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OPINION: केजरीवाल की AAP ने कांग्रेस से मिलाया 'हाथ' तो क्या होगा इसका असर?

News18Hindi
Updated: January 6, 2019, 12:53 PM IST
OPINION: केजरीवाल की AAP ने कांग्रेस से मिलाया 'हाथ' तो क्या होगा इसका असर?
राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में केजरीवाल गठबंधन करना चाहते हैं ताकि दिल्ली में 2020 के चुनाव में वो अपनी गद्दी बचा सके

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  • Last Updated: January 6, 2019, 12:53 PM IST
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(सिद्धार्थ मिश्रा)

अजय माकन छह महीने में दो बार दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दिल का इलाज कराने के बाद फ्रांस से वापस लौट चुकी हैं. वह पहले ही कह चुकी हैं कि वह दिल्ली में पार्टी का जिम्मा फिर से संभालने के लिए तैयार नहीं है. हालांकि ये सही समय है कि एक बार फिर से उन्हें ज़िम्मा सौंप दिया जाए.

वैसे कांग्रेस के अंदर कई ऐसे नेता हैं जो नहीं चाहते कि शीला दीक्षित को फिर से ज़िम्मेदारी दी जाए. उन्हें तभी मौका मिल सकता है जब पार्टी के कुछ नेताओं को लगेगा कि उनके न आने से क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में बाधाएं आ रही है. दिल्ली में कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन पार्टी की लोकसभा चुनाव की रणनीति पर निर्भर करती है. दिल्ली के अगले प्रदेश अध्यक्ष को ये तय करना होगा कि उन्हें आम आदमी पार्टी (AAP)के साथ आगामी चुनाव के लिए गठबंधन करना है या नहीं.



ऐसा लग रहा है कि शीला दीक्षित आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के मूड में नहीं है. वो उनसे दूरी बनाए रखने में ही ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं.



राष्ट्रीय राजनीति में केजरीवाल का कद दिल्ली और कुछ हद तक पंजाब में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा कर ही बढ़ा है. केजरीवाल के आने से पहले शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. शीला दीक्षित के नेतृत्व में ही कांग्रेस को साल 1998, 2003 और 2008 में तीन बार जीत मिली थी. दिल्ली में विकास कार्यों के बावजूद शीला दीक्षित की सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों ने डुबो दिया. खास कर केन्द्र में कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया. लिहाजा साल 2013 के चुनाव में शीला दीक्षित को करारी हार का सामना करना पड़ा.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में केजरीवाल का असर पड़ोसी राज्य पंजाब में भी दिखा. यहां उनकी पार्टी को चार सीटों पर जीत मिली. साथ ही केजरीवाल की पार्टी ने कांग्रेस के वोट शेयर को भी नुकसान पहुंचाया. लिहाजा कई सीटों पर अकाली और बीजेपी के गठबंधन को फायदा मिला. अमृतसर में कैप्टन अमरिंदर सिंह को अरुण जेटली के खिलाफ जीत मिली. लेकिन उनकी पत्नी प्रणीत कौर को पटियाला में आप के हाथों हार का सामना करना पड़ा. मनमोहन सरकार में मंत्री रहीं कौर को इससे पहले पटियाला सीट पर 1999, 2004 और 2009 में मिली थी. लेकिन 2014 के चुनाव में धर्मवीर गांधी ने उन्हें हरा दिया.

पांच साल बाद हालात बदल गए हैं. शीला दीक्षित एक बार फिर से अपनी खोई ज़मीन को पाना चाहती हैं. अमरिंदर सिंह अपनी रियासत को फिर से पाना चाहते हैं. जबकि केजरीवाल अपनी गिरती लोकप्रियता को फिर से पटरी पर लाना चाहते हैं. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में केजरीवाल गठबंधन करना चाहते हैं ताकि दिल्ली में 2020 के चुनाव में वो अपनी गद्दी बचा सके.

केजरलीवाल कांग्रेस के साथ न सिर्फ दिल्ली में बल्कि पंजाब और हरियाणा में भी गठबंधन करना चाहते हैं. जिस तरह से विधानसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने का प्रस्ताव पर हंगामा हुआ और उसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे एचएस फूलका का इस्तीफा. ये सब इस बात की ओर इशारा करते हैं कि AAP हर हाल में UPA के साथ हाथ मिलाना चाहती है.

अभी तक किसी ने गठबंधन को लेकर पुष्टि नहीं की है. लेकिन कांग्रेस और आप के स्थानीय नेता लगातार गठबंधन होने की बात कर रहे हैं. पिछले दिनों कांग्रेस ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कोई गठबंधन नहीं किया था. इस बात से कांग्रेस के नेताओं के हौसले बुलंद हैं.

हरियाणा में चुनाव को लेकर चौटाला के परिवार की स्थिति साफ नहीं है. बीजेपी सत्ता विरोधी लहर से परेशान हो सकती है. ऐसे में कांग्रेस को हरियाणा में जीत के लिए केजरीवाल के साथ हाथ मिलाने की ज्यादा जरुरत नहीं है. हरियाणा में आप ने अब तक अपनी कोई खास मौजूदगी भी दर्ज नहीं कराई है. पंजाब में अमरिंदर सिंह अकले चुनाव लड़ने के मूड में हैं. हाल के दिनों में आप का पंजाब में कद घटा भी है.

साल 2015 में करारी हार के बाद अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेस ने दिल्ली में अपनी हालात मजबूत की है. साल 2017 में स्थानीय निकाय के चुनाव और विधानसभा के उपचुनाव में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया था.

साल 2015 के चुनाव में AAP को मुस्लिम, सिख और एससी/एसटी वोट का फायदा मिला था. AAP और कांग्रेस के बीच 40 फीसदी से ज़्यादा वोट शेयर का फांसला था. दो साल बाद स्थानीय निकाय के चुनाव में ये फांसला घट कर पांच फीसदी पर पहुंच गया था. जबकि विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस आगे निकल गई थी.

आज AAP की ताकत मुसलमानों का वोट है. मुसलमान उस पार्टी को वोट देंगे जो बीजेपी को सत्ता में आने से रोके. पिछले साल विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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First published: January 6, 2019, 12:01 PM IST
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