कांग्रेस अध्यक्ष पद पर वापसी को दिमाग में रख राहुल गांधी ने कृषि कानूनों पर सरकार को घेरने की तैयारी शुरू की

कृषि कानूनोंको लेकर कांग्रेस की आक्रामकता के पीछे राहुल गांधी की अपनी जमीन की राजनीति और उसका एजेंडा फिर से हासिल करने की इच्छा है (फाइल फोटो)
कृषि कानूनोंको लेकर कांग्रेस की आक्रामकता के पीछे राहुल गांधी की अपनी जमीन की राजनीति और उसका एजेंडा फिर से हासिल करने की इच्छा है (फाइल फोटो)

वहीं आदिवासियों की रक्षा के लिए ओडिशा (Odisha) की नियामगिरी पहाड़ियों में एक वेदांता परियोजना (Vedanta project) के खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन किया था. उनका प्रिय प्रोजेक्ट भूमि अधिग्रहण बिल (land acquisition bill) था जिसे गरीब किसानों की भूमि की रक्षा के लिए यूपीए (UPA) लेकर आया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 29, 2020, 5:48 AM IST
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(पल्लवी घोष)

नई दिल्ली. कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress leader Rahul Gandhi) की राजनीति जमीन के मुद्दे के साथ शुरू हुई थी- जब 2008 में एक सांसद के तौर पर उन्होंने मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के टीकमगढ़ में एक गरीब आदिवासी परिवार (Tribal Family) के यहां रुकने के बाद कलावती का मुद्दा उठाया था और मायावती (Mayawati) के खिलाफ गौतम बुद्ध नगर में 2011 के भट्टा परसौल गांव में उनका युद्ध शुरू हुआ था. उन्होंने एक परियोजना के लिए तत्कालीन मायावती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल गांव (Bhatta Parsaul village) में जमीन छीनने के खिलाफ यह कदम उठाया था. उन्हें गिरफ्तार (Arrest) कर लिया गया और फिर रिहा कर दिया गया था.

वहीं आदिवासियों की रक्षा के लिए ओडिशा (Odisha) की नियामगिरी पहाड़ियों में एक वेदांता परियोजना (Vedanta project) के खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन किया था. उनका प्रिय प्रोजेक्ट भूमि अधिग्रहण बिल (land acquisition bill) था जिसे गरीब किसानों की भूमि की रक्षा के लिए यूपीए (UPA) लेकर आया था. हालांकि जल्द ही यह आलोचना भी हुई कि राहुल गांधी ने किसानों के मुद्दों को छोड़ दिया और गायब हो गए. लेकिन अब वह वापस आ गये हैं. कृषि कानूनों (Farm Laws) को लेकर कांग्रेस की आक्रामकता के पीछे राहुल गांधी की अपनी जमीन की राजनीति और उसका एजेंडा (land politics and agenda) फिर से हासिल करने की इच्छा है.



राहुल-प्रियंका कृषि कानून आंदोलन पर कांग्रेस की रणनीति को बारीकी से तय कर रहे
सूत्रों का कहना है कि राहुल और प्रियंका दोनों कृषि कानून आंदोलन पर कांग्रेस की रणनीति को बारीकी से तय कर रहे हैं. राहुल ने स्पष्ट कर दिया है कि इसे पूरी तरह से एक आंदोलन बनाना होगा. इसके लिए राज्यों और जिला इकाइयों को आगे बढ़कर कदम उठाना होगा और धीरे-धीरे केंद्र पर दबाव बनाना होगा. यही वजह है कि भगत सिंह डे पर राज्य प्रदेश कांग्रेस समितियों को आंदोलन करने के लिए कहा गया. यहां तक ​​कि एक सामान्य रूप से मितभाषी और अनिच्छुक पंजाब के मुख्यमंत्री को भी इसके लिए आना पड़ा. अमरिंदर सिंह एक दिन के धरने पर थे. वैसे उन्होंने यह कहकर विवाद पैदा कर दिया कि कृषि कानून किसानों को आईएसआई की गड़बड़ियों में फंसने के लिए असुरक्षित बना देंगे.

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फिर कांग्रेस शासित राज्यों को सलाह देते हुए सोनिया गांधी का फैसला आया कि राज्यों को संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत कानून पारित करने की संभावना देखनी चाहिए जो राज्य विधानसभाओं को एक केंद्रीय कानून को ओवरराइड करने के लिए एक कानून पारित करने की अनुमति देता है जो तब आता है राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजा जाता है. इसके पीछे सरल तर्क है और इसे राहुल गांधी ने आगे बढ़ाया.

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सुप्रीम कोर्ट में गये मामले का मतलब शीर्ष अदालत का फैसला कृषि कानून के पक्ष में हो सकता है. और राफेल मामले की तरह यह उसके लिए एक हार के तौर पर देखा जाएगा.
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