कोविड ICU में एक दिन: दिल्ली के होली फ़ैमिली अस्पताल के ICU में कैसा रहा 7 घंटे बिताना

इलाज के दौरान अस्पताल में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज. (पीटीआई फाइल फोटो)

इलाज के दौरान अस्पताल में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज. (पीटीआई फाइल फोटो)

कोरोना महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहे भारत की राजधानी की भी हालत बेहद खराब है. लगातार बढ़ रहे मामलों को काबू करने के लिए युद्धस्तर के प्रयास किए जा रहे हैं. गंभीर संक्रमण से जूझने वाले आईसीयू में दिन भर कैसी हलचल मची रहती है. पढ़ें इस खास रिपोर्ट में

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दिल्ली का होली फ़ैमिली अस्पताल कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई के केंद्र में है. दक्षिण पूर्व दिल्ली के होली फ़ैमिली हॉस्पिटल के डॉक्टर सुमित रे 10 बजे सुबह पीपीई गाउन पहने आईसीयू के कमरा संख्या 4 में पहुंचते हैं और ड्यूटी पर तैनात नर्सों का अभिवादन करते हैं जिनकी ड्यूटी दो घंटे पहले शुरू हुई. इस कोविड आईसीयू में 60 बेड हैं और आपस में कुछ सलाह मशविरा के बाद ये लोग इन सभी 60 लोगों की निगरानी शुरू कर देते हैं.

यहां पर अस्पताल के अन्य हिस्से में जो भागदौड़ मची है उसका नामोनिशान नहीं है. यहाँ पर सिर्फ दबे पाँव चलने, धातु की चद्दरों को खींचे जाने और मॉनिटर्ज़ पर बीप की आवाज़ आती है.

डॉक्टर आहिस्ता से चलते हुए पूरे कक्ष का दौरा करते हैं, कभी कभी किसी बेड के पास रुकते हैं, मरीज़ के चार्ट शीट पर नज़र दौड़ाते हैं. अधिकांश मरीज़ दवाओं के भारी डोज़ के कारण बेहोश हैं. बेड की दो क़तारों के बीच एक रास्ता है जो काफ़ी चौड़ा नहीं है.

अगर कोई और समय होता तो इस आईसीयू में 48 लोगों को रखा जाता और डॉक्टर रे एक मरीज़ को सात से आठ मिनट का समय देते. पर कोविड के बढ़ते मामले और किसी को भी मना नहीं करने के निर्णय के कारण यहाँ ज़्यादा लोगों को रखना पड़ा.
डॉक्टर रे कहते हैं, “इस बार की लहर में जो एक बात देखने में आयी है वह है मामलों में आयी भारी तेज़ी. अगर कम मरीज़ होते तो हम उनका ज़्यादा बेहतर ख़याल रख पाते, अभी हम एक मरीज़ को तीन से चार मिनट ही दे पाते हैं”. डॉक्टर रे इस अस्पताल में क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख और चिकित्सा अधीक्षक भी हैं.

इस कमरा नम्बर 4 के अलावा अस्पताल में कोविड का एक और आईसीयू है और वहाँ भी बेड लगाया गया है ताकि ज़्यादा लोगों को भर्ती किया जा सके.

इस अस्पताल में 49 वेंटीलेटर हैं और ये सब प्रयोग में हैं. इनके अलावा ऐनस्थीज़ा मशीन का प्रयोग भी अस्थायी रूप से वेंटीलेशन के लिए हो रहा है. अधिकारियों ने बताया कि अस्पताल ने और वेंटीलेटर ख़रीदने का ऑर्डर दिया है पर उनके आने में देरी हो रही है.



अस्पताल में कुल 390 बेड वयस्कों को के लिए है. अप्रैल के पहले सप्ताह से होली फ़ैमिली को सौ फ़ीसदी कोविड अस्पताल घोषित कर दिया गया है. तब से अभी तक अस्पताल में 1,600 मरीज़ों को भर्ती किया गया और इनमें से 190 लोगों की मौत हो गयी. इनमें से 50 फ़ीसदी लोगों की मौत अस्पताल के आईसीयू में नहीं होकर इमर्जन्सी में आने पर ही हो गयी.

