यादों में सिद्धार्थ: सादगी और विनम्रता से भरे थे कैफे कॉफी डे के मालिक

कम उम्र में इतनी कामयाबी मिलने के बाद भी सिद्धार्थ हमेशा बेहद शालीन रहे. वो अपने कर्मचारियों की मदद के लिए हमेशा खड़े रहते थे. इतना ही नहीं वो हर अच्छे-बुरे मौके पर अपने गांववालों और पड़ोसियों से मिलते भी रहते थे.

D P Satish | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 11:06 AM IST
यादों में सिद्धार्थ: सादगी और विनम्रता से भरे थे कैफे कॉफी डे के मालिक
पारंपरिक खेलों में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी
D P Satish
D P Satish | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 11:06 AM IST
साल 2012...दिसंबर का महीना और दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड. मैं बेंगलुरु जाने के लिए दिल्ली एयपोर्ट पर था. फ्लाइट सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर थी, लेकिन मैं 4:30 एयरपोर्ट पहुंच गया था. थोड़ी भूख लगी तो मैं एक साउथ इंडियन आउटलेट के बाहर इडली और फिल्टर कॉफी के लिए लाइन में खड़ा हो गया. पीछे से मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा. मुड़ा तो वो कोई और नहीं बल्कि कैफे कॉफी डे (सीसीडी) के मालिक वीजी सिद्धार्थ थे.

सिद्धार्थ गहरे रंग की जैकेट पहने और हाथ में ब्रिफकेस के साथ खड़े थे. मैंने कन्नड़ में उनसे बात की और पूछा इतनी सुबह आप यहां क्या कर रहे हैं? आप दिल्ली कब आए. उन्होंने कन्नड़ में ही जवाब दिया कि वो कल रात किसी अरजेंट काम से यहां आए थे और वो अब घर वापस जा रहे हैं. फूड कोर्ट में काफी भीड़ थी, लेकिन सिद्धार्थ एक आम आदमी की तरह मेरे साथ कॉफी और इडली खाते रहे.

एयर इंडिया की फ्लाइट करीब दो घंटे लेट थी. सिद्धार्थ ने कहा कि उन्हें एयरपोर्ट की लाउंज में बैठना पसंद नहीं है और वो इकॉनमी क्लास के पैसेंजर के साथ ही बैठना पसंद करते हैं. फ्लाइट में देरी थी लिहाजा हम दोनों कैफे कॉफी डे (सीसीडी) में कॉफी पीने चले गए. वो लाइन में खड़े होकर दो कप कैपेचिनो खरीद कर लाए. सीसीडी के स्टाफ को ये नहीं पता था कि वो अपने मालिक को कॉफी बेच रहे हैं. दरअसल सिद्धार्थ को पब्लिसिटी की चकाचौंध से दूर रहना पसंद था. कपंनी के कई लोग न तो उनसे मिले और नहीं उन्हें जानते थे.

सिद्धार्थ ने कैफे कॉफी डे (सीसीडी) का पहला स्टोर 1996 में बेंगलुरू में खोला


बेहद विनम्र थे
सादगी और विनम्रता सिद्धार्थ की पहचान थी. कामयाबी को उन्होंने कभी भी अपने सिर पर सवार नहीं होने दिया. वो मलाड इलाके से जुड़े इंसान थे. लिहाजा विनम्रता उनकी खून में ही थी. मैं भी मलाड इलाके से था लिहाजा वो मुझे खासा पसंद करते थे.

'कॉफी किंग' कहलाना उन्हें पसंद नहीं था. वो हमेशा कहते थे कि वो एक आम आदमी हैं. सिद्धार्थ मध्य कर्नाटक के चिकमंगलुर के रहने वाले थे. ये इलाका कॉफी के लिए खासा मशहूर है. सिद्धार्थ के पिता कॉफी उगाने वाले एक अमीर किसान थे. वो गांव में ही पले बढ़े और मैंगलोर से उन्होंने ग्रेजुएशन किया.
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1996 में हुई सीसीडी की शुरुआत
80 के दशक में शेयर बाज़ार को समझने के लिए वो मुंबई चले गए. 1990 के दशक में वापस लौट कर उन्होंने कॉफी का कारोबार शुरू किया. साल 1996 में बेंगलुरु के ब्रिज रोड पर उन्होंने सीसीडी का पहला आउटलेट खोला. अगले 23 साल में सीसीडी आउटलेट की संख्या 3500 से ज्यादा पर पहुंच गई. आज घर-घर में सीसीडी को लोग जानते हैं.

वो एक ऐसे कारोबारी थे जिसने वर्ल्ड क्लास ब्रैंड बनाया. सीसीडी के अलावा टूरिजम में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी. उन्होंने मैसूर के पास सेराई और सिकाडा नाम से दो रिजॉर्ट भी बनाए. ये खासा लोकप्रिय है.

अपने इलाके से खासा लगाव भी था
कर्नाटक में मालनाड के लोगों से सिद्धार्थ को खासा लगाव था. यहां के हज़ारों लड़के और लड़कियों को उन्होंने ट्रेनिंग देकर सीसीडी में नौकरी दी. एक अनुमान के मुताबिक सीसीडी में मालनाड इलाके से दस हज़ार से ज़्यादा लोग काम करते हैं.

पारंपरिक खेलों में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी. एक बार तो जंगली सुअरों के शिकार पर वो मेरे से करीब 45 मिनट तक बातें करते रहे. कम उम्र में इतनी कामयाबी मिलने के बाद भी वो हमेशा बेहद शालीन रहे. वो अपने कर्मचारियों की मदद के लिए हमेशा खड़े रहते थे. इतना ही नहीं वो हर अच्छे-बुरे मौके पर अपने गांववालों और पड़ोसियों से मिलते भी रहते थे. लोगों को उनकी कमी हमेशा खलेगी.

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First published: July 31, 2019, 10:50 AM IST
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