Lok Sabha Exit Poll 2019 : कांग्रेस का वो सीक्रेट प्लान जो परवान नहीं चढ़ सका, नहीं मिला यूपी, दिल्ली में कोई लाभ

Lok Sabha Exit Poll 2019 : लोक सभा के एग्जिट पोल आ चुके हैं. तकरीबन सभी पोल एनडीए को बहुमत दिखा रहे हैं. साथ ही कांग्रेस तकरीबन हर पोल में 100 से नीचे अटकती नजर आ रही है.

अफसर अहमद | News18Hindi
Updated: May 22, 2019, 4:46 PM IST
Lok Sabha Exit Poll 2019 : कांग्रेस का वो सीक्रेट प्लान जो परवान नहीं चढ़ सका, नहीं मिला यूपी, दिल्ली में कोई लाभ
एग्जिट पोल से जो निकला वह वो नहीं था, जो राहुल ब्रिगेड ने सोचा था.
अफसर अहमद
अफसर अहमद | News18Hindi
Updated: May 22, 2019, 4:46 PM IST
लोकसभा के एग्जिट पोल आ चुके हैं. तकरीबन सभी पोल एनडीए को बहुमत दिखा रहे हैं. साथ ही कांग्रेस तकरीबन हर पोल में 100 से नीचे अटकती नजर आ रही है. थोड़ा पीछे जाकर सोचिए... मार्च में चुनाव की तारीखों का ऐलान होने वाला था. राहुल और उनकी सोशल मीडिया ब्रिगेड पूरी ताकत से कभी पीछे न हटने को तैयार बीजेपी पर ताबड़तोड़ राफेल के बाउंसर मार रही थी. जोश ज्यादा इसलिए भी था कि तीन राज्यों एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ताजा-ताजा जीत मिली थी, लेकिन 19 मई की शाम 6.30 बजे के बाद टीवी के मुंह से जो निकला वह वो नहीं था, जो राहुल ब्रिगेड ने सोचा था. बहुमत तो छोड़िए कांग्रेस वहां भी नहीं थी जहां वो कह सके कि नई सरकार की लाइन हमसे ही शुरू होगी. आखिर हुआ क्या...?

कांग्रेस का दोहरा दांव



चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस ने आम चुनाव को जीतने के अवसर के साथ-साथ पार्टी को मजबूत करने के सुनहरे मौके के रूप में देखा. ऐसा सोचना गलत भी नहीं है. कई राज्यों में गठबंधन पॉलिटिक्स के चलते कांग्रेस की हालत उस स्टेपनी की तरह हो चुकी है, जो है तो लेकिन सिर्फ जरूरत के वक्त ही गिनी जाएगी.

अपना तुरुप का दांव चलना

आम चुनाव में कांग्रेस ने इस बार कई बोल्ड स्टेप लिए, जिसमें एक था अपने सबसे मजबूत नेता को मैदान में उतारना. मसलन हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा, एमपी में बेहद मुश्किल सीट भोपाल से दिग्विजय सिंह को उतारना. चौंकाने वाली बात तब हुई, जब आम चुनाव से कुछ वक्त पहले हरियाणा में हुए एक विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला को ही मैदान में उतार दिया. तब भी सबके मन में यह आया कि कांग्रेस के जीतने की उम्मीद कम थी. लेकिन, पार्टी ने ऐसा क्यों किया, अब भी ये सवाल जस का तस है. अब सब 23 तारीख का इंतजार कर रहे हैं.

यूपी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रचार शुरू करते ही कह दिया था कि एसपी-बीएसपी को गठबंधन करना है तो हमारे पास आएं.


गठबंधन से परहेज
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एक और बात देखने को मिली कि कांग्रेस हिंदी पट्टी में किसी भी तरह के गठबंधन को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आई. बिहार में जरूर वह आरजेडी से गठबंधन में थी, लेकिन वह भी रस्मी तौर पर ही. यूपी में राहुल ने चुनाव प्रचार की शुरुआत में बयान दिया कि एसपी-बीएसपी को हमसे गठबंधन करना है तो हमारे पास आएं. उनका स्वागत है. उनके इस बयान से साफ हो गया कि यूपी में सिर्फ गठबंधन होगा, लेकिन महागठबंधन नहीं होगा और कांग्रेस उसका हिस्सा नहीं होगी.

यूपी ही क्यों

राजनीतिक पंडित हैरत में थे कि कुछ महीने पहले तक साथ मिलकर बीजेपी का मुकाबला करने का राग अलापने वाली कांग्रेस को अचानक क्या हुआ है? क्या पार्टी सचमुच महामेंडेट पाने जा रही है या फिर ये वही हैंगओवर है, जो अकसर कांग्रेस को छोटी-मोटी जीतों के बाद हो जाया करता है. कांग्रेस यहीं नहीं रुकी. उसने एक के बाद एक यूपी में अपने दिग्गज नेता उतारने शुरू कर दिए. एक बार तो गठबंधन भी ठिठक गया, जब प्रियंका के यूपी में सक्रिय होने की बात पुख्ता हो गई. सवाल उठा कि आखिर कांग्रेस चाहती क्या है...बीजेपी से मुकाबला या फिर आम चुनाव के बहाने 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी जैसे सबसे बड़े सूबे में अपनी जड़ें फिर जमाना.

