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डराने वाले ख्वाब, मानसिक बीमारी, ईटिंग डिसऑर्डर... कोविड-19 महामारी के 550 दिन

अधिकतर लोग बुरे सपनों की शिकायत कर रहे हैं जो उनके चिंता के स्तर को बढ़ा रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)

अधिकतर लोग बुरे सपनों की शिकायत कर रहे हैं जो उनके चिंता के स्तर को बढ़ा रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)

Coronavirus Lockdown Mental Health: युवाओं के अलावा जो लोग आईटी सेक्टर में बहुत दबाव वाले काम कर रहे हैं उनमें पोर्न की लत देखने को मिल रही है.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. इस बात को 550 दिन बीत गए जब पहली बार भारत में लॉकडाउन लगा था. मानसिक बीमारी इस दौरान उभर कर सामने आई, इंटरनेट का जाल घरों के अंदर फैल गया. इस बार ऐसा हुआ जिसने डॉक्टरों तक को परेशान करके रख दिया. भारत में महामारी के दौरान 4 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. करोड़ों लोग घरों में कैद होकर रह गए, वो मौत को चकमा देने की कोशिश कर रहे हैं और रोजाना मानसिक बीमारियों से लड़ रहे हैं. ये इतनी बड़ी संख्या में हैं जितने देश ने आज तक कभी नहीं देखे हैं.

    25 मार्च, 2020 से भारत के सबसे बड़े मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की 24*7 की स्वयंसेवी संस्था ने रोजाना करीब 900 कॉल लिए, इनमें से ज्यादातर वो लोग थे जिनको पहले कोई भी मानसिक रोग नहीं था. इस मामले को समझने के लिए न्यूज18 ने देश भर के कई चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों से बात की और पांच केस स्टडी का अध्ययन करके यह पता करने की कोशिश की कि आखिर मानसिक बीमारियों के इस तरह बढ़ने की वजह क्या है. चार भागों की इस श्रृंखला का यह पहला लेख है – महामारी का नतीजा

    सपने जो पहले कभी नहीं आए
    पिछले साल की बात है, 11 साल के आशीष को सपना आया कि उसके दादा जी किसी दुर्घटना के शिकार हो गए हैं और वह मरने वाले हैं. पहले कुछ बार जब उसने यह सपना देखा, तो वो चौंक कर उठ जाता था और घबरा जाता था. पर अब उसे सब अच्छे से पता है. जब कभी वो इस तरह का सपना देखता तो अपने दादा जी को कहता कि सड़क पार मत करना, इस तरह से वो उन्हें दुर्घटना का शिकार होने से बचाना चाहता था. इसके बजाए वो सपना देखता कि वह और उसके दादू पुस्तक मेला गए हैं और वहां पर किताबें खरीद रहे हैं, लोगों से बातें कर रहे हैं. हकीकत में, उसके दादू कुछ महीने पहले कोविड की वजह से गुज़र गए थे.

    पिछले डेढ़ सालों में हमारे सपनों ने अजीब रुख अख्तियार कर लिया है. हमारे अवचेतन के अंदरूनी परतों में मौजूद यादें और सोए हुए कुछ बुरे अनुभव जिनका विशेषज्ञों ने अध्ययन करना और उसे समझना शुरू किया है. मुंबई की मनोवैज्ञानिक प्रियंका वर्मा का कहना है कि लोगों ने अपने करीबियों को खोया है, ऐसे कितने मामले हैं जिसमें बीमारी से पीड़ित इंसान की अस्पताल में मौत हुई और वो अपने परिवार वालों को अलविदा किए बगैर सीधे श्मशान पहुंचा दिये गए. इसलिए जिन्होंने अपनों को खोया है वो जो उनके सबसे करीब था वो उसे सपनों में उन्हें जीवित कर देते हैं. सपने ही ऐसी जगह हैं जहां पर वो अपने उस करीबी से की हुई बात को खत्म कर सकते हैं जिसे उसने खो दिया है. यही वो जगह है जहां वे उन्हें वो अलविदा कह सकते हैं जो नहीं कह पाए. अधिकतर लोग बुरे सपनों की शिकायत कर रहे हैं जो उनके चिंता के स्तर को बढ़ा रहा है.

