OPINION: सबरीमाला और तीन तलाक मुद्दे पर एक जैसी है बीजेपी और कांग्रेस की सोच!

OPINION: सबरीमाला और तीन तलाक मुद्दे पर एक जैसी है बीजेपी और कांग्रेस की सोच!
सबरीमाला मंदिर

अगर सामाजिक रीति रिवाज कानून से सुसंगत नहीं हैं तो इसे बदल दिया जाना चाहिए. सिर्फ संविधान के मूलभूत सिद्धांत ही हैं जिनमें बदलाव नहीं किया जा सकता.

  • News18.com
  • Last Updated: November 16, 2018, 10:55 AM IST
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(भवदीप कांग)

तीन तलाक और सबरीमाला मामले में महिलाओं के अधिकारों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दोहरे मापदंड अपना रही है. बीजेपी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ना चाहती है लेकिन अपनी हिंदू बहनों की फिक्र उसे नहीं है. इसका मतलब ये है कि यह लिंग समानता का मुद्दा नहीं है बल्कि सिर्फ इतना मामला है कि 'मेरा पुरुष प्रधान समाज तुम्हारे पुरुष प्रधान समाज से बेहतर है.'

साल 1990 से ही बीजेपी यूनीफॉर्म सिविल कोड की हिमायत महिलाओं के अधिकारों और लिंग समानता का हवाला देकर करती रही है. 2014 के अपने मैनिफेस्टो में भी बीजेपी ने लिखा था, 'बीजेपी को लगता है कि जब तक यूनीफॉर्म सिविल कोड को नहीं अपनाया जाता तब तक लिंग समानता नहीं आ सकती क्योंकि इससे महिला अधिकारों की रक्षा होगी.' लेकिन अगर लिंग समानता के नाम पर बीजेपी यूनीफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करती है तो वो सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश का विरोध कैसे कर सकती है. वो भी तब जब महाराष्ट्र सरकार ने साल 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट को अंडरटेकिंग दी थी कि वो राज्य के सभी मंदिरों में महिलाओं को प्रवेश देगी.



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इस पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने सफाई देते हुए लोगों की धार्मिक भावनाओं का हवाला दिया. बजाय कोई कानूनी या तार्किक आधार बताए उन्होंने कहा कि देश में 13 मंदिर ऐसे हैं जिनमें पुरुषों के प्रवेश पर रोक है.

तो फिर उन हज़ारों महिलाओं की भावनाओं का क्या जो सबरीमाला मंदिर में प्रवेश चाहती हैं. सामान्य भावनाएं तो शनि शिंगनापुर शिरडी में भी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ थीं लेकिन सरकार द्वारा दबाव बनाने पर मंदिर ने इसका रास्ता निकाल लिया. एक पार्टी के रूप में तो बीजेपी जनभावना का सम्मान कर सकती है लेकिन सरकार के रूप में वो कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है.

इस मामले में कांग्रेस की स्थिति और भी खराब है. चाहे वो शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरी तरह से सम्मान न करना हो और चाहे तीन तलाक के मामले में आपत्ति उठाने को लेकर हो. इसके अलावा राहुल गांधी ने बिना किसी संकोच के कहा कि मैं व्यक्तिगत स्तर पर तो सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करता हूं लेकिन मेरी पार्टी की केरल इकाई इसका समर्थन नहीं करती. इसलिए मैं पार्टी के साथ हूं. किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के लिए इस तरह का बयान देना काफी अजीब है.

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अगर सामाजिक रीति रिवाज कानून से सुसंगत नहीं हैं तो इसे बदल दिया जाना चाहिए. सिर्फ संविधान के मूलभूत सिद्धांत ही हैं जिनमें बदलाव नहीं किया जा सकता. अगर सुप्रीम कोर्ट कोई आदेश देती है तो वो कानून होता है और सभी राजनीतिक दलों का कर्तव्य है कि वो इसका सम्मान करें. बजाय एक साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध करने के उन्हें सामाजिक संगठनों को इन बात के लिए मनाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम किया और संविधान की वैधता को बनाए रखा. अब केरल सरकार द्वारा इसे लागू करवा के अपना काम करना है. पर सवाल ये है कि कब राजनीतिक पार्टियां अपना काम करेंगी और समाज व राज्य के बीच ब्रिज का काम करेंगी.
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