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Opinion: विकास का मंत्र निकला खोखला, 2019 आम चुनाव में किधर जाए जनता

Opinion: विकास का मंत्र निकला खोखला, 2019 आम चुनाव में किधर जाए जनता

News18 Creative

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मतदाताओं के नजरिए से देखा जाए तो पांच साल पहले 2013 में जो 'उम्‍मीद' की बात थी वह इस बार नदारद रही.

    (भवदीप कांग)

    साल 2018 में एक बार फिर से 'फॉर्मूला राजनीति' की वापसी हुई. चुनाव लड़ने के तरीके नए हो गए मगर रणनीति बनाने के तरीके वही पुराने और आजमाए हुए थे. अंतर केवल यह आया कि रणनीति को धरातल पर लाने वाले खिलाड़ी बदल गए. कांग्रेस किसानों को चांद देने का वादा कर रही थी, बहुसंख्‍यक जनता की भावनाओं से जुड़ रही थी और अन्‍य पिछड़ा वर्ग को लुभा रही थी. दूसरी ओर बीजेपी अपनी पसंद की कहानी के अभाव में तड़प रही थी.

    मतदाताओं के नजरिए से देखा जाए, तो पांच साल पहले साल 2013 में जो 'उम्‍मीद' की बात थी वह इस बार नदारद रही. विकास का मंत्र खोखला साबित हुआ, लेकिन इसकी जगह कोई और ले भी नहीं सकता. विकल्‍प के रूप में कोई विजन नहीं, बेहतर भविष्‍य का कोई वादा नहीं.

    विपक्षी दलों में विजन की कमी के चलते केंद्र के खिलाफ बन रही सत्‍ता विरोधी लहर धीमी गति से आगे बढ़ रही है. साल 2018 के पहले हिस्‍से में उत्‍तर-पूर्व और कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता के बीच अपना आकर्षण खो दिया, ऐसा स्‍थानीय सत्‍ता विरोधी लहर के चलते हुआ. साल के अंत तक तस्‍वीर बदल गई. कांग्रेस ने केंद्र के खिलाफ गुस्‍से का फायदा उठाया.

    हिंदी भाषी राज्‍यों में चुनाव नतीजों की सबसे खास बात कांग्रेस का बीजेपी के खिलाफ जनता के गुस्‍से का फायदा उठाना रहा. बीजेपी कभी भी सत्‍ता बचाने में अच्‍छी नहीं रही, वैसे कोई भी पार्टी ऐसा कर पाने में अक्‍सर नाकाम ही रहती है. और यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है.


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    कांग्रेस के पुराने धुरंधरों ने बीजेपी सरकारों के खिलाफ जनता में मौजूद नाराजगी का फायदा उठाया और वोट बटोरे. इसके चलते पहली राहुल गांधी एक विश्‍वसनीय राजनेता के रूप में उभरे. सत्‍ता का विटामिन पाकर कांग्रेस स्‍वस्‍थ नजर आ रही है, लेकिन इस खुराक का एक नुकसान भी है. तीन राज्‍यों में उसकी नई नवेली सरकारों के चलते 2019 के आम चुनावों में उसकी राह कठिन हो सकती है.

    पार्टी को अब मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ में सत्‍ता विरोधी लहर बनने से रोकना होगा, जिससे कि लोकसभा चुनाव में बुरा असर न पड़े और पार्टी में गुटबाजी होने से रोकना होगा. चुनाव नतीजों के बाद सरकार बनाने में पुराने घोड़ों पर दांव लगाने के चलते युवा पीछे रह गए हैं.

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    वैसे कांग्रेस से ज्‍यादा दिक्‍कतें तो बीजेपी के पास है. स्थिर कमाई और बेरोजगारी से उपजी सत्‍ता विरोधी लहर बीजेपी का बड़ा सिरदर्द है. इसके अलावा एससी/एसटी एक्‍ट उसके गले की हड्डी बन गया है, तो कर सुधारों ने उसके कट्टर समर्थकों का विश्‍वास भी हिला दिया है.

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    हालांकि, पार्टी के लिए सबसे बड़ी समस्‍या है नतीजों के अपने पक्ष में न आने पर नेतृत्‍व के मसले का भड़कना. आम चुनावों के परिणाम विपरीत होने पर दूसरे नेता ऊपर आने की कोशिश कर सकते हैं. बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह अपनी कार्यशैली के चलते आलोचना झेलते रहे हैं. कर्नाटक में सरकार बनाने की कोशिश, डिजिटल मार्केटिंग पर जरूरत से ज्‍यादा जोर और एनडीए के घटक दलों को साथ न रख पाने के चलते वे निशाने पर हैं. अब जीतने के लिए उन्‍हें झुकना ही होगा जैसा कि उन्‍होंने बिहार में किया है.


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    यह हमें आरएएस की भूमिका की ओर ले जाता है. रणनीतिक रूप से साल के पहले एक सार्वजनिक  कार्यक्रम में कट्टरपंथी रुख के बाद संघ ने कोशिश की थी कि राम जन्मभूमि मुद्दे पर वापस आया जाए और वो आ भी गया.  यह पीएम मोदी की विकास छवि को कम करता है.

    साल 2018 के अंत में, बीजेपी कमजोर है, कांग्रेस कुछ हद तक मजबूत है और शक्ति का संतुलन क्षेत्रीय ताकतों के साथ मजबूती से है. लेफ्ट फ्रंट मरणासन्न है, टीडीपी और अकाली दल को नुकसान हुआ है. हालांकि कांग्रेस पर टीआरएस की प्रचंड जीत ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि गठबंधन में टीआरएस, टीएमसी, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और बीएसपी-एसपी अपने-अपने राज्यों में लोकसभा सीटों के बहुमत से जीतने की ओर अग्रसर हैं. दो राष्ट्रीय पार्टियों से स्वतंत्र होने में पूरी तरह सक्षम हैं. (जो करीब 185 सीट है) TRS प्रमुख के चंद्रशेखर का संघीय मोर्चे का सपना इतना आसान नहीं है.

    अब तक कांग्रेस के पास बीजेपी की तुलना में अधिक सहयोगी (DMK, NCP, JMM और JD-S) हैं, लेकिन यह हमेशा चुनावी रूप से लाभकारी नहीं है. तेलंगाना में हार इस बात का गवाह है, जहां टीडीपी के साथ उसका गठजोड़ 49 प्रतिशत के संयुक्त वोट शेयर के आधार पर हुआ था, लेकिन 17 प्रतिशत की चौंकाने वाली बात सामने आई. इसके अलावा यह संख्या के खेल में बहुत पीछे है और एक सहयोगी के लिए दी गई प्रत्येक सीट से उनकी गिनती बिगड़ सकती है.

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    साल 2019 में प्रमुख खिलाड़ियों के चुनावी भाग्य अनिश्चित हैं, यहां तक कि वे एक ही पुराने नारे का सामना कर रहे हैं. इस बीच मतदाता उत्सुकता से भरा हुआ है, जो उत्साह से उस परिवर्तन की प्रत्याशा नहीं दिखा रहा है, जो लोकसभा 2014 के चुनाव में साफ दिख रहा था.

    Tags: Amit shah, BJP, Congress, General Election 2019, Narendra modi, Rahul gandhi

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