जुलाई के दूसरे हफ्ते में लॉन्च करने वाला है (सांकेतिक तस्वीर)
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Updated: June 7, 2019, 7:05 PM IST
अक्टूबर, 2008 में भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने चंद्रयान-1 मिशन को पीएसएलवी रॉकेट के जरिए लॉन्च किया था. इस मिशन में रॉकेट दो पेलोड लेकर गया था. एक चंद्रमा का ऑर्बिटर था और दूसरा इंपैक्टर. इंपैक्टर ने चांद की सतह पर खुदाई करके वहां से जांच के लिए मिट्टी के सैंपल इकट्ठे किए थे. इंपैक्टर के जरिए भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बना था, जिसने अपना झंडा चांद पर फहराया हो. भारत ने यह गौरव अमेरिका, रूस और जापान के बाद हासिल कर लिया था.

अब जुलाई में लॉन्च होने वाला यह चंद्रयान-2 मिशन अपने साथ 13 पेलोड ले जाने वाला है. यह 11 साल पहले भेजे गए चंद्रयान-1 मिशन का एडवांस वर्जन है. इसमें से एक पेलोड अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA का भी होगा. इंडियन स्पेस रिसर्च ऑगर्नाइजेशन (ISRO) ने इसके बारे में कई बातें बताई हैं.

हालांकि पहले मिशन में चंद्रयान के ऑर्बिटर के साथ कई सारी तकनीकी परेशानियां सामने आई थीं. जिसमें से एक इसके स्टार सेंसर में समस्या और गर्मी से बचाव की क्षमता में आई कमी थी. इसके अलावा इसरो के दो साल के मिशन के वक्त से पहले ही इसरो ने इस स्पेसक्राफ्ट के साथ संपर्क टूट गया था. इसके बाद भी ऑर्बिटर मिशन के सारे ही लक्ष्यों को पाने में सफल रहा था. इतना ही नहीं इसरो के चंद्रयान-I को बड़ी सफलता तब मिली थी जब उसने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ भी ढूंढ़ ली थी.

नासा ने बताया था 2017 तक चांद के चक्कर लगा रहा था चंद्रयान-1

मार्च 2017 में, नासा ने नई तकनीक वाले शक्तिशाली राडारों के जरिए पता लगाया कि इसरो का चंद्रयान-1 ऑर्बिटर अभी भी चंद्रमा की कक्षा के चक्कर लगा रहा है. जिस वक्त नासा ने ऐसा किया इसरो के पूर्व प्रमुख माधवान नायर ने इसरो की तारीफ भी की थी.

ऐसा होगा चांद पर भेजे जा रहे चंद्रयान-2 मिशन का ऑर्बिटर (फोटो क्रेडिट- इसरो)


इस स्पेसक्राफ्ट में और क्या-क्या होगा?
इन 13 भारतीय पेलोड में 8 ऑर्बिटर, 3 लैंडर और 2 रोवर होंगे. इसके अलावा NASA का एक पैसिव एक्सपेरिमेंट होगा. इसरो ने मिशन के बारे में यह जानकारियां जारी की हैं. हालांकि इन सभी पेलोड के काम को लेकर विस्तार से जानकारियां नहीं दी हैं. यह पूरा स्पेसक्राफ्ट कुल मिलाकर 3.8 टन वजनी होगा.

क्यों भेजा जा रहा है यह मिशन?
इसरो के पूर्व चेयरमैन जी माधवन नायर ने बताया था कि चंद्रमा पर भेजा जा रहा भारत का दूसरा मिशन चंद्रयान- 2, चंद्रमा की सतह पर कुछ खास खनिजों को खोजने के लिए जाएगा. चंद्रयान-2, ISRO के चांद पर भेजे गए पहले मिशन के 10 सालों बाद जा रहा है. इसरो ने अपने चंद्रयान-1 मिशन, वर्ष 2009 में भेजा था. इस मिशन में भी एक चंद्रमा का चक्कर लगाने वाला ऑर्बिटर और एक इम्पैक्टर था. लेकिन इस मिशन में चंद्रयान-2 की तरह का रोवर नहीं था, जो चंद्रमा पर घूम-घूमकर खनिजों के नमूने जुटा सके. हालांकि फिर भी इस मिशन को चांद की सतह पर पानी के नमूने खोजने का श्रेय दिया जाता है.