    नताशा मेहता, एक वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक हैं, वह बताती हैं कि इस दौरान लोग रूपक सपनों को बहुत देख रहे हैं. मसलन सांप का उनके पीछे भागना, या किसी कीड़े का काट लेना, किसी अनजान जगह पर कैद हो जाना, अपने किसी करीबी को खो देना, या उनके मरने का सपना देखना. उनका कहना है कि अधिकतर लोगों के सपने देखने की तादाद बढ़ी है क्योंकि लोग चिंतित हैं, तो उनमें आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) चक्र स्वप्न ज्यादा देखा जा रहा है, आरईएम चक्र नींद का वो चक्र होता है जब हम सपना देखते हैं और हमारा दिमाग सबसे ज्यादा सक्रिय होता है. सपनों के अंबार लग जाने से लोगों को नींद में परेशानी आती है. ये घटना बच्चों के साथ ज्यादा देखने को मिल रही है जो आमतौर पर गहरी नींद सोते हैं, लेकिन महामारी के दौरान उन्हें नींद से जुड़ी परेशानी हो गई है. मेहता कहती हैं कि चूंकि महामारी के दौरान हमारी कोई नई याद नहीं बन पाई इसलिए कई पुरानी (और महत्वहीन) यादें हमारे सपनों में उभर गई हैं. हमारा दिमाग हमारी दबी हुई यादों तक पहुंच रहा है और वो हमारे सपनों में उभर रही हैं. तो ऐसे दोस्त जिन्हें हमने भुला दिया है, वो जगह जहां कभी हमारा बचपन गुजरा था, वो हमारे ख्वाबों में फिर से आने लगे हैं. यह सामान्य तौर पर टैप करने योग्य यादें नहीं हैं, लेकिन हम सामान्य वक्त में भी नहीं रह रहे हैं.

    Right out of vintage prison
    दो सौ सालों के बाद और सामाजिक तौर पर सीमित कर देने वाले लॉकडाउन का अनुभव कर रही दुनिया को समझ आ रहा है कि 19वीं सदी के लंदन और 20वीं सदी के अमेरिकी कैदियों को क्यों हिला देने वाला पागलपन करार दिया गया था. जोनाथन ग्रीन जो दुनिया के स्लैंग कोशकार के अग्रणी लोगों में से हैं, बताते हैं कि जेल में बंद रहने वाले लोगों में मनोवैज्ञानिक गड़बड़ी नज़र आती है. विशेषज्ञ के पास अब इसके लिए एकदम ताजातरीन नाम है- केबिन फीवर.

    हैदराबाद कि क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक रिथिका अल्लादी ने न्यूज18 को बताया कि केबिन फीवर ऐसा मनोवैज्ञानिक विकार है जिसका उपचार नहीं है. हम इस शब्द का इस्तेमाल व्यक्ति पर पड़ने वाले उस मनोवैज्ञानिक असर के लिए करते हैं जो उसे लंबे वक्त तक अकेला रखने के कारण पड़ा हो. यह शब्द उस दौरान सामने आया जब लोगों को सर्दी की वजह से या किसी दूसरी परेशानी की वजह से लंबे वक्त तक घरों में रहना पड़ता था.

    ग्रीक दार्शनिक अरस्तु का ‘इंसान एक सामाजिक प्राणी’ और ‘परस्पर निर्भरता’ के जरिए जीने वाले विख्यात सिद्धांत को इस सदी में कभी भी इतनी गहराई से महसूस नहीं किया गया. अब दफ्तर लैपटॉप में, दोस्त वीडियो कॉल पर, किराना दरवाजे पर और हर चीज लॉकडाउन में, इस तरह सामाजिक प्राणी पिंजरे में कैद हो चुका है. रीता रॉय जो एक क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक हैं, वो बताती हैं कि, महामारी के दौरान मैंने ऐसे लोगों की संख्या में बहुत इजाफा देखा जिनमें इस तरह के लक्षण मौजूद हैं, कुछ में केबिन फीवर सामान्य चिड़चिड़ापन, उबाऊपन, अकेलापन, चिंता और मानसिक उन्माद के तौर पर दिख सकता है. भौतिक तौर पर बातचीत के बंद हो जाने से लोगों में जल्दी ही निष्क्रिय, शिथिल होने की आदत नज़र आ रही है. कुछ लत जैसे शराब पीना, नशीली दवा लेना, लगातार फिल्म देखना और ढेर सारा जंक फूंड खाने की आदत विकसित हो रही है.

