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OPINION: भारत को नेट जीरो इमिशन पर लाने का संकल्‍प है मोदी का मास्‍टरस्‍ट्रोक, होंगे कई लक्ष्‍य पूरे

OPINION: भारत को नेट जीरो इमिशन पर लाने का संकल्‍प है मोदी का मास्‍टरस्‍ट्रोक, होंगे कई लक्ष्‍य पूरे

COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.  (फाइल फोटौ)

COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फाइल फोटौ)

COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के भाषण में 2070 तक भारत को कार्बन उत्सर्जन में शून्य (2070 Net Zero Emission) पर लाने के लिए एक सराहनीय प्रतिबद्धता दिखाई दी. प्रधानमंत्री द्वारा की गयी इस घोषणा से भारत एक साथ कई उद्देश्यों को साधने में सफल हो सकता है. यह न केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है बल्कि भारतीयों के लिए ज्यादा ऊर्जा के स्रोतों तक पहुँच, उच्च स्तरीय जीवन को सुनिश्चित करता है,और एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने की संभावना रखता है जो $ 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के सपने को अपनी मुठ्ठी में कर सकता है, अगर सब कुछ ठीक रहा.

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    अभिजीत अय्यर -मित्रा 
    नई दिल्‍ली.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की नेट-जीरो की प्रतिबध्दता वह कदम है जिससे एक साथ कई उद्देश्‍यों को साधा जा सकता है. यह प्रतिबद्धता न केवल जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से निपटने में कारगर सिद्ध होगी बल्कि भारतीयों के लिए और अधिक ऊर्जा प्राप्ति को सुनिश्चित भी करेगा. COP26 शिखर सम्मेलन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में 2070 तक भारत को कार्बन उत्सर्जन में शून्य (2070 Net Zero Emission) पर लाने के लिए एक सराहनीय प्रतिबद्धता दिखाई दी. प्रधानमंत्री द्वारा की गयी इस घोषणा से भारत एक साथ कई उद्देश्यों को साधने में सफल हो सकता है. यह न केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है बल्कि भारतीयों के लिए ज्यादा ऊर्जा के स्रोतों तक पहुँच, उच्च स्तरीय जीवन को सुनिश्चित करता है,और एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने की संभावना रखता है जो $ 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के सपने को अपनी मुठ्ठी में कर सकता है, अगर सब कुछ ठीक रहा.

    उनके भाषण के प्रमुख शब्दों में इस बात पर जोर रहा कि विकसित देशों द्वारा वादा किए गए 1 ट्रिलियन डॉलर के जलवायु परिवर्तन निपटने के लिए वित्त पोषण को सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र कभी हकीकत में जमीन पर नहीं उतरा. इसका अर्थ यह है कि आर्थिक रूप से किये गए वादे कभी भी कोई परिणाम नहीं दे सके. इसके समानांतर, पिछले कुछ महीनों में, भारत में रिलायंस समूह सौर और हाइड्रोजन दोनों ऊर्जा के मामले में ग्रीन एनर्जी की ओर एक तेजी से आगे बढ़ रहा है. यदि आप इन दोनों को आपस में जोड़ दें, आपको महसूस होगा कि प्रधानमंत्री मोदी का अगला कदम क्या होने वाला है: संभवतः आर्थिक मदद या पोषण के बदले उत्पादन, संग्रह और भंडारण के मामले में ग्रीन टेक्नोलॉजी की मांग करना. यह विशेष रूप से बहुत समझदारी भरा कदम है क्योंकि यह भारत में ग्रीन एनर्जी सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकता है जिसमें देश के भीतर अत्यंत उच्च उत्पादों का निर्माण शामिल है जोकि देश के अंदर महत्वपूर्ण मूल्यों की बढ़ोत्तरी को भी बढ़ावा देगा. इस मामले में केवल एक समस्या है कि इस तकनीकों के ज्यादातर पेटेंट सम्बंधित देश की सरकारों के पास नहीं हैं बल्कि प्राइवेट सेक्टर के हाथों में हैं. इस तरीके के मामलों में, फंडिंग के बदले में दो विकल्प देखे जा सकते हैं. पहला है कि इंटेलेक्चुअल प्रॉपटी अधिकारों को पूरी तरह से खरिज किया जाए या आईपीआर सुरक्षा लागू करने से इंकार किया जाए. यह सुनने में जितना खतरनाक लगता है, यह नया नहीं है.

