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'दिल्ली की अदालतों में वर्दी का सन्नाटा तूफान का इशारा तो नहीं'

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Updated: November 7, 2019, 12:11 PM IST
'दिल्ली की अदालतों में वर्दी का सन्नाटा तूफान का इशारा तो नहीं'
राजधानी दिल्ली में पुलिस और वकीलों के बीच लड़ाई बड़ी चिंता का विषय बन गई है. (News18 Creative)

दो ऐसे विभाग जिन पर कानून की रक्षा की जिम्मेदारी है, जब अपने हाथ में कानून ले लें तो कितनी गंभीर स्थिति हो सकती है, इसी का विश्लेषण करती है ये रिपोर्ट

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  • Last Updated: November 7, 2019, 12:11 PM IST
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भारत के इतिहास में संभवत: बुधवार सबसे काला दिन कहा जाएगा, जब देश की धड़कन दिल्ली (Delhi) की अदालतों में पुलिस (Police) का कोई पहरा नहीं था. मुवक्किल थे, वकील थे, जज साहेबान थे, काले कोट वाले, काले गाउन वाले सब थे, लेकिन पुलिस नहीं थी, उसका पहरा नहीं था. लॉकअप्स के बाहर सन्नाटा पसरा था. शुक्र मनाइए कि अदालतें आतंकी, गुंडों, बदमाशों से बचीं और सुरक्षित रहीं, वरना वर्दी का सन्नाटा दहशत पसंदों के लिए खुली, बेखौफ हिंसा के बोनान्जा ऑफर से कम नहीं था.

सन्नाटे की वजह थी वर्दी की नाराजगी, जिसका दिल दिल्ली ने तोड़ दिया. इंसाफ देने, उसकी पैरवी करने और इंसाफ का ख्वाब लिए आए लोगों से लेकर बंदियों तक की हिफाजत की जिम्मेदारी होमगार्ड्स, पुलिस के जवानों पर रहती है, लेकिन देशभक्ति का गर्व और सम्मान का गर्मजोश अहसास देने वाली उसकी वर्दी की इज्जत भरी कचहरी, भरी दोपहरी तार-तार कर दी गई.

पुलिस वालों को दो दिन पहले तीस हजारी और उसके बाद साकेत, कड़कडड़ूमा कोर्ट परिसरों में वकीलों ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा. लॉक अप तोड़ने से रोकने वाले पुलिसकर्मियों को जिंदा जलाने की कोशिश की गई. कोर्ट परिसरों में वकीलों के हाथों पुलिस वालों को पिटते, जान बचाते हुए भागते देखना बिल्कुल थरथराने और दहशत पैदा करने वाला अनुभव था. जहां कानून के रखवाले (वकील), कानून की रक्षा करने वालों (पुलिस) को पीट रहे थे.


एक भीड़ पीट रही थी, पुलिस वाले जान बचाकर भाग रहे थे. भीड़ की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, कोई सोच नहीं होती, सोमवार को पहली बार महसूस हुआ कि भीड़ का कोई पेशा भी नहीं होता. ऐसी पेशेवर भीड़ आपको किसी गांव-शहर-देहात, इलाके, सूबे, पार्टी, सत्ता, सरकार से लेकर मीडिया, सोशल मीडिया तक मिल जाएगी, जो एक साथ पूरी ताकत से हमला बोल शिकार को चित कर देती है.

भ्रष्टाचार की तरह भीड़ की हिंसा भी हमारे समाज का स्वीकार्य हिस्सा बनती जा रही है, हमारे सिस्टम ने ऐसी सोच को मान्यता दी, समय-समय पर महिमा मंडित किया, ट्विटर-व्हाट्सऐप की पेड-अनपेड फौज ने ऐसी आत्मघाती सोच को प्रसारित किया है. नतीजा, हमने घर-घर हत्यारे, मॉब लिंचर्स पैदा कर दिए हैं. वकील भी हमारे समाज का ही हिस्सा हैं, जो सिस्टम के दिमाग को भोथरा कर देने वाली साजिशों के शिकार होते हैं. कानून का पाठ पढ़ते-पढ़ते, अपनी दलीलों से इंसाफ के लिए संघर्ष करते-करते कानून को ही धता बताने और पाठ पढ़ाने लगते हैं. दिल्ली की कोर्ट में पुलिस-वकील संघर्ष की घटना के बाद पुलिस वालों ने फटी वर्दी में खुद को देखा, तो आत्मा कांप उठी, लेकिन घटना के बाद बड़ी अदालत को वकीलों के पक्ष में खड़ा महसूस किया और अपने आला अफसरों को मौन देखा, तो तार-तार आत्मा जार-जार रोई और कैंडल मार्च की शक्ल में इंडिया गेट और पुलिस मुख्यालय के सामने जाकर मुट्ठियां भींच कर चीखने लगी.

अब कांपने की बारी थी पुलिस के महकमे के आला अफसरों की, दिल्ली के एलजी दरबार की, केन्द्र की सरकार की, क्योंकि अब खतरा बड़ा है, पुलिस में विद्रोही तेवर दिखे हैं, अब पूरे देश में पुलिस मुट्ठियां भींचकर अपने ही अफसरों और सरकार के सामने खड़े हो जाएं और कहने लगें कि हम भी इंसान हैं, हमारे भी मानव अधिकार हैं. पुलिस स्ट्राइक कर दे, जैसा दिल्ली में हुआ, तो सोचिए देश में अराजकता का क्या भयावह मंजर होगा. यह आने वाले तूफान का वो इशारा है, जिसे देख सब रहे हैं, महसूस सब कर रहे हैं, लेकिन बोल कोई नहीं रहा. दुआ कीजिए कि यह झगड़ा गैंगवार में न बदल जाए.

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First published: November 7, 2019, 12:11 PM IST
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