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शनि शिंगणापुर की 400 साल पुरानी परंपरा टूटी, अब दूसरे मंदिरों में भी एंट्री की तैयारी

भाषा
Updated: April 9, 2016, 8:30 AM IST
शनि शिंगणापुर की 400 साल पुरानी परंपरा टूटी, अब दूसरे मंदिरों में भी एंट्री की तैयारी
स्त्री-पुरूष समानता के अभियान में मिली एक बडी जीत में महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में मुख्य पूजा स्थल पर महिलाओं के प्रवेश पर सदियों से चली आ रही पाबंदी को शुक्रवार को हटा लिया गया।

स्त्री-पुरूष समानता के अभियान में मिली एक बडी जीत में महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में मुख्य पूजा स्थल पर महिलाओं के प्रवेश पर सदियों से चली आ रही पाबंदी को शुक्रवार को हटा लिया गया।

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अहमदनगर।  स्त्री-पुरूष समानता के अभियान में मिली एक बडी जीत में महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में मुख्य पूजा स्थल पर महिलाओं के प्रवेश पर सदियों से चली आ रही पाबंदी को शुक्रवार को हटा लिया गया। यह कदम कार्यकर्ताओं के लंबे संघर्ष और अदालत के निर्देशों के बाद उठाया गया है। मंदिर के न्यास द्वारा पश्चिम महाराष्ट्र के इस मंदिर के मुख्य क्षेत्र में सभी श्रद्धालुओं को अबाधित प्रवेश की सुविधा देने के निर्णय के कुछ ही समय बाद कुछ महिलाओं ने पवित्र स्थल पर प्रवेश किया और पूजा की।

निर्णय की घोषणा के कुछ घंटे बाद भूमाता ब्रिगेड की नेता तृप्ति देसाई अहमदनगर के शनि मंदिर पहुंची और उन्होंने पूजा अर्चना की। तृप्ति ने इस मुद्दे पर लंबे अभियान की अगुवाई की थी। तृप्ति के मौके पर पहुंचने से पहले ही दो महिलाओं ने पवित्र स्थल में प्रवेश कर पूजा-अर्चना की और प्रतिमा पर तेल चढाया। यह दोनों महिलाएं कुछ समय पहले भूमाता ब्रिगेड से अलग हुई थीं। इसी के साथ कुछ धार्मिक स्थलों पर स्त्री-पुरूषों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ तीन माह तक चले अभियान में एक बडी सफलता मिली है।

महत्वपूर्ण है कि मंदिर न्यास का यह निर्णय गुड़ी पडवा के पवित्र दिन पर आया है जब महाराष्ट्र भर में नववर्ष मनाया जाता है। निर्णय का स्वागत करते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कहा कि आधुनिक समय को ध्यान में रखते हुए जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को लोगों के दिमाग से निकाला जाना चाहिए। इससे पहले शुक्रवार को दिन में करीब 250 लोग अवरोधकों को तोड़कर जबरदस्ती मुख्य पूजा स्थल पर पहुंच गए। उन लोगों का कहना था कि गुड़ी पड़वा के लिए मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा पूजा करना एक लंबी परंपरा है। मंदिर के एक न्यासी सयाराम बांकर ने बताया कि न्यासियों की बैठक में तय किया गया कि बंबई उच्च न्यायालय के निर्देश को ध्यान में रखते हुए पुरूष और महिलाओं सहित सभी श्रद्धालुओं के अबाधित प्रवेश की सुविधा दी जाए।

उच्च न्यायालय ने एक अप्रैल को व्यवस्था दी थी कि पूजा के स्थलों पर जाना महिलाओं का मूलभूत अधिकार है और सरकार का इस अधिकार की रक्षा करना दायित्व है। इस मुद्दे को लेकर बहस तब गर्मा गई जब एक महिला ने पिछले साल शिन शिगणापुर मंदिर के पवित्र क्षेत्र में प्रवेश कर पूजा करने का प्रयास किया जो महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी परंपरा का उल्लंघन था। महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलन ने पिछले कुछ माह से गति पकड़ ली थी। हालांकि बाद में मदिर के अधिकारियों ने पुरूषों को भी यहां के पवित्र स्थल में जाने से रोक दिया।