    संतुलित भोजन को अवकाश
    कुछ महीने पहले, कोलकाता में, एक कमजोर हो चुके 16 साल के लड़के को उसकी मां खींचकर मनोवैज्ञानिक के पास ले गई. उसकी गड्ढ़ों में धंसी आंखें हज़ार कहानियां सुना रहीं थी. हालांकि उनमें से कोई नहीं जानता था कि उसकी परेशानी प्रथम विश्व के देशों के चिकित्सकीय ढांचे को एक सीमा पर तोड़ रहा है. ईटिंग डिस्ऑर्डर (यानी खाने की बीमारी) एक नई चिंता बन कर उभर रही है. इस साल फरवरी में, एग्नेस आयटन जो कि इंग्लैंड के रॉयल कॉलेज ऑफ सायकियाट्रिस्टर में ईटिंग डिस्ऑर्डर फैकल्टी के अध्यक्ष है, का अनुमान है कि ईडी मरीजों की सुनामी आएगी. ईडी एक ऐसी बीमारी है जिसमें व्यक्ति या तो बहुत ज्यादा खाने लगता है या फिर वो अपने खाने को इस हद तक कम कर देता है कि भुखमरी की नौबत आ जाती है.

    वैश्विक सर्वेक्षण, राष्ट्रीय ईडी एसोसिएशन के सार्वजनिक मंच और दूसरी कई मीडिया रिपोर्ट में जारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में एक साल में ईडी के मरीजों में चार गुना इजाफा हुआ है. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि 14 से 24 साल की उम्र के बच्चों पर इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है.
    कोलकाता के मनोवैज्ञानिक गौतम चटर्जी ने बताया कि कुछ महीने पहले एक 16 साल का लड़का अपनी मां के साथ मेरे पास आया. वो बहुत कमजोर और दुबला हो गया था. उसकी गड्ढ़ों में धंसी आंखें कई कहानी बयान कर रही थी. पूछताछ करने पर उसकी मां ने उसकी 4 महीने पहले की फोटो दिखाई, मैं उसे देखकर हैरान था. उसने बहुत ही तेजी के साथ अपना वजन घटाया था और पिछले कुछ महीने से उसने अपने पसंदीदा खाने को भी खाने से इनकार कर दिया था. वो लड़का शुरुआती कुछ सेशन में शांत रहा और उसने बात करने से इनकार कर दिया, बीमारी से जुड़ी हुई शर्म की वजह से वो बात नहीं कर रहा था.

    क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक शार्लोट डी कोस्टा जो नेशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ बिहेवोरियल साइंस, कोलकाता से जुड़ी हुई हैं, बताती हैं कि लगातार खाना भी ईडी का ही एक प्रकार है जिसकी वजह सोशल मीडिया पर आने वाले वजन घटाने के विज्ञापन हैं. ये ऐसे लोगों को प्रभावित करते हैं जिन्हें लगता है कि वो सही नहीं हैं.

    XXX की तरफ रुझान
    अगर लोगों को खाने में मुश्किल आ रही है, वो सो नहीं रहे हैं और मिल भी नहीं रहे हैं तो फिर वो क्या कर रहे हैं. निराशाजनक वक्त कई निराशाजनक मनबहलावों को बुलावा देता है. उदाहरण के लिए 1929 और 1939 के दौरान अमेरिका एक महामंदी के दौर से गुजर रहा था, इसी दौरान पोर्नोग्राफी की खपत में भी उल्लेखनीय उछाल देखने को मिला. 90 साल बाद छोटा सा बदलाव हुआ और दुनिया फिर एक मुश्किल में घिर गयी. कई सर्वेक्षण बताते हैं कि पोर्नोग्राफिक सामग्री में इस बार भी उछाल दर्ज की गई और भारत उसमें शीर्ष पर था.

    सारांश जैन जो लखनऊ के एक सेक्सोलॉजिस्ट हैं, उन्होंने न्यूज18 को बताया कि लॉकडाउन के दौरान शिक्षा ऑनलाइन हो गई है, माता-पिता यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि बच्चों को 24*7 इंटरनेट उपलब्ध रहे. ताकि उनकी पढ़ाई में कोई व्यवधान ना आए. इस तरह से बच्चों को लंबी अवधि के लिए इंटरनेट उपलब्ध हो गया जिस पर किसी की कोई निगरानी नहीं थी, इस तरह से वो उस दुनिया में पहुंच गए जो प्रतिबंधित है. कई युवाओं में पोर्न की लत जिज्ञासा से शुरू होती है और अब वो एक ऐसी मुश्किल में बदल चुकी है जो उनका ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत खड़ी कर रही है. उनका सामाजिक और आना-जाना पूरी तरह से बंद है और अलग-थलग हो जाने ने इस लत को और बढ़ावा दिया है.

