100 साल पूरे होने पर जश्न मनाएगी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी, भारत के लिए खतरा क्यों?

100 साल का जश्न पूरे धूमधाम से मनाया जाएगा. (सांकेतिक तस्वीर)

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (Chinese Communist Party) अपने 100 वर्ष पूरे होने पर जश्न मनाने जा रही है लेकिन ये भारत के लिए सचेत होने का वक्त है. दरअसल सीमाओं पर जिस तरीके से चीन ने रेल नेटवर्क तैयार किया है वो पूरी तरह से भारत की घेरेबंदी की तैयारी है.

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नई दिल्ली. पिछले कुछ सालों में चीन (China) ने तिब्बत में सबसे ज्यादा निर्माण (Construction) किया है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है हाई स्पीड रेल नेटवर्क. तिब्बत की राजधानी ल्हासा से भारत के अरुणाचल प्रदेश की दहलीज तक वो अपनी रेल को ले आया है. पिछले साल ही निंगची तक उसने रेल ट्रैक बिछाने का काम पूरा कर दिया. ये जगह अरुणाचल से महज 17 किलोमीटर दूर है. जुलाई महीने की पहली तारीख को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल पूरे होने के मौके पर इस ट्रैक पर 160 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से ट्रेन दौड़ने भी लगेगी. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस रेल प्रोजेक्ट के बारे में पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि ये चीन की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

ये सबसे चुनौतिपूर्ण प्रोजेक्ट इसलिए भी था क्योंकि ये पूरा रेल सेक्शन 15000 फुट की उंचाई वाले तिब्बत पठार में है और यहां काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण है. ल्हासा से निंगची तक के 435 किमी के इस रेलवे सेक्शन में 47 सुरंगें है जिनमें 14 हाई रिस्क टनल हैं तो 7 ग्रेटेस्ट रिस्क टनल हैं. इसके अलावा 120 पुल बनाए गए हैं और इस लाइन पर चीनी रेल 160 किलोमीटर प्रतिघंटे से दौड़ सकती है. हाई स्पीड ट्रेन को ल्हासा से अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक पहुंचने में सिर्फ 2 से 3 घंटे का समय लगेगा. अब तक सड़क मार्ग से पहुंचने में 7 से 8 घंटे का समय लग जाता था.

इस ट्रैक के बनने के बाद से चीनी सेना का मूवमेंट तेज और आसान हो जाएगा
हालांकि ल्हासा और निंगची में एयरपोर्ट भी हैं जिनका इस्तेमाल सैन्य कार्रवाई के लिए किया जाता है. लेकिन चीन इन एयरपोर्ट्स के जरिए सैन्य सामग्रियों को एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने में सक्षम इसलिए नहीं है क्योंकि ये 15000 फुट से ज्यादा की उचाई पर हैं. लेकिन इस ट्रैक के बनने के बाद से चीनी सेना का मूवमेंट तेज और आसान हो जाएगा जो कि भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

ये रेलवे सेक्शन शुचिआन तिब्बत रेलवे प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जो कि ल्हासा को चेंगदू से जोड़ेगा. चिंता वाली बात तो ये है कि निंगची से चेंगदू तक के ट्रैक में ये अरुणाचल प्रदेश की सीमा के साथ साथ गुजरेगा. सिर्फ ये ही ट्रैक नहीं है जो कि भारत के लिये चिंता का सबब हो सकता है.

नेपाल तक अपने रेलवे नेटवर्क को लेकर जाएगा
चीन रेलवे लाइन के जरिए भी भारत को घेरने में लगा है. ल्हासा से शिघास्ते तक की रेल लाइन साल 2014 मे शुरू हो चुकी है और यहां से चीन ने प्लान तैयार किया है कि वो नेपाल तक अपने रेलवे नेटवर्क को लेकर जाएगा. शिघास्ते से काठमांडू रेल ट्रैक का काम जारी है तो सूत्रों की मानें तो उत्तराखंड से लगती नेपाल और तिब्बत की सीमा के पास बुरांग काउंट तक चीनी रेल ट्रैक ले जाने का प्लान है.

रेल लाइन का जाल बिछाने का काम 50 के दशक से ही शुरू कर दिया था
एक प्लानिंग में तो सिक्किम और भूटान के बीच में पड़ने वाला तिब्बत का याडांग काउंटी भी है जो कि भारत के लिहाज से इसलिए भी खतरनाक हो जाएगा क्योंकि ये डोकलाम के बेहद करीब है. बहरहाल चीन ने कब्जाए तिब्बत में अपना वर्चस्व बढ़ाने के मकसद से रेल लाइन का जाल बिछाने का काम 50 के दशक से ही शुरू कर दिया था. इस रेलवे प्रोजेक्ट का नाम क्विंगघई-तिब्बत रेलवे प्रोजेक्ट है. ये कुल 1956 किलोमीटर का है.

इसे दो अलग-अलग चरण में शुरू किया गया. पहले चरण में जिनिंग से गोलमुड के बीच 815 किलोमीटर लंबाई रेलवे लाइन का काम साल 1984 में ही खत्म कर दिया गया था और गोलमुड से तिब्बत में राजधानी ल्हासा तक के तकरीबन 1142 किलोमीटर के रेलवे ट्रैक को बनाने का काम 2005 तक पूरा कर दिया गया.

चीन का दावा ये है कि रेल लाइन का ये जाल बीजिंग को तिब्बत ऑटोनोमस रीजन से जोड़ेगा जिससे वहां पर विकास के काम तेजी से किए जा सकें लेकिन इस रेलवे लाइन को बिछाने के पीछे सबसे बड़ी वजह थी कि वो भारतीय सीमा पर जल्द से जल्द पहुंच सके.

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