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ANALYSIS: कांग्रेस को अपने सांसदों में से ही किसी को बनाना होगा अध्यक्ष, ये है वजह

राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. (फाइल फोटो)

राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. (फाइल फोटो)

कांग्रेस अध्यक्ष के पास लुटियंस दिल्ली में आवास की उम्मीद की जाती है, दिखावे के लिए नहीं बल्कि काम की जरूरतों के लिए, क्योंकि अध्यक्ष को कई आगंतुकों से मुलाकात करनी होती है.

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    (रशीद किदवई)

    जायरा वसीम की तरह राहुल गांधी अपने 'इस्तीफे' को छोटा और मीठा रखते तो बेहतर होता, लेकिन युवा दंगल एक्ट्रेस की तरह राहुल गांधी ने भी एक बात सामने रखी.

    अपने डेढ़ साल के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान राहुल गांधी का पार्टी संगठन के साथ असहज संबंध रहा. एक अपरंपरागत राजनेता के रूप में वह सत्ता से अलग-थलग थे और पार्टी के दूसरे नेताओं से भी यहीं उम्मीद कर रहे थे. ये होना नहीं था.

    अब नया सवाल राहुल गांधी के वारिस का है. इस कड़ी में कई दिलचस्प पहलू सामने आने वाले हैं. व्यापक तौर पर यह 134 साल की भारत की सबसे पुरानी पार्टी पर दूरगामी प्रभाव डालेगा अथवा जनता पार्टी और जनता दल की तर्ज पर इसका विघटन कर देगा.

    कांग्रेस के अंदर किसी भी कीमत पर यथास्थिति बरकरार रखने का विचार चल रहा है. राहुल गांधी के इस्तीफे के कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस में अस्थाई व्यवस्था की सुगबुगाहट होने लगी. उनमें से अधिकांश सामूहिक नेतृत्व के पक्षधर रहे हैं. यह आकर्षक और आशाजनक लगता है, लेकिन यह काफी महंगा भी पड़ सकता है. दरअसल, ऐसी स्थिति में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पार्टी के अंदर हर रोज होने  वाले झगड़ों को निपटाने के लिए मौजूद नहीं रहेंगे, ऐसे में सामूहिक नेतृत्व महंगा सौदा प्रतीत होता है.

    ये भी पढ़ें: यहां पढ़िए राहुल गांधी का 'भावुक इस्तीफ़ा', क्यों कही ये बात?

    अध्यक्ष पद की दौड़ में ये नाम
    कांग्रेस ने संगठनात्मक चुनाव होने तक किसी एक व्यक्ति को भी अंतरिम अध्यक्ष के रूप में पेश नहीं किया है. पार्टी के चुनाव की प्रक्रिया ऐसी है कि उसे अध्यक्ष के चुनाव के लिए इस साल के अंत तक इंतजार करना होगा. राहुल गांधी के वारिस के तौर पर मोतीलाल वोरा, मनमोहन सिंह, मल्लिकार्जुन खड़गे और सुशील कुमार शिंदे का नाम अच्छा लग रहा है, लेकिन उम्र इनके पक्ष में नहीं है और ये सबसे बड़ी चुनौती है.



    इस घटना से लेनी होगी सीख
    यहां इस बात को याद किया जा सकता है कि 1998 के आम चुनावों में सीताराम केसरी कैसे मूकदर्शक बने रह गए थे. केसरी एआईसीसी अध्यक्ष थे, लेकिन कांग्रेस के 450 लोकसभा उम्मीदवारों में से कोई भी उन्हें प्रचार के लिए नहीं बुलाना चाहता था. 1998 में 134 सीटों का आंकड़ा सम्मानजनक लग सकता है, लेकिन कांग्रेसियों ने धीरज खो दिया और मार्च 1998 में केसरी को पद से हटा दिया गया.

    सांसद को क्यों बनाना पड़ सकता है अध्यक्ष?
    इसके अलावा कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. कांग्रेस अध्यक्ष के पास लुटियंस दिल्ली में आवास की उम्मीद की जाती है, दिखावे के लिए नहीं बल्कि काम की जरूरतों के लिए, क्योंकि अध्यक्ष को कई आगंतुकों से मुलाकात करनी होती है. दक्षिणी दिल्ली में एक किराए का पेंटहाउस अपार्टमेंट कांग्रेस अध्यक्ष के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि अलग-अलग तरह के कामों का निपटाने के लिए उसे कुछ सचिवों के कमरे, लॉन और खुली जगह चाहिए. ऐसा होना भी असंभव लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार कांग्रेस अध्यक्ष की आवासीय जरूरतों को पूरा करने के लिए नियमों को तोड़ देगी. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सांसदों में से ही किसी को अध्यक्ष बनाने के लिए मजबूर है?

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