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OPINION: जहां हर पांच साल में बदलती है सरकार, उस केरल में भी क्यों हार गई कांग्रेस?

कोट्टायम के पाला में एक सभा को संबोधित करते राहुल गांधी. (INCIndia Twitter/23 March 2021)

Kerala Assembly Election Result: केंद्र स्तर की तरह ही केरल के नेता भी लोगों के मन से पूरी तरह अनजान थे. मुस्लिम (Muslims) और ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय के बीच तैयार हुए अविश्वास से निपटने के लिए कोई भी रणनीति नहीं थी. ये दोनों समुदाय यूडीएफ का बड़ा वोटबैंक थे.

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    (विनोद मैथ्यू)

    नई दिल्ली. केरल चुनाव में भी कांग्रेस (Congress) की हार हुई है. अब इसके कई कारण हो सकते हैं. जैसे अच्छी प्लानिंग न होना, जमीनी स्तर पर जुड़ाव खोना और गलत अनुमान लगाकर खुद में ही प्रसन्न रहना. पार्टी ने चुनाव प्रचार के अहम पहलू कहे जा रहे सोशल मीडिया (Social Media) को भी मतदान के कुछ दिन पहले ही तैयार करने का सोचा, जबकि वाम दल महीनों पहले से ही इस काम में लगा हुआ था.

    यह अभी भी नहीं समझा जा सका है कि केरल में कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रमुख रहे अनिल एंटनी कर क्या रहे थे. अब हालात कुछ भी हो सकते हैं. यह भी हो सकता है कि पार्टी की तरफ से नेता को कुछ ही घंटों पहले इस काम के आदेश मिले हों. पार्टी का यह फैसला 15वीं केरल विधानसभा के चुनाव की तैयारियों की झलक देता है.

    पार्टी ने करीब 1 हफ्ते से ज्यादा समय के इंतजार के बाद उम्मीदवारों की सूची जारी की. यह ऐसा था कि दिल्ली में बैठे पार्टी नेताओं समेत अन्य नेता इस बात को मान रहे थे कि वे कांग्रेस सरकार बनाने के लिए यूडीएफ का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं और चुनाव महज औपचारिकता है. शायद वे इस थ्योरी पर भी काफी ज्यादा भरोसा कर रहे थे कि हर चुनाव के बाद एक गठबंधन दूसरे की जगह लेता है. 1980 के बाद से ही ऐसा होता चला आ रहा है. इसलिए जब कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची में नए नामों का पार्टी नेताओं ने स्वागत किया और पार्टी के कमजोर संगठनात्मक संरचना को भुला बैठे थे. साथ ही इस बात को भी नजरअंदाज किया था कि पार्टी में कुछ जरूरी बदलाव की आवश्यकता है.

    सीएम उम्मीदवार के बारे में आखिरी समय तक अनुमान लगाने देने की हाईकमान की योजना थी. वे राज्य के नेताओं को गंवाना नहीं चाहते थे. ऐसे में सावधानियों पर भावुकता भारी पड़ी और ये नेता छोटे-छोटे हिस्से बनकर रह गए. किसी एक व्यक्ति में भी खुद को नेता की तरह पेश करने का साहस नहीं था. परिणाम यह हुआ कि एलडीएफ के पास कमान संभालने के लिए सीएम पिनराई विजयन थे. जबकि, कांग्रेस के मामले यह चीज शून्य थी. कोविड के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे राज्य के लोगों के बीच एक परिचित चेहरे को चुनने को लेकर कोई संकोच नहीं था. उन्होंने परेशानियों के ऊपर स्थिरता को चुना.

    केंद्र स्तर की तरह ही केरल के नेता भी जमीनी हवा से पूरी तरह अनजान थे. मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय के बीच तैयार हुए अविश्वास से निपटने के लिए कोई भी रणनीति नहीं थी. ये दोनों दल यूडीएफ का बड़ा वोटबैंक थे. स्पष्ट है कि यूडीएफ को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके मुस्लिम जनाधार का एक बड़ा हिस्सा मालाबार में लेफ्ट की ओर जा रहा था. ऐसा ही कुछ ईसाई समुदाय के साथ मध्य त्रावणकोर में हो रहा था. इसके अलावा आत्मसंतुष्टि, दूरदर्शिता और नेतृत्व की कमी के बीच केंद्र और राज्य स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व अपर्याप्त रहा. बीते निकाय चुनाव में हुए नुकसान के बाद भी उन्होंने मुश्किलों पर ध्यान नहीं दिया और हाई कमान ने भी केरल के वरिष्ठ नेताओं की चेतावनियों को नजरअंदाज किया.

    इसके अलावा विपक्ष के नेता रमेश चेन्नीथला की तरफ से सरकार पर लगाए गए आरोप भी असरदार साबित नहीं हुए. ज्यादातर पिनराई विजयन पर साधे गए निशानों को रमेश जनता तक नहीं ले जा सके. साथ ही केसी वेणुगोपाल की तरफ से की गई कोशिशें भी दिल्ली में असर डाल रही थीं. वेणुगोपाल हाई कमान की जगह पर अपने प्रयास कर रहे थे.

    अंत में यही है कि अगर कांग्रेस को केरल में फिर सत्ता जमानी है, तो उन्हें जमीनी स्तर से खुद को तैयार करना होगा. साथ ही चुनावों को AICC तक ले जाकर वर्किंग कमेटी को सक्रिय करना होगा. तब तक पार्टी विश्वसनीयता पर उठते सवाल और आर्थिक परेशानी का सामना करती रहेगी. ये परेशानियां कांग्रेस में शामिल हुए नए चेहरों को कमजोर करती रहेंगी.

    (ये लेखक के निजी विचार हैं. हिंदी में अनुवाद किए गए इस लेख को अंग्रेजी में विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)