रैलियां और रोड शो

कांग्रेस की यूपी की दीवानगी को हम आंकड़ों से भी समझ सकते हैं. प्रियंका ने यूपी में 40 रैलियां और इतने ही रोड शो कर डाले. राहुल ने 24 रैलियां और 20 रोड शो किए. मायावती ने सिर्फ 25 रैलियां कीं. यह नंबर क्या बताता है...साफ है कि कांग्रेस इस बात की परवाह किए बिना अपनी जड़ें जमाने को बेताब थी कि उसकी जिद गठबंधन के लिए महंगी साबित होने वाली है. जो परिणाम आएंगे वो बीजेपी के दोबारा सत्ता में आने की राह आसान ही करेंगे. सवाल ये कि क्या कांग्रेस के दिग्गज ये नहीं जानते थे. यह मामला दरअसल टाइमिंग का है. कांग्रेस को लगा कि वह एक तीर से दो शिकार कर लेगी. इसके लिए भले ही उसे गठबंधन को नुकसान क्यों न पहुंचाना पड़े.

प्रियंका गांधी ने बीच चुनाव बयान दिया, हमने कई जगह ऐसे प्रत्याशी उतारे हैं जो बीजेपी के ही वोट काटेंगे. इस पर काफी हंगामा हुआ था.


प्रियंका का बयान

गौर करिए चुनाव के बीच में प्रियंका ने एक बयान दिया, जिस पर काफी हंगामा मचा कि हमने कई जगह ऐसे भी प्रत्याशी उतारे हैं जो गठबंधन की मदद करेंगे और बीजेपी के ही वोट काटेंगे. सवाल ये है कि कांग्रेस को यह बयान देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या ये प्रियंका का नासमझी भरा बयान था या फिर ये चुनाव के बाद के हालात को ध्यान में रखते हुए दिया गया बयान था...ताकि बाद में जब उसे घेरा जाए कि उसने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया तो वह इस बयान का हवाला दे सकें.

माया की नाराजगी

अगर तमाम एग्जिट पोल के आंकड़ों को आधार मानें तो बेशक कांग्रेस का ये दांव सीट के लिहाज से फ्लॉप साबित हुआ. साथ में उसने बसपा सुप्रीमो मायावती की नाराजगी भी मोल ली. माया दरअसल छत्तीसगढ़, एमपी और राजस्थान में कांग्रेस से गठबंधन चाहती थीं, लेकिन कांग्रेस ऐन वक्त पर पलट गई. तर्क ये दिया गया कि माया की शर्तें वाजिब नहीं हैं. नाराज माया ने यूपी में कांग्रेस को भाव नहीं दिया और कांग्रेस ने ऑल आउट स्ट्रेटजी को अपनाया.

दिल्ली में भी यही नीति

कांग्रेस ने यही नीति दिल्ली में भी अपनाई. उसने संगठन मजबूत करने के फेर में आम आदमी पार्टी के साथ हां, ना, हां, ना करने के बाद आखिरकार ना ही कर दी. नतीजा ये है कि एग्जिट पोल में आप और कांग्रेस एक-एक सीट पर सिमटते नजर आ रहे हैं. यहां गौर करने वाली बात है कि कांग्रेस जो अपने कैडर को जिंदा करना चाहती थी, उसका उसे लाभ मिला है. उसका जमीन पर कैडर सक्रिय हुआ है. हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि गठबंधन नहीं होने के लिए 'आप' की जिद भी कम जिम्मेदार नहीं थी. दोनों पार्टियों में 4-3 का फॉर्मूला बन चुका था, लेकिन आप की अन्य राज्यों में कांग्रेस से सीट मांगने की जिद ने मामला खराब कर दिया.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

कांग्रेस के गठबंधन न करने के दांव पर वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि हर पार्टी खुद को पहले मजबूत करना चाहती है, ताकि किसी भी गठबंधन की स्थिति में वह ज्यादा अच्छे से मोलभाव कर सके. इसका सीधा उदाहरण है जेडीयू, जिसे पिछली बार जरूर सिर्फ 2 सीटें मिलीं थीं, लेकिन इस बार उसने बीजेपी से 17-17 सीटों का गठबंधन किया. साफ है कि जेडीयू की मजबूत स्थिति के कारण ही बीजेपी उसे 17 सीटें देने को तैयार हुई. यह सवाल दूसरी विपक्षी पार्टियों पर भी उतना ही फिट बैठता है, जितना कांग्रेस पर. यह सही है कि कांग्रेस खुद को मजबूत करना चाहती थी, लेकिन एसपी-बीएसपी को भी यह डर था कि कहीं उनका वोट कांग्रेस की ओर शिफ्ट न हो जाए और वह यूपी में जड़ें न जमा ले. इसलिए वो भी कांग्रेस के साथ आने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं थे.

 



योगेंद्र यादव के ट्वीट पर मचा हंगामा 

कभी बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था. अब स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव का हाल ही में किया गया ट्वीट काफी चर्चा में है. उन्होंने लिखा, 'कांग्रेस को खत्म हो जाना चाहिए.' इस पर काफी हंगामा भी हुआ है. 23 मई को वास्तविक परिणाम आने के बाद साफ हो जाएगा कि कांग्रेस कहां खड़ी है और उसकी खुद को जिंदा करने की कोशिशें कितनी कारगर रहीं. एग्जिट पोल तो यही दिखाते हैं कि कांग्रेस इस दोहरे दांव में कामयाब नहीं हो सकी. साथ में उसने वैचारिक सहयोगियों की नाराजगी भी मोल ली.

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