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बाल अपराधों में अजब—गजब नहीं भयानक है एमपी

News18Hindi
Updated: October 23, 2019, 5:30 PM IST
बाल अपराधों में अजब—गजब नहीं भयानक है एमपी
बाल अपराधों में अजब—गजब नहीं भयानक है एमपी

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2017 की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश जहां नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण का कलंक अपने माथे पर लगाया है वहीं सबसे ज्यादा बच्चों के गायब होने की खबरें भी सामने आई हैं.

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  • Last Updated: October 23, 2019, 5:30 PM IST
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राकेश कुमार मालवीय - 

एमपी अजब—गजब ही नहीं, भयानक भी है. खासकर बच्चों और महिला अपराधों के मामले में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2017 की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश जहां नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण का कलंक अपने माथे पर लगाया है वहीं सबसे ज्यादा बच्चों के गायब होने से इस बात का भी एक बार सबूत दिया है कि इस प्रदेश के समाज और सरकार ने अपने बच्चों के लिए बहुत गंभीरता से सोचा नहीं. सोचा तो किया नहीं. और थोड़ा बहुत किया तो उसका असर नहीं.

यहां पर तमाम किस्म की अनूठी योजनाएं बनती हैं. पहली बार बनती हैं. पहली बार बच्चों के साथ रैप जैसी मामलों में फांसी का प्रावधान भी हो जाता है, हजारों समाजसेवी संस्थाएं दिन—रात इवेंटनुमा कार्यक्रमों के जरिए बाल अपराध, बीमारियों सहित बाल अधिकारों पर लगी रहती हैं, लेकिन अपराधियों ने न हारने की ठान रखी है. इसलिए शांत प्रदेश माने—जाने वाले एमपी में बच्चों के साथ अपराधों का ​यह सिलसिला भी उतनी ही शांति से चलता ही जाता है, समाज का खून भी नहीं खौलता.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि मप्र में साल 2017 में में 5599 महिलाओं के साथ ज्यादती हुई. इसमें 3082 नाबालिग बच्चियां भी शामिल हैं. यह शर्मशार कर देने वाली तस्वीर लगातार दूसरे साल बनी हुई है. यहां महिला अपराध पिछले साल की तुलना में 8.3 प्रतिशत बढ़ गया है.

2017 में यहां पर मामाजी की सरकार थी. मामाजी यानी शिवराज सिंह चौहान. वह बच्चों के मामले में बेहद संवेदनशील रहे. उन्होंने बार—बार खुद को बच्चों के मामाजी के रूप में प्रचारित किया. इससे उनके भांजे—भांजियों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती ही है, बहनों के प्रति भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है, लेकिन जिम्मेदारी निभाना अलग बात है. फिर समाज में पनपी इस बीमारी का इलाज इतना भी आसान नही.

महिला अपराधों के मामलों में उप्र पहले स्थान पर है. यहां 2016 की तुलना में 2017 में 15.6 प्रतिशत अपराध बढ़े हैं. यह बात भी समझ नहीं आती जहां मथुरा भी है और अयोध्या भी है, वह प्रदेश अपनी देवियों के साथ कैसा बर्ताव करता नजर आता है. आस्था का मतलब केवल पूजा—पाठ है या वह व्यवहार है जो हमें एक इंसान के रूप में बदलता है.

यदि राजनीति और पढ़े—लिखे समाज के बारे में सोचा जाए तो बंगाल की छवि ऐसे समाज के रूप में आती है. पर बंगाल में भी महिलाओं के प्रति अपराधों में तकरीबन साढ़े आठ फीसदी की बढ़त पाई जाती है. इससे पता चलता है कि चाहे हमारा चरित्र किसी भी रूप में श्रेष्ठ हो, चाहे वह शांत प्रदेश हो, चाहे वह विकसित प्रदेश हो, चाहे आस्थावान हो, चाहे वहां पढ़ने—लिखने वाला वर्ग बहुतायत में विद्ममान हो, महिलाओं के प्रति अपराध के मामले में वह अनपढ़—गंवार और असंवेदनशील ही नजर आता है. तमाम आस्थाओं पर, विचार पर अपराधी भारी पढ़ते हैं और हम असहाय से आंकड़ों की किताबों में इस कलंक को बढ़ते देखते हैं. इस पर कोई विमर्श खड़ा नहीं होता. यह एक—दो दिन की रिपोर्टिंग भर के मामले बन जाते हैं. एक दिन की अखबार की खबरें बन जाती हैं, उससे ज्यादा कुछ नहीं हो पाता.
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बहरहाल एमपी में अब नयी सरकार है. कमलनाथजी के नेतृत्व में सरकार इन्वेस्टर्स मीट करके विकास के दरवाजों को खोल दिया गया है. सरकार के प्रवक्ताओं ने इन आंकड़ों को शिवराज सिंह चौहान की सरकार पर होना डाल दिया है. कहा यहां तक गया कि चुनावों के चलते यह आंकड़े देरी से भेजे गए, लेकिन सवाल यह है कि क्या जैसी दमदारी निवेशकों को रिझाने में दिखाई जाती है, वैसा कोई रोडमैप समाज से अपराधों को कम करने का भी है. क्या कोई ऐसा गंभीर सम्मेलन इन आंकड़ों पर भी बुलाया जाएगा. क्या मुख्यमंत्री अपनी व्यवस्था की समीक्षा करेंगे. क्या अगले साल 2018 की रिपोर्ट और फिर उससे अगले साल 2019 की एनसीआरबी की रिपोर्ट में कोई बड़ा फर्क आएगा.

 

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First published: October 23, 2019, 5:30 PM IST
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