कोरोना संकटकाल में बच्‍चों का बचपन सुरक्षित बनाने के लिए अमीर देशों को करनी होगी आर्थिक मदद

कोरोना संकटकाल में बच्‍चों का बचपन सुरक्षित बनाने के लिए अमीर देशों को करनी होगी आर्थिक मदद
बच्चों को कोरोना महामारी और इससे उपजने वाले वैश्विक आर्थिक संकट से कैसे बचाया जाए?

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (International labor organization) के मुताबिक इस वैश्विक महामारी की वजह से अनौपचारिक क्षेत्र के लाखों कामगार बेरोजगार हो जाएंगे. ऐसे में गरीबों और बेरोजगारों के सामने जीवनयापन और खाने-पीने का संकट पैदा होना तय है.

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नई दिल्ली (अनिल पांडेय). पूरी दुनिया कोरोना महामारी (Corona epidemic) की भयानक चपेट में हैं. इसकी वजह से विश्व की आर्थिक गतिविधियां तकरीबन ठप पड़ गई हैं. कोरोना महामारी का सबसे विनाशकारी प्रभाव समाज में सबसे कमजोर और वंचित लोगों पर पड़ेगा. विश्व बैंक (World bank) के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक कारोना महामारी की मार से साल 2020 में दुनिया के 4 से 6 करोड़ लोग 'अत्यधिक गरीबों' की सूची में शामिल हो जाएंगे. वहीं अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (International labor organization) के मुताबिक इस वैश्विक महामारी की वजह से अनौपचारिक क्षेत्र के लाखों कामगार बेरोजगार हो जाएंगे. ऐसे में गरीबों और बेरोजगारों के सामने जीवनयापन और खाने-पीने का संकट पैदा होना तय है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मानें तो 1930 के दशक की वैश्विक महामंदी के बाद यह सबसे बड़ी महामंदी होगी. जाहिर है इस महामंदी से बेरोजगारी तथा गरीबी और बढ़ेगी. हम भले ही आधुनिक तकनीक से लैस होकर अंतरिक्ष की सैर करने में सक्षम बन चुके हैं, लेकिन एक कड़वी हकीकत यह है कि अभी भी दुनिया की आबादी का पांचवा हिस्सा बेहद गरीब है. करीब 20 करोड़ लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं. करोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट से यह आंकड़ा और बढ़ने वाला है. आने वाली वैश्विक महामंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे होने वाले हैं. साल 1997 में एशिया में आए आर्थिक संकट और 2009 में आई वैश्विक महामंदी के अनुभव बताते हैं कि इससे पूरी दुनिया में बाल मजदूरी, बाल दासता, बाल वेश्यावृत्ति, बाल विवाह और बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) यानी बच्चों की खरीद-फरोख्त के मामले तेजी से बढ़ोत्तरी हुई. आशंका जताई जा रही है कि कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट की वजह से एक बार फिर इनमें बढोत्तरी होगी. कोरोना महामारी के संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया के तमाम देशों में स्कूल बंद हैं. इन स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए मिड-डे मील की व्यवस्था होती है. लॉकडाउन की वजह से दुनिया के करीब 37 करोड़ बच्चे मिड-डे मील से वंचित हैं. ऐसे में दुनिया के वंचित और गरीब बच्चों के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो गया है.



इसके अलावा कोरोना महामारी का एक और दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है. लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान दुनियाभर में पोर्नोग्राफी और इसमें भी चाइल्ड पोर्नोग्राफी की मांग में कई गुना की बढ़ोत्तरी हो गई है. बाल दुर्व्‍यापार और बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ दक्षिण एशिया के सबसे बड़े बाल संरक्षण संगठनों में से एक इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड (आईसीपीएफ) द्वारा ‘चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज़ मटेरियल इन इंडिया’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन लागू होने के बाद से भारत में ऑनलाइन चाइल्ड पोर्नोग्राफी की मांग में अप्रत्‍याशित और खतरनाक वृद्धि हुई है. रिपोर्ट में बच्चों के साथ हिंसक रूप से सेक्स या यौन शोषण वाली सामग्री की मांग में 200 प्रतिशत तक की वृद्धि का खुलासा किया गया है. ऐसी ही रिपोर्ट दुनिया के अन्य देशों से भी आ रही हैं. यह एक खतरनाक संकेत है. तमाम अध्ययनों से यह बात साबित हो गई है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी के लती लोग बच्चों के साथ यौनाचार करते हैं.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनिया में आज भी तकरीबन 16 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त हैं. इनमें लाखों बच्चे ऐसे भी हैं जो ट्रैफिकिंग के शिकार हैं. यानी जिन्हें बाल मजदूरी आदि के लिए खरीदा बेचा गया. वैश्विक मंदी से यह आंकड़ा और बढ़ेगा. कोरोना महामारी का एक दर्दनाक पहलू यह भी है कि भारत जैसे देशों में अचानक लॉकडाउन की वजह से बाल मजदूरी करने वाले लाखों बच्चे फैक्ट्रियों और कारखानों में कैद हो कर रह गए हैं. मालिक घर में आराम कर रहे हैं और ये बच्चे भूख से तड़प रहे हैं. गौरतलब है कि असंगठित क्षेत्र की छोटी फैक्ट्रियों और कारखानों में बाल मजदूरों को वहीं रखकर काम कराया जाता है.

ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों को कोरोना महामारी और इससे उपजने वाले वैश्विक आर्थिक संकट से कैसे बचाया जाए? इसका एक बड़ा समाधान यह है कि गरीबों-वंचितों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ बच्चों की सुरक्षा की योजनाओं को बढावा दिया जाए. बच्चों की सुरक्षा में लगी एंजेंसियों को मजबूत किया जाए और हिंसा के शिकार बच्चों को बचा कर उनका उचित पुनर्वास किया जाए. जाहिर है इसके लिए अधिक धन की जरूरत होगी. गरीब देशों के बच्चे फिलहाल सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. कोरोना महामारी से पैदा हुए आर्थिक संकट और आने वाली महामंदी से छोटे और गरीब देशों की कमर टूट जाएगी. वहां बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ेगी. इससे उबरने के लिए उन्हें अमीर देशों और वैश्विक संस्थाओं से आर्थिक मदद की दरकार होगी. ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश सत्यार्थी ने एक महत्वपूर्ण पहल की है. उन्होंने “बच्चों की पीड़ा” को “वैश्विक आवाज” बनाने के लिए दुनिया के 88 नोबेल पुरस्कार विजेताओं और वैश्विक नेताओं को लामबंद किया है. इसमें दुनियाभर में सम्मान की नजर से देखे जाने वाले दलाई लामा और डेसमंड टूटू सहित 45 नोबेल पुरस्कार विजेता और 43 वैश्विक नेता हैं. वैश्विक नेताओं में कई देशों के पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं के प्रमुख रह चुके लोगों के अलावा प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के नाम शामिल हैं.

श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित ‘लॉरिएट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन्‍स’ के बैनरतले दुनिया के इन “मोरल लीडरों” ने वंचित और हाशिए के बच्चों के हक में एक साझा बयान जारी कर दुनिया के सभी देशों की सरकारों, राष्ट्राध्यक्षों और विश्व के नीति-निर्माताओं से इस संकट की घड़ी में हाशिए के बच्चों और उनके परिवारों की भलाई के लिए एकजुट होने और बच्चों की सुरक्षा के लिए एक ट्रिलियन डॉलर की मदद का आह्वान किया है. उन्होंने विश्‍व की सरकारों से यह भी अपील की कि वे लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद प्रभावित होने वाले बच्‍चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें. यह रकम संयुक्त राष्ट्र के कल्याणकारी कार्यों और एसडीजी गोल यानी सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर निवेश के साथ-साथ गरीब देशों की मदद पर खर्च किया जाएगा. इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि इतनी बडी संख्या में नोबेल पुरस्कार विजेता और वैश्विक नेता बच्चों की आवाज बुलंद करने के लिए एक साथ एक मंच पर आए हों. जाहिर है इससे सरकारों पर नैतिक दबाव बनेगा. श्री कैलाश सत्यार्थी इनकी मदद से बच्चों के हक में वैश्विक स्तर पर कई सफल नीतिगत हस्तक्षेप कर चुके हैं. वे इन वैश्विक नेताओं की मदद से चाइल्ड पोर्नोग्राफी के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कानून बनवाने के लिए भी प्रयास कर रहे हैं.

कोरोना महामारी से उपजे सामाजिक और आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए हाल हीं में दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के संगठन जी-20 ने अपने शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था में 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की मदद देने की प्रतिबद्धता जाहिर की है. यह आपातकालीन मदद इन देशों की कंपनियों और लोगों के लिए है. यदि अमीर देश “मोरल लीडरों” के आह्वान पर अमल करते हुए दुनियाभर के बच्चों के राहत और कल्याण के लिए एक ट्रिलियन डॉलर का राहत पैकेज देने के लिए राजी हो जाते हैं तो यह मानवता के हक में होगा और इसके परिवर्तनकारी नतीजे होंगे. इससे कोरोना महामारी की मार से पूरी एक पीढ़ी को बचाया जा सकेगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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