    युवाओं के अलावा जो लोग आईटी सेक्टर में बहुत दबाव वाले काम कर रहे हैं उनमें भी पोर्न की लत देखने को मिल रही है. नौकरी के चले जाने का डर ऐसी परशानी है जिसने कई लोगों को घबराहट के घेरे में लिया है. उससे बाहर निकलने के लिए और दिमाग को शांत करने के लिए लोग पोर्न की तरफ रुख कर रहे हैं और अब वो उनकी लत बन गई है. खास बात ये है कि इस लत की शिकार समूह में एक नया समूह जुड़ा है वो है भारतीय औरत. अलग-थलग पड़ना, अकेलापन, साथी के साथ कम मेलजोल और पारिवारिक दिक्कतों की वजह से इस अवधि में उनका पोर्न की तरफ झुकाव बढ़ा है.

    एक छोटा सा अंतराल
    एलेक्सीज डेविड को गलियारे से नीचे चल रहा था. जैजगल्स गा रही थी. मोइरा ने पोप की जैसी वेशभूषा धारण की हुई थी, और सारा शिट का नाला हंस रहा था. जिविंग भी उसी हॉल में मौजूद था और रोहित ने अपने लैपटॉप को झटके से बंद किया. वो कुछ समय से असहज महसूस कर रहा था और वो शो आगे नहीं देख सका. रोहित ने न्यूज18 को बताया, उनमें से किसी ने भी मास्क नहीं पहना था, वो एक-दूसरे के इतने करीब थे, ना उनकी स्क्रीनिंग हुई थी और ना ही कोई सैनिटाइजर का इस्तेमाल हुआ था. लेकिन क्या वो सामान्य अभिनय नहीं कर रहे थे. शायद ये कोई पुराना संस्करण है. लंबे वक्त तक क्वारंटाइन रहने के बाद, फिल्म और शोज जहां लोग उनके चेहरों को छूते हैं, भीड़ में इकट्ठा होते हैं. ऐसे लोगों के बीच में घिरे होते हैं जो बीमार हो सकते हैं जिन्हे सर्दी जुकाम हो सकता है, ये एक ऐसी चिंता है जो सामने नहीं है, लेकिन इसकी वजह से फिल्मों से अलगाव होने लगा है और लोग ये सोचने लगे हैं कि ये दुनिया हमारी नहीं रही है.

    दिल्ली की मनोचिकित्सक किरण सलूजा बताती हैं कि कुछ ही ऐसे लोग हैं, लेकिन मेरे पास ऐसे मामले हैं जहां लोगों को फिल्म देखने में परेशानी आ रही है. अखबार, रेडियो, टेलिविजन से लेकर कॉलर ट्यून तक हमें लगातार कोविड से जुड़े जिम्मेदारी व्यवहार के बारे में बताया जा रहा है. और ये हमारी पेशीय याददाश्त का हिस्सा बनता जा रहा है. हमें एक नई तरह की व्याख्या पढ़ने को मिल रही है जहां हम जो भी कुछ देख रहे हैं वो हकीकत है. रोहित की तरह कई ऐसे समूह हैं जिन्हें फिल्म देखने में परेशानी महसूस हो रही है. कई लोगों को फिल्म देखने, स्वीमिंग पूल जाने, इकट्ठा होने, शादी या किसी भी तरह से बाहर जाने में चिंता होने लगी है. गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे सबूत पाए गए हैं कि सर्वनाश से जुड़ी फिल्मों के प्रशंसक बाकियों की तुलना में किसी महामारी से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकते हैं. खैर क्या होता है क्या नहीं. न्यूज18 बस इतनी उम्मीद करता है कि जल्दी ही हम उस दुनिया में लौटेंगे जिसके लिए इतने वक्त से तरस रहे हैं.

    (नोट: नाबालिगों के नाम उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए बदल दिए गए हैं.)

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