राजस्थान के शिक्षा निदेशक से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्यों न चलाया जाए अवमानना का केस? जानें पूरा मामला

बिश्वम्भर लाल माहेश्वरी एजुकेशन फाउंडेशन एक सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान था जो कुछ वर्ष चलने के बाद बंद हो गया था. (File pic)

बिश्वम्भर लाल माहेश्वरी एजुकेशन फाउंडेशन एक सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान था जो कुछ वर्ष चलने के बाद बंद हो गया था. (File pic)

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा विभाग के निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) और उप निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक शिक्षा), झुनझुनु से पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए?

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के आदेश का पालन न करना राजस्थान के शिक्षा विभाग (Education Department of Rajasthan) को महंगा पड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा विभाग के निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) और उप निदेशक (प्राथमिक शिक्षा) जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक शिक्षा), झुनझुनु से पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए?

जस्टिस आरएफ नारीमन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने वरिष्ठ अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. हालांकि कोर्ट ने अधिकारियों को निजी पेशी से छूट प्रदान कर दी है. दरअसल, बिश्वम्भर लाल माहेश्वरी एजुकेशन फाउंडेशन एक सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान था जो कुछ वर्ष चलने के बाद बंद हो गया था. इस संस्थान को सरकार को 70 फीसदी सहायता मिलती थी.

नुकसान के कारण बंद हुआ था संस्थान

छात्रों की संख्या कम होने से लगातार हो रहे नुकसान को देखते हुए फॉउंडेशन ने संस्थान को बंद करने का निर्णय लिया गया और शिक्षा विभाग से सहायता न देने के लिए कहा था. कुछ समय बाद संस्थान में ताला लग गया. जिसके बाद शिक्षक ने बकाये वेतन, भत्ते आदि के लिए ट्रिब्यूनल का रुख किया. ट्रिब्यूनल ने संस्थान को शिक्षकों को बकाया चुकाने के लिए कहा. संस्थान ने शिक्षकों को तमाम बकाया चुकता कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सितबर, 2019 में राजस्थान शिक्षा विभाग से 70 फीसदी रकम(सहायता के तौर पर सरकार से मिलने वाली राशि) संस्थान को वापस देने का आदेश दिया गया.


फाउंडेशन की और से पेश वकील दुष्यंत परासर ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि दो बार लीगल नोटिस भेजने के बावजूद शिक्षा विभाग के कोई जवाब नहीं दिया है. जिसके बाद उन्होंने अवमानना याचिका दायर की. परासर ने यह भी कहा कि जानबूझकर आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तमाम प्रतिवादियों को अवमानना नोटिस जारी किया है.

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