जो बाइडन और तेजस्वी यादव से सीखें राहुल गांधी, चुनावी जीतने के लिए जरूरी हैं ये सबक

राहुल ने कृषि कानून, जीएसटी, लॉकडाउन और नोटबंदी पर PM को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया.
राहुल ने कृषि कानून, जीएसटी, लॉकडाउन और नोटबंदी पर PM को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया.

बाइडन (Joe Biden) और तेजस्वी (Tejashwi Yadav) ने अपने चुनाव अभियान से बता दिया है कि विरोधियों की धुन पर नाचने से बेहतर है अपना नैरेटिव सेट करें. दोनों नेताओं से कांग्रेस (Congress) काफी कुछ सीख सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 10, 2020, 5:26 AM IST
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नई दिल्ली. साल 2008 में बराक ओबामा (Barack Obama) ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में "यस, वी कैन" का नारा दिया और धुआंधार प्रचार करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति में बाजी मार ली.

दिल्ली से बहुत दूर, साल 2020 में जब अमेरिका ने जो बाइडन (Joe Biden) को अपना राष्ट्रपति चुना, कांग्रेस पार्टी ने कहा, 'शायद हम भी जीत सकते हैं.'

पिछले कुछ हफ्तों तक, बहुत सारे राजनीतिक पंडितों को लगता था कि दुनिया में दक्षिणपंथ की हवा चल रही है. चर्चा आम थी कि डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने 'अमेरिकियों के लिए अमेरिका' का नारा देकर जनता की सही नब्ज पकड़ी है. साथ ही राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की दावेदारी में उनके जीतने की संभावना ज्यादा है. ट्रंप की तुलना तुरंत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से होने लगी, जो आज भी देश के सबसे पॉपुलर नेता हैं और उनका 'आत्मनिर्भर' अभियान 'अमेरिकियों के लिए अमेरिका' की धुन पर है.



दूसरी ओर देश में विपक्ष की राजनीति को कोई भाव नहीं मिलता. खासतौर पर कांग्रेस को. बेतरतीब काडर, लीडरशिप पर घालमेल और राज्यों में छितराया हुआ समर्थन... साथ ही उभरते क्षत्रपों की चुनौती. मुकाबला आक्रामक बीजेपी से, जो लगातार देश के उन हिस्सों में अपनी पकड़ मजबूत बना रही है, जहां अभी तक उसकी सरकार नहीं है. ये सारी चीजें कांग्रेस की आशाओं को धुंधला कर देती हैं.
ये सारी चीजें तब हल्की लगने लगीं, जब ये स्पष्ट हो गया कि जो बाइडन ही अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति हैं. बाइडन को बहुत सारे लोगों ने छुपा रूस्तम कहते हुए कमजोर आंका, जिनके साथ राजनीतिक रूप से कमजोर कमला हैरिस (Kamala Harris) उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनावी मैदान में थीं. फिर भी अमेरिकी जनता का समर्थन बाइडन और हैरिस के पक्ष में रहा. अमेरिकी चुनाव परिणाम स्पष्ट होने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने ट्वीट कर बाइडन का स्वागत किया और उन्हें नए अमेरिका की उम्मीद करार दिया. सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने अमेरिकी चुनाव परिणाम पर लगातार नजर बनाए रखा और अपने करीबियों से कहा कि अमेरिका ने हमें रास्ता दिखाया है. कांग्रेस भी चुनाव जीत सकती है.

सवाल ये है कि कांग्रेस, अमेरिका और बाइडन-हैरिस से क्या सीख सकती है? सियासी रणनीतिकार दिलीप चेरियन कहते हैं, "दो बड़े सबक हैं, जिन्हें राजनीतिक पार्टियों को सीखना चाहिए ताकि वे वापसी कर सकें. पहला कि साथ चुनाव लड़ रहे सहयोगी बहुत मायने रखते हैं. हैरिस ने बाइडन को वजन दिया, जिसकी उनको बहुत जरूरत थी. हैरिस की वजह से कई सारी चीजें ठीक हुईं. क्या आपके सहयोगी को बराबर सहयोग और सम्मान मिलता है और क्या वे सही निशाना साध सकते हैं?"