ऐसा होगा चंद्रयान-2 का रोवर, जुटाएगा चांद पर सैंपल ((फोटो क्रेडिट- इसरो)


चांद पर कहां जाएगा और कैसे काम करेगा यह मिशन?
इसरो के चेयरमैन के सिवान ने बताया था कि हम चांद पर एक ऐसी जगह जा रहे हैं, जो अभी तक दुनिया से अछूती रही है. यह है चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव. वहीं अंतरिक्ष विभाग की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि इस मिशन के दौरान ऑर्बिटर और लैंडर आपस में जुड़े हुए होंगे. इन्हें इसी तरह से GSLV MK III लॉन्च व्हीकल के अंदर लगाया जाएगा. रोवर को लैंडर के अंदर रखा जाएगा. लॉन्च के बाद पृथ्वी की कक्षा से निकलकर यह रॉकेट चांद की कक्षा में पहुंचेगा. इसके बाद धीरे-धीरे लैंडर, ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा. इसके बाद यह चांद के दक्षिणी ध्रुव के आस-पास एक पूर्वनिर्धारित जगह पर उतरेगा. बाद में रोवर वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए चंद्रमा की सतह पर निकल जाएगा.

अंतरिक्ष क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों के सहयोग की शुरुआत का मिल चुका है श्रेय
इस मिशन के चांद पर पहुंचने के बाद वहां इसकी सफलता का पता चलेगा लेकिन फिलहाल इसने प्राइवेट कंपनियों और इसरो के बीच संबंध जरूर मजबूत किए हैं. इस मिशन ने कई सारी घरेलू तकनीकों के लिए भी रास्ता भी खोला है. दरअसल प्राइवेट कंपनियों ने भी चंद्रयान 2 मिशन के लिए कुछ सेंसर और ऑप्टिक्स उपलब्ध कराए हैं.

चंद्रयान-1 में क्या-क्या था?
चंद्रयान-1, 11 पेलोड लेकर गया था. इसमें से 5 पेलोड भारत के थे. तीन पेलोड यूरोप के और 2 अमेरिका के थे. इसके अलावा एक पेलोड बुल्गारिया का भी था. 2008 में, हमने अपना पहला सैटेलाइट सफलतापूर्वक चांद पर भेजा था. इसने चंद्रमा के बारे में बहुत सारी जानकारियां इकट्ठा की थीं. इसने भी वहां होने वाले खनिजों आदि के बारे में पता किया था. हमने इस दौरान भारतीय झंडा भी चांद की सतह पर फहराया था." चंद्रयान-1 को चंद्रमा की सतह पर पानी खोजने का श्रेय दिया जाता है. 1.4 टन के इस स्पेसक्राफ्ट को PSLV के जरिए लॉन्च किया गया था. उस वक्त इसका ऑर्बिटर चंद्रमा के 100 किमी ऊपर कक्षा में चक्कर लगा रहा था.

चांद के इन क्रेटर की फोटो चंद्रयान-1के इंपैक्टर ने भेजी थीं (फोटो क्रेडिट- इसरो)


चंद्रयान-1 गया भी नहीं था और शुरु हो गई थीं चंद्रयान-2 की तैयारियां
इसरो के इंपैक्टर ने इस मिशन के दौरान चंद्रमा के हिस्सों की मैपिंग करके धरती पर भेजी थी. इसरो के इन मिशनों के प्रति लगाव का पता इससे लगाया जा सकता है कि इसरो ने चंद्रयान-1 मिशन को भेजने से पहले ही चंद्रयान-2 मिशन की तैयारियां शुरू कर दी थीं. सितंबर, 2008 में ही चंद्रयान-2 मिशन को सरकार की ओर से 425 करोड़ रुपये के बजट की अनुमति मिल गई थी. इस बजट में इसे ले जाने वाले GSLV लॉन्च व्हीकल का खर्च नहीं जुड़ा हुआ था. न ही इसमें लैंडर का खर्च शामिल था. इस मिशन को भारत के ग्रहों की खोज के प्रोग्राम में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इस प्रोग्राम का नाम प्लेनेटरी साइंस एंड एक्सप्लोरेशन (प्लेनेक्स) है.

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