Opinion: गांवों का शहरी कनेक्शन अब होगा बेहतर, UP-बिहार जैसे राज्यों को मिलेगा फायदा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (फाइल फोटो)

केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने गुरुवार को 20 लाख करोड़ के पैकेज की दूसरी किस्त के तहत जो घोषणाएं की हैं उससे साफ है कि सरकार ने गांवों में रहने वाली बड़ी आबादी के शहरी कनेक्शन की अहमियत को ध्यान में रखते हुए बेहद जरूरी फैसले किए हैं, जिसका सबसे ज्यादा लाभ उत्तर प्रदेश और बिहार की बड़ी ग्रामीण आबादी को होगा.

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भारत में सरकारों को इसका अनुमान भी न होता कि भारत के पूर्वी हिस्से, खासकर हिन्दी पट्टी के राज्यों उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)और बिहार से देश के बाकी हिस्सों में इतनी बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने जाते हैं. बहरहाल, देर से भले ही आए पर दुरुस्त आए की तर्ज पर केन्द्र सरकार ने इन प्रवासी मजदूरों को केन्द्र में रखते हुए अहम फैसले लिए हैं. केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने गुरुवार को 20 लाख करोड़ के पैकेज की दूसरी किस्त के तहत जो घोषणाएं की हैं उससे साफ है कि सरकार ने गांवों में रहने वाली बड़ी आबादी के शहरी कनेक्शन की अहमियत को ध्यान में रखते हुए बेहद जरूरी फैसले किए हैं, जिसका सबसे ज्यादा लाभ उत्तर प्रदेश और बिहार की बड़ी ग्रामीण आबादी को होगा.

एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड की बात अहम
एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड इसकी अहम कड़ी है. चूंकि इसके जरिए राशन कार्ड की पोर्टेबिलिटी हो सकेगी, लिहाजा इसका सबसे ज्यादा लाभ प्रवासी मजदूरों को मिल सकेगा. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोरोना के दौर में बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूर अपने मूल राज्य लौट चुके हैं या लौट रहे हैं. इनकी वापसी की बड़ी वजह यही है कि जहां वे प्रवास कर रहे थे वहां उनके लिए खाने का टोटा था. अब यदि उन्हें उनके मूल राज्य से जारी राशन कार्ड पर प्रवास के राज्य में राशन मिलने की व्यवस्था हो रही है तो देर-सबेर वे अपने प्रवास वाले राज्य में वापस जाने की पहल कर सकेंगे.

हालांकि एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड को 1 जून 2020 से लागू करने की तैयारियां पहले से चल रही थीं और अधिकांश राज्य इसके लिए तैयार भी थे, लेकिन कोरोना से उपजे हालात में प्रवासी मजदूरों को हुई असुविधा के बीच इस योजना को लागू करने का ऐलान अवसर का बेहतर इस्तेमाल ही माना जाएगा. वैसे भी कोरोना के संकट को अवसर में बदलने की बात सरकार लगातार करती भी रही है. इसी तरह प्रवासी मजदूरों के लिए सस्ते किराए के मकान की योजना शुरू करने की घोषणा के भी दूरगामी मायने हैं. लॉकडाउन के गए दो महीनों में हमनें देखा कि मुंबई, पुणे, सूरत जैसे शहरों से प्रवासी मजदूरों के पलायन की बड़ी वजह उनके रहने की व्यवस्था का बेहद खराब होना भी था. एक कमरे में कई मजदूरों को रहना पड़ रहा था. वह भी लॉकडाउन के दौर में कहीं निकल न पाने की मजबूरी के साथ.

अब सरकार कर रही है ये बात
अब यदि सरकार ऐसे प्रवासी मजदूरों के लिए रहने की बेहतर व्यवस्था की बात कह रही है तो गांवों को लौट गए मजदूरों को वापस शहर लाने में मदद मिलेगी. ध्यान देने की बात है कि महानगरों व औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में उत्तर कोरोना काल में उद्योग-धंधों को वापस पहले की तर्ज पर चलाने की बड़ी शर्त इन शहरों से गांवों को लौट गए मजदूरों को वापस लाना है. राशन कार्ड की नई व्यवस्था व रहने के बेहतर इंतजाम का ऐलान कर सरकार ने इनके रोटी-कपड़ा-मकान की जरूरत के बड़े हिस्से को सुनिश्चित करने का भरोसा देने की कोशिश की है. यह भरोसा और पुख्ता हो इसके लिए ही गांव लौट गए ऐसे प्रवासी मजदूरों को दो महीने तक अनाज की मुफ्त सप्लाई और मनरेगा में काम देने की घोषणा की गई है.

किसानों को मिलेगी हिम्‍मत
ठीक इसी तरह किसानों के लिए कम ब्याज दरों पर कर्ज की सुविधा और उसमें पशुपालकों व मछुआरों को भी शामिल करना यह संकेत देता है कि गांवों की अर्थव्यवस्था बेपटरी न होने पाए इसे सुनिश्चित करने की कोशिशें की जा रही हैं. देश के वैसे राज्य जो आदिवासी बहुल हैं और कृषि कार्यों की तुलना में वनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता ज्यादा है, वहां आदिवासियों के रोजगार के लिए विशेष घोषणाएं भी की गईं हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में रेहड़ी-पटरी कारोबारियों के लिए विशेष लोन योजना की घोषणा भी कोरोना के दौर में इस तबके के सामने खड़ी हुई रोजी-रोटी की भीषण समस्या का ही प्रतिफल है. लॉकडाउन ने इस तबके की कमर तोड़ कर रख दी है. लोन की योजना से इन्हें संभलने का अवसर मिल सकेगा.

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