दूसरा, एक सकारात्मक जवाब, खासतौर पर वोटरों के समक्ष रखना चाहिए, ताकि जब कैंपेन शुरू हो तो ये आपकी मदद करता है. अगर सामने वाले व्यक्ति ने आपकी किसी भी सलाह को मानने से इनकार किया हो. राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बाइडन ने अपना फोकस जनता के मुद्दों पर रखा और इससे उनको मदद मिली. साथ ही ऐसे किसी मुद्दे में नहीं उलझे जिससे उनका प्रतिद्वंदी उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ बता सके.

ट्रंप का सार्वजनिक तौर पर मास्क पहनने से इनकार करना और कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने में हुई गलतियों के साथ अन्य मुद्दे उनके खिलाफ गए. बाइडन ने इस चीज को तुरंत पकड़ा. अमेरिका में संक्रमण के मामले बढ़ते रहे और राष्ट्रपति ट्रंप इसको हल्के में लेते रहे. बाइडन की टीम को वोटरों को दिखाने के लिए एक मुद्दा मिल गया, कि देखो डेमोक्रेट नेता ने अपनी जिम्मेदारी समझी, जबकि ट्रंप जिम्मेदारी से बचते रहे. एक यही चीज है, जिसको कांग्रेस मुद्दा बनाना चाहती है.

महामारी लगातार बढ़ रही है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से शुरू में दी गई चेतावनी को केंद्र सहित सबने नजरअंदाज किया. उस पर से देश में अपर्याप्त मेडिकल सुविधाएं - टीम राहुल को लगता है कि इस मुद्दे को लगातार उठाकर हवा का रूख बदला जा सकता है. हालांकि चुनाव अभी बहुत दूर है.

बाइडन ने अपने कैंपेन में नौकरियों और यूनाइटेड अमेरिका का वादा किया. डेमोक्रेट नेता इतने चालाक निकले कि वे ट्रंप के 'अमेरिकियों के लिए अमेरिका' की लाइन पर नहीं गए... बिना ये दिखाए कि वे कुछ वर्गों की बात कर रहे हैं, बाइडन ने सबको साथ रखते हुए यूनाइटेड अमेरिका के नारे को लगातार दोहराया. अब कांग्रेस को भी यही करना है. सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाना, अनुच्छेद 370 के खात्मे का खुले तौर पर आलोचना करना सहित तमाम मुद्दे हैं, जिन पर बीजेपी के जाल में कांग्रेस फंसती रही है.

बिहार में तेजस्वी यादव इस ट्रैप को समझ गए... आरजेडी का पूरा कैंपेन नौकरी और बेरोजगारी पर केंद्रित रहा. उन्होंने कश्मीर, राम मंदिर और नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दों पर सवालों का जवाब देना भी उचित नहीं समझा. यहां तक कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रचार के लिए जब बिहार आने वाले थे, तेजस्वी ने ट्वीट करते हुए उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री बिहार के मुद्दों पर अपनी बात रखेंगे. पूरे चुनाव में तेजस्वी 'वोकल फॉर लोकल' का शंखनाद फूंकते रहे.

बाइडन ने अपनी डिबेट्स में लगातार इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका को सुपरपावर बने रहने की आवश्यकता है, एकजुट रहना है और कोरोना वायरस महामारी से लड़ना है, नौकरियां देनी हैं. राहुल गांधी के सलाहकार भी उन्हें सलाह दे रहे हैं कि बीजेपी की पिच पर बैटिंग ना की जाए, जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी बैकफुट पर रह जाती है. हिंदू और मुसलमान वोटरों में किसी भी तरफ झुकाव प्रदर्शित किए बिना बैलेंस रखा जाए. साथ ही वामपंथी विचारों (राहुल के करीबियों पर आरोप है कि वे लेफ्ट के प्रति सहानुभूति रखते हैं) के प्रति भी नरम रवैया ना अपनाएं. जनता से जुड़े मुद्दों जैसे कि नौकरी, स्वास्थ्य सुविधाओं पर अपना फोकस रखें.

कांग्रेस की उम्मीदें बंधी हैं और सूत्रों का कहना है कि जल्द ही एक समूह का गठन किया जाएगा, जो पार्टी की वर्कशीट और स्ट्रैटजी की समीक्षा करेगा. लेकिन, कांग्रेस के लिए तेजस्वी यादव और बाइडन से सीखने को अभी बहुत कुछ बचा है.
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