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RSS से अछूतों जैसा व्यवहार कहां तक जायज़? कांग्रेस में ही बंटे लोग

RSS से अछूतों जैसा व्यवहार कहां तक जायज़? कांग्रेस में ही बंटे लोग

21 मई को वीरभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देने के बाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी (फोटोः पीटीआई)

21 मई को वीरभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देने के बाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी (फोटोः पीटीआई)

तकनीकी रूप से देखा जाए तो पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी किसी पार्टी से संबंध नहीं रखते हैं. इसके बावजूद तमाम कांग्रेसी नेताओं ने इस बात का विरोध किया.

    (वेंकटेश केसरी)
    पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नागपुर में आरएसएस की मीटिंग में भाग लिया तो कांग्रेस में बहस छिड़ गई. इस बात को लेकर पार्टी के अंदर ही दो अलग-अलग विचारों को लेकर लोग बंट गए हैं. एक वर्ग का मानना है कि कांग्रेस अपनी मूल विचारधारा को नहीं बदल सकती और हरसंभव तरीके से उसे भगवा ताकत का विरोध करना चाहिए. जबकि दूसरे वर्ग का मानना है कि लगातार आरएसएस का विरोध करने की वजह से पार्टी को नुकसान होगा, क्योंकि पिछले 90 सालों में आरएसएस ने समाज में काफी गहरी जड़ें जमा ली हैं.

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    लोकसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है. कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों का भी मानना है कि आरएसएस ने 2014 में लोकसभा चुनाव में मोदी की लोगों तक पहुंच काफी मज़बूत की, जिसकी वजह से बीजेपी को बहुमत मिला.

    गौरतलब है कि 1980 में अयोध्या मामले के बाद से बीजेपी की पहुंच हिंदीभाषी क्षेत्रों के साथ-साथ केंद्र में भी बढ़ने लगी. तभी से कांग्रेस ने बीजेपी पर हमले तेज़ कर दिए. दरअसल अयोध्या मामले के बाद से ही कांग्रेस कमज़ोर होने लगी. मंडल आंदोलन ने भी कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया और इसकी वजह से भी कांग्रेस का सामाजिक आधार घटा. इस आंदोलन की वजह से यूपी, बिहार व हरियाणा में कई क्षेत्रीय पार्टियां भी काफी मज़बूती से उभरीं.

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    कांग्रेस उस समय इस खतरे को नहीं भांप पाई. पार्टी को लगता था सत्ता का रास्ता गांधी-नेहरू परिवार से होकर जाता है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी शुरुआती दिनों में आरएसएस से होने वाले इस खतरे को नहीं भांप पाए.


    तकनीकी रूप से देखा जाए तो पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी किसी पार्टी से संबंध नहीं रखते हैं. इसके बावजूद तमाम कांग्रेसी नेताओं ने इस बात का विरोध किया. लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अपने को इस विवाद से दूर ही रखा और इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं की.

    वहीं कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा की गई टिप्पणी की वजह से आरएसएस और भी सुर्खियों में आ गई. अब पार्टी के कुछ नेता इस बात पर विचार करने लगे हैं कि क्या आरएसएस के साथ 'अछूतों' जैसा व्यवहार करना ठीक है और क्या पार्टी को इससे फायदा होगा?

    एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, "हम आरएसएस की बांटने वाली और सांप्रदायिक विचारधारा का विरोध करते रहे हैं. लेकिन क्या यह ठीक होगा कि बीजेपी से हर तरह की बातचीत बंद कर दी जाए. खासकर उस वक्त जब संघ अपनी जड़ें पूरे देश में फैला रहा है.''


    उन्होंने ये भी कहा कि बीएसपी, जनता परिवार (जेडीयू, जेडीएस, लोक जनशक्ति पार्टी), तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल व और भी कई पार्टियों ने आरएसएस के राजनीतिक चेहरे वाली पार्टी बीजेपी के साथ सत्ता में भागीदारी निभाई है और इसके बावजूद वो अपने आपको सेक्युलर मानते हैं. फिर ऐसी स्थिति में कांग्रेस द्वारा आरएसएस से अछूतों जैसा व्यवहार करना कहां तक जायज़ है.

    एक नेता ने कहा कि अगर आरएसएस राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर रहा है तो उस पर रोक लगा देनी चाहिए. लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो सिर्फ इसलिए आरएसएस से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो अल्पसंख्यकों के प्रति एक खास तरह की विचारधारा रखता है. आरएसएस को दुश्मन करार देना कांग्रेस को बहुसंख्यक समुदाय से दूर कर सकता है. उन्होंने कहा कि हालांकि अलग-अलग कांग्रेस सरकारों ने आरएसएस को बैन किया है लेकिन राजीव गांधी और इंदिरा गांधी ने कभी भी आरएसएस के बड़े नेताओं से बातचीत बंद नहीं की.

    उनका कहना है कि राहुल गांधी का सार्वजनिक रूप से पीएम मोदी पर हमला बोलना ठीक है, लेकिन आरएसएस का विरोध करना कहां तक फायदेमंद होगा. खासकर तब जब कि मोहन भागवत ने खुलकर मोदी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के विचार का विरोध किया. कांग्रेस को फैसला लेना पड़ेगा कि वो अल्ट्रा-सेक्युलर रास्ते को अपनाए या कि मध्यम मार्ग को. खास बात ये है कि पार्टी को इस बात को निर्धारित करना होगा कि इसका वोटर कौन है. सही या गलत, लेकिन प्रणब दा को नागपुर में आमंत्रित करके मोहन भागवत ने पार्टी के अंदर एक नई बहस छेड़ दी है, जिसे राहुल गांधी भी अनदेखा नहीं कर सकते.

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