इस निर्णय को बुद्धिमत्तापूर्ण कदम करार देते हुए तृप्ति देसाई ने कहा कि देर से आए लेकिन दुरूस्त आए। उन्होंने उम्मीद जताई कि महाराष्ट्र के नासिक त्रयम्बकेश्वर और कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में भी महिला श्रद्धालुओं के खिलाफ अन्याय को समाप्त करते हुए इसी प्रकार का निर्णय किया जाएगा। महिला अधिकार कार्यकताओं के अलावा मुख्यमंत्री फडणवीस की पत्नी अमृता ने भी मंदिर न्यास के निर्णय का स्वागत किया है।

अमृता ने कहा कि यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है और यह संतोषजनक घटनाक्रम है। इससे यह मजबूत संकेत गया है कि पुरूषों की तरह महिलाएं भी सभी उचित फायदों की पात्र हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि भेदभाव कभी भारतीय संस्कृति या सनातन धर्म का हिस्सा नहीं था और इसे बाद में जोड़ा गया। भले ही कानून इस प्रकार के भेदभाव को समाप्त करेगा, पर यदि हमें वास्तव में प्रगति करनी है तो समाज की मानसिकता को परिवर्तित करना होगा। उन्होंने कहा कि यदि हमें 21वीं शताब्दी में प्रगति करनी है तो यह महत्वपूर्ण है कि हम लोगों के मन से जाति और लिंग के भेद की परिकल्पना को पूरी तरह से मिटा दें। अपने पति के विचारों का समर्थन करते हुए अमृता ने कहा कि यह बदलाव का संकेत है किन्तु वास्तविक बदलाव केवल तभी होगा जब लोग महिलाओं के प्रति अपनी सोच को बदलना शुरू कर देंगे।पहली बार मंदिर के पवित्र स्थल पर जाने वाली दो महिलाओं में शामिल पुष्पक केवाडकर ने बताया कि मैं बहुत प्रसन्न हूं। हमने शनिदेव की पारंपरिक पूजा में तेल चढ़ाया और फूल-माला अर्पित की। उन्होंने कहा कि पुलिस या ग्रामीणों ने उन्हें भीतरी क्षेत्र में प्रवेश करने से नहीं रोका। पुष्पक और अन्य कार्यकर्ता प्रियंका जगताप भूमाता ब्रिगेड से अलग हुए गुट से संबंधित हैं। वे तृप्ता देसाई पर यह आरोप लगाते हुए मूल संगठन से अलग हुई थीं कि वह स्वयं ख्याति पाने के लिए यह अभियान चला रही हैं।

बहरहाल, इन महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने से पहले कुछ नाटकीय घटनाक्रम भी हुआ। मंदिर के द्वार पर एकत्र कुछ महिलाओं ने कार्यकर्ताओं के प्रवेश को बाधित करने का प्रयास किया। किन्तु पुलिस ने कोई भी अप्रिय घटना टाल दी। मौके पर करीब 400 पुलिसकर्मी तैनात थे। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजय जाधव ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि महिलाएं तब मौके से वापस चली गई जब उन्हें उच्च न्यायालय के आदेश के बारे में सूचित किया गया।

एक अन्य संबद्ध घटनाक्रम में किन्नरों और ट्रांस जेंडरों ने भी मंदिर में पूजा अर्चना करने का अधिकार मांगा है। ट्रांसजेंडरों के लिए काम करने वाली संस्था महाराष्ट्र तृतीयपंथी संगठन की अध्यक्ष काजोल गुरू ने कहा कि हम भी शनि शिंगणापुर जाएंगे क्योंकि दर्शन करना हमारा भी अधिकार है। इस बीच, हिन्दू जनजागृति समिति ने मंदिर न्यासियों के निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि यह जल्दबाजी में लिया गया है और दुर्भाग्यपूर्ण है। समिति के पदाधिकारी पराग गोखले ने राज्य सरकार और प्रशासन पर हिन्दू धर्म की सदियों पुरानी परंपरा की रक्षा करने में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि न्यासी भूमाता ब्रिगेड के दबाव में आ गए जिनका आंदोलन प्रचार के कारण चलाया गया।

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First published: April 9, 2016, 8:30 AM IST
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