Opinion: चीन की युद्ध नीति का जवाब देने के चक्कर में कहीं अमेरिकी नीति की कठपुतली न बन जाए भारत, हमारे पास क्या हैं विकल्प

Opinion: चीन की युद्ध नीति का जवाब देने के चक्कर में कहीं अमेरिकी नीति की कठपुतली न बन जाए भारत, हमारे पास क्या हैं विकल्प
ये भी एक वास्तविकता है कि भारत और चीन के बीच आर्थिक और सैन्य शक्ति का अंतर भविष्य में और बढ़ेंगे.

ये भी एक वास्तविकता है कि भारत और चीन (India-China) के बीच आर्थिक और सैन्य शक्ति का अंतर भविष्य में और बढ़ेगा. अभी ये कहना मुश्किल है कि अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर और चीन-यूरोपीय संघ से तनाव का असर चीन की इकोनॉमी पर कितना ज्यादा पड़ेगा.

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(लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा)

News18.com के लिए लिखे गए लेख के पहले पार्ट में मैंने अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता के बारे में चर्चा की थी. इस संदर्भ में मैंने भारत के सामने क्या विकल्प हैं इस पर बात की थी. मैंने निष्कर्ष निकाला कि भारत के भूगोल और एशिया में चीन की महत्वाकांक्षाएं रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए भारत के प्रयासों में गंभीरता से बाधा उत्पन्न करेंगी. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निकट भविष्य में ये संभव है.

भारत में निसंदेह एक महान शक्ति बनने की क्षमता है. केनेथ वाल्ट्ज ने अपने लेख 'द इमर्जिंग स्ट्रक्चर ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' में महान शक्तियों की पांच विशेषताओं के बारे में बताया है- जनसंख्या और क्षेत्र , संसाधन, आर्थिक क्षमता, सैन्य शक्ति, राजनीतिक स्थिरता और क्षमता. इन सभी क्षेत्रों में भारत को महत्वपूर्ण क्षमता प्राप्त है. लेकिन इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने के लिए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है.



हाल के वर्षों में, भारत की अर्थव्यवस्था धीमी हो गई है और महामारी ने आम नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देने की हमारी क्षमता में गंभीर कमियों को उजागर किया है. हमारे देश में सैनिकों की काफी बड़ी संख्या है. लेकिन कम होते बजट और सैन्य प्रौद्योगिकी के निम्न स्तर से विवश हैं. समय के साथ, हम संरचनात्मक सुधारों, प्रभावी नीतियों और अपने संस्थानों को मजबूत बनाने के माध्यम से इन कमियों को दूर कर सकते हैं, लेकिन यह हमारे पड़ोस में शांतिपूर्ण राजनीतिक माहौल पर निर्भर करेगा. दुर्भाग्य से, ऐसा होता नहीं दिख रहा है.
चीनी तलवार म्यान से बाहर आ गई है. कई एशियाई देश इसके प्रभाव को महसूस कर रहे हैं, लद्दाख में भारत और चीन को अलग करने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा पर इसका सबसे ज्यादा असर दिखा. चीनी सैन्य आक्रामकता का सामना करने के दौरान भारत के सीमित विकल्पों को भी उजागर किया. हालांकि संकट अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. भारत के लिए यहां दबाव बना रहेगा.

ये भी एक वास्तविकता है कि भारत और चीन के बीच आर्थिक और सैन्य शक्ति का अंतर भविष्य में और बढ़ेंगे. अभी ये कहना मुश्किल है कि अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर और चीन-यूरोपीय संघ से तनाव का असर चीन की इकॉनमी पर कितना ज्यादा पड़ेगा. ये निश्चित है कि भारत भविष्य में कभी भी इस अंतर को भर नहीं सकता. चीन के 2019 के सकल घरेलू उत्पाद (14 ट्रिलियन डॉल) के आंकड़े तक पहुंचने के लिए भारत को 15 साल तक लग सकते हैं.

चीन सैन्य सुधार और आधुनिकीकरण में लगातार आगे बढ़ रहा है. महत्वाकांक्षी 2015 के सुधारों ने संयुक्त थिएटर कमांड की स्थापना की, पीएलए रॉकेट फोर्स को पूर्ण सेवा की स्थिति में अपग्रेड किया, अंतरिक्ष और साइबर क्षमताओं को संयोजित करने के लिए स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स बनायी और एक संयुक्त लॉजिस्टिक्स सपोर्ट फोर्स की स्थापना की. इन सुधारों का समर्थन एक मजबूत रक्षा-औद्योगिक आधार द्वारा किया जाता है जो हथियार प्रणालियों के उत्पादन में आत्मनिर्भर है जो दुनिया में सबसे अच्छे के साथ तुलना करते हैं.

पीएलए के आधुनिकीकरण के लिए एक बड़ा बजट रखा गया है. इसमें 2016 तक औसतन 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई. महामारी के आर्थिक प्रभाव के बावजूद, मई में घोषित पीएलए बजट में 6.6 प्रतिशत बढ़कर 178 बिलियन डॉलर हो गया. ये भारतीय रक्षा बजट के आकार का लगभग तीन गुना है. एक यूरोपीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व सैन्य खर्च और हथियार व्यापार, 2030 तक, चीन का सैन्य खर्च $ 736 बिलियन हो सकता है. (पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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