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    2003 में हुए WIPO कांफ्रेंस में भारत ने वीडियो और ऑडियो सामग्री पर आईपीआर के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था, यह तर्क देते हुए कि सामग्री ने भारत के ग्रामीण क्षेत्र के डिजिटलीकरण को आगे बढ़ाया है. यह काफी हद तक सच साबित हुआ क्योंकि भारत की ग्रामीण जनता ने मोबाइल फ़ोन को उत्साहजनक रूप से स्वीकार और इसका उपयोग किया, जो टीवी और लैंडलाइन फ़ोन तक भी अपनी पहुँच नहीं बना पायी थी, केवल इसके प्रयोग से प्रभावित होकर नहीं बल्कि फोन के बहुआयामी प्रकृति से जिसमें मनोरंजन प्रमुख कार्य करता था, चाहे वह Youtube वीडियो हो या व्हाट्सएप फॉरवर्ड मैसेज या म्यूजिक ऐप. यह आगे का सबसे सस्ता तरीका हो सकता है. फिर भी, मुझे शक है कि प्रधानमंत्री इस मार्ग को चुनेंगें. बजाय इसके सबसे ज्यादा संभावित परिणाम यह होगा कि वह भारतीय कंपनियों द्वारा ग्रीन टेक्नोलॉजी के आईपीआर प्राप्त करने की लागत में महत्वपूर्ण सब्सिडी की मांग करेंगे या नयी तकनीक के सह-निर्माण के समझौतों में भारतीय कंपनियों को तरजीह देने की मांग भी कर सकते हैं. यह विशेष रूप से एक समझदारी भरा कदम होगा क्योंकि क्योंकि भारत की ओर से उन्होंने जो प्रतिबद्धता की है, उसे देखते हुए अब उनके पास खेलने के लिए दो कार्ड हैं: आईपीआर को जब्त करने की छड़ी या आईपीआर पर सब्सिडी के तौर पर मिलने वाली गाजर. अगर थोड़ा भी पीछे मुड़ कर देखा जाए तो यह पता चलेगा कि विनिर्माण, जीवाश्म ईंधन के आयात के विकल्पों और ऊर्जा के एक जगह से दूसरे जगह पर ले जाने में नुक्सान और चोरी को कम करने के मामले में, हम अगले 10 वर्षों में कम से कम $-4.5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. पीछे छोड़ने के प्रभाव को ज्यादा गहराई में जाकर देखेंगें तो वह इस आंकड़े को और भी ज्यादा बढ़ा देगा. यह तब देश के सबसे कमजोर लोगों के लिए एक अपंग गैर-उत्पादक आयात बोझ लगाए बिना ऊर्जा की समान पहुंच के लिए और साथ ही साथ मिलियन में रोजगार पैदा करने की भारी संभावना को खोलता है.

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    सबसे महत्वपूर्ण, भारतीय औसत फैक्ट्री मजदूर की प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी को दिखाने के लिए इन निर्माण सम्बंधित नौकरियों को नेशनल स्किल मिशन से जोड़ दिया गया है जिसने माध्यमिक शिक्षा के लिए एक वास्तविक विकल्प के रूप में कार्य करते हुए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तमाम बक्सों का पत्ता काट दिया है. पिछले 70 सालों में भारतीय नीति नियंताओं की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि नीतियां कभी भी ऐसी नहीं थीं जिससे कई समस्याओं का संधान किया जा सकता और अक्सर यह लोगों तक सही रूप में आंकड़े और सूचना न पहुंचाने की बीमारी से ग्रसित दिखाई दिए. फिर भी, जब हम स्वच्छ ऊर्जा के संबंध में भारत में की गई मोदी की योजनाओं और घोषणाओं की व्यापकता और आयात को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई खुद को साबित करने वाली घोषणा नहीं है. यह साफ़ साफ़ दिखाई देता है कि इस विचार के पीछे काफी विचार मंथन और कई विषयों की जानकारी की जानकारी सम्मिलित है. फिर भी सवाल यह उठता है ( जोकि भारत में हमेशा एक समस्या रहा है ) कि जमीन पर इस विचार को कैसे उतारा जाए जब पूरी निर्भरता एक कमजोर ब्यूरोक्रेसी पर है. आईये देखते हैं कि EU और US में ग्रीन एनर्जी को लेकर अभी तक क्या सही नहीं हुआ है? यूरोपीय संघ की ग्रीन ऊर्जा के पागलपन ने पवन ऊर्जा जैसी गंभीर रूप से बेकार तकनीक में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. फिर भी यूरोप जो अब करने जा रहा है वह है इसके पूरी तरह से आर्गेनिक और समर्थ शहर और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर ध्यान देना.

    दूसरी तरफ, यूनाइटेड स्टेट्स की समस्या इसके ठीक विपरीत है. इसकी बाजार केंद्रित नीति व्यवस्था का अर्थ है कि बेकार प्रौद्योगिकियों पर फिजूलखर्ची अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं. हालांकि, एक बड़े शहरी फैलाव, लगभग गैर-मौजूद सार्वजनिक परिवहन, और एक जहरीले उपनगरीय-कार कम्यूटर संचालित मॉडल के साथ अमेरिकी शहर पृथ्वी पर सबसे अधिक अस्थिर और असमान हैं जो उच्च ऊर्जा उपभोक्ता लाने के अलावा समाज के सबसे कमजोर वर्गों पर भारी लागत लगाता है. भारतीय ब्यूरोक्रेसी को EU और अमेरिका की गलतियों से सीखने की आवश्यकता है. यदि प्रधानमंत्री के सपनों को पूरी तरह से साकार करना है, तो शहरी नियोजन और शहरों के उत्थान के लिए उनके फैलाव और फुटप्रिंट्स को भारी रूप से कम करते हुए पूरी तरह से नए दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाना चाहिए. इसी समय ग्रीन ऊर्जा का चुनाव भी बड़ी सावधानी के साथ करना होगा. संभवतः यह प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा उल्लेखनीय रूप से की गयी नीति-निर्माण का छोटा सा अंश है जिसे सर्वाधिक क्षमतावान बनने के लिए गंभीर रूप से ध्यान देने की जरूरत है. हम सही राह पर चल पड़े हैं ऐसा लगने लगा है. थोड़े और प्रयासों और सावधानियों के साथ हम और बेहतर रास्ते पर जा सकते हैं.

    (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

    Tags: 2070 Net Zero Emission, Climate Change, Prime Minister Narendra Modi

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