लोकसभा चुनाव 2019: क्या UP में कांग्रेस की किस्मत बदल पाएंगी प्रियंका गांधी?

प्रियंका गांधी (PTI)

प्रियंका गांधी (PTI)

कई राजनीतिक विचारकों का मानना है कि राजनीति में एंट्री के लिए प्रियंका गांधी को काफी लंबा इंतजार करना पड़ा है. जानकारों का ये भी मानना है कि प्रियंका ने राजनीति में एंट्री के लिए सही समय भी तय कर लिया था. लेकिन पार्टी को उनका समय उचित नहीं लगा.

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  • Last Updated: March 24, 2019, 3:12 PM IST
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(पल्लवी घोष)



देश की सियासत में माना जाता है कि लोकसभा का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है. यूपी में राजनीति करना आसान नहीं है. बिहार की तरह ही यह सियासी रूप से बेहद सजग इलाका है, जहां छोटी बात बड़े राजनीतिक मसले में बदल जाती है. यूपी में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी पर है.



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हालांकि, वक्त बदल गया है और उसी के साथ राजनीति की दिशा भी बदल रही है. कभी कांग्रेस हटाओ का नारा इस देश में चल रहा था. अब बीजेपी हटाओ का नारा बुलंद है. यूपी बीजेपी के लिए सत्ता की चाबी है. मगर कांग्रेस ने भी चुनाव के ऐन वक्त पहले बड़ा दांव चला है. राहुल गांधी ने यूपी में कांग्रेस की जमीन मजबूत करने के लिए अपनी बहन प्रियंका गांधी को पार्टी महासचिव और पूर्वी यूपी का प्रभारी बनाया. यूपी में चुनावी कैंपेन की धमाकेदार शुरुआत के बाद से प्रियंका गांधी को लगातार अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है.
लोगों को प्रियंका गांधी में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छवि दिखती है. लेकिन, सवाल ये है कि क्या प्रियंका इतने पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगी? क्या वो यूपी में कांग्रेस के अच्छे दिन ला पाएंगी?



कई राजनीतिक विचारकों का मानना है कि राजनीति में एंट्री के लिए प्रियंका गांधी को काफी लंबा इंतजार करना पड़ा है. जानकारों का ये भी मानना है कि प्रियंका ने राजनीति में एंट्री के लिए सही समय भी तय कर लिया था. लेकिन पार्टी को उनका समय उचित नहीं लगा. हालांकि, देर सबेर प्रियंका की राजनीति में एंट्री हो ही गई. मगर सक्रिया राजनीति की इच्छा के बावजूद वह हर बार भाई राहुल गांधी को ही आगे बढ़ाने का समर्थन करतीं नज़र आईं.



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हाल ही में 'गंगा यात्रा' के दौरान जब प्रियंका गांधी प्रयागराज में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचीं और छात्रों से रू-ब-रू हुईं, वहां भी उन्होंने यही किया. प्रियंका ने राहुल गांधी को राजनीति में आगे बढ़ाने की अपील की. उन्होंने ये भी दावा किया कि उनके भाई में दादी (इंदिरा गांधी) के सभी गुण हैं.



राहुल गांधी की तुलना में प्रियंका का मिजाज भी कुछ जुदा है. वह अपने तय कार्यक्रम और प्रोटोकॉल के हिसाब से नहीं चलतीं. रोड शो करते हुए अचानक गाड़ी रोककर नीचे उतरना और लोगों से हाथ मिलाना. उनसे उनके लहजे में बात करना. ये ही प्रियंका हैं, जो भीड़ के बीच रहकर ज्यादा सहज महसूस करती हैं. कई बार तो प्रियंका ने पार्टी वर्कर्स को भी अपनी कार में बैठा लिया.




News18 की संवाददाता पल्लवी घोष ऐसे ही एक वाकये के बारे में बताती हैं. वो कहती हैं, 'गंगा यात्रा' के ठीक पहले प्रियंका गांधी ने प्रयागराज में गंगा तट पर पूजा-अर्चना की. इस दौरान उन्होंने मुझे देखा और मुझे हाथ हिलाकर पास बुलाया. ताकि मैं बेहतर तस्वीर ले सकूं. हालांकि, उन्होंने अलग से बात नहीं की. कैमरे के लिए प्यार और सहजता, ये प्रियंका की एक और पहचान है.'



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यूपी में चुनावी कैंपेन के लिए प्रियंका गांधी ने गंगा यात्रा को ही क्यों चुना? इसके पीछे भी पार्टी की रणनीति है. दरअसल, यूपी समेत देश में गंगा को एक पवित्र नदी माना जाता है. शायद इसलिए गंगा यात्रा से पहले उन्होंने यूपीवासियों के नाम ओपन लेटर लिखा और गंगा को एकता का प्रतीक बताया. अपनी पहले चुनावी कैंपेन से ही प्रियंका ऐसे-ऐसे जगहों को चुन रही हैं, जहां बीजेपी की मजबूत पकड़ हैं.



प्रियंका गांधी के कांग्रेस महासचिव बनने के बाद सबसे ज्यादा परेशान बीजेपी दिखाई दे रही है. बीजेपी सीधे तौर पर राजनीतिक हमला कर रही है. उनके समर्थक सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. कुछ तो अनाप-शनाप लिख रहे हैं, जिनके खिलाफ कांग्रेस ने एफआईआर लिखवाई है. ये लोकतंत्र में खत्म हो रही शुचिता की निशानी है. ये एक तरह की बेचैनी ही है, जो प्रियंका के इम्पैक्ट की वजह से है.




राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के पास राहुल गांधी के बाद प्रधानमंत्री को टक्कर देने वाला कोई व्यक्ति नहीं है. प्रियंका की अपील देशव्यापी है. हिंदी पर पकड़ होने की वजह से हिंदी हार्टलैंड में कांग्रेस के लिए असेट की तरह हैं. 543 लोकसभा सीट पर कांग्रेस अगर 400 पर लड़ी तो हर जगह राहुल गांधी का पहुंचना मुमकिन नहीं होगा. ऐसे में हिंदी हार्टलैंड और ट्राइबल बेल्ट में कांग्रेस के प्रचार में वह काम आएंगीं.



(मूल रूप से अंग्रेजी में ये आर्टिकल पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)



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