सुबह 10.30 बजे पीपीई पहने पाँच कर्मचारी 70 साल के एक व्यक्ति के चारों ओर खड़े हो जाते हैं जो कि कमरा नंबर 4 में वेंटीलेटर पर है. उल्टी गिनती के बाद मरीज़ को एक सचल स्ट्रेचर पर डाल दिया जाता है और उन्हें उनकी साँस प्रणाली के इलाज के लिए ले जाया जाता है. बहुत ज़्यादा समय नहीं बीतता है जब बगल के एक आईसीयू बेड पर मौजूद एक मरीज़ को उनके वेंटीलेटर पर डाल दिया जाता है जब उनका ऑक्सिजन लेवल गिरने लगता है.

रेज़िडेंट डॉक्टर्ज़, नर्सों और इंटर्न के बीच बहुत कम बातचीत होती है. स्टाफ़ किसी मशीन की तरह एक बेड से दूसरे बेड तक जाते हैं – मरीज़ों को दवा देते हैं, उनके महत्त्वपूर्ण लक्षणों को चेक करते हैं, नोट करते हैं और उनमें आए किसी भी ऐसे छोटे से छोटे परिवर्तन पर ग़ौर करते हैं जो मरीज़ के लिए जानलेवा हो सकता है और कहीं पर भी ये कुछ सेकेंड से अधिक देर तक नहीं टिकते हैं. दो सदस्य लगातार काम कर रहे हैं और वे कंप्यूटर में डाटा को अपडेट कर रहे हैं.

डॉक्टर रे अभी मरीज़ों का हाल जानने के लिए राउंड पर हैं. एक जगह वे 35 साल के एक मरीज़ का हाल जानने के लिए रुकते हैं जिसके नाक पर ऑक्सिजन का हाई फ़्लो पाइप लगा है. मरीज़ की बेचैनी को डोर करने के लिए वह एक नेटफ़्लिक्स शो पीकी ब्लाइंडर्स के बारे में बताते हैं. मरीज़ मुस्कुराता है और वह वह गर्म में जिस स्थिति में शिशु सिमटा रहता है वैसे ही लेट जाता है ताकि बेहतर तरीक़े से साँस ले सके.

रे कहते हैं, “क्रिटिकल वार्ड में युवा लोगों में संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है. इसके बावजूद कि इनमें से अधिकांश अच्छी तरह ठीक हो जाते हैं, चिंता लगी रहती है”.

कमरे के एक छोर पर एक छोटे पर्दे को एक ओर हटाकर दो कर्मचारी पीछे से निकलते हैं और बेसिन की ओर जाते हैं जहां वे अपना हाथ काफ़ी देर तक मलते रहते हैं. एक अन्य स्टाफ़ पर्दे के पीछे से एक स्ट्रेचर खींचता है जिस पर उजले कपड़े में कोई शव लिपटा होता है. लगभग 50 की उम्र के इस मरीज़ को अस्पताल में भर्ती हुए चार दिन से अधिक हुआ रहता है. कुछ घंटे पहले इसकी मौत हो जाती है और अब उसको शव गृह में भेजने की तैयारी हो रही है जिसके लिए उसके शरीर में लगे तार और मॉनिटर को हटाया जाना है. दो इंटर्न कंप्यूटर में डाटा अपडेट करते हाँ और इसके बाद इस जगह को किसी और मरीज के लिए तैयार किया जाता है.

बदहाल राजधानी

राजधानी में हर रोज़ 19,000 मामले हो रहे हैं और कोरोना की दूसरी लहर ने इसे पस्त कर रखा है. देश में जहां भी सर्वाधिक संक्रमण हो रहे हैं दिल्ली उनमें एक है और यहाँ हर दिन मरनेवालों की संख्या एक नया रेकर्ड बना रही है. होली फ़ैमिली जैसे अस्पताल पर भारी दबाव पड़ रहा है और सरकार भी तनाव में है. 30 से अधिक मरीज़ों की मौत ऑक्सिजन नहीं मिलने के कारण हो गयी है. कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब जाकर अब ऑक्सिजन की स्थिति में सुधार हो रहा है और टेलिफ़ोन पर लोगों को सुझाव देने के लिए डाक्टर्ज़ को उपलब्ध कराने के बाद अब अस्पतालों पर थोड़ा दबाव कम हो रहा है.

किस मरीज़ को आईसीयू बेड मिलेगा यह निर्णय बहुत ही जटिल कारकों पर निर्भर करता है, ऐसा कहना है डॉक्टर रे का. वे बताते हैं, “पूरी टीम बैठती है यह फ़ैसला करने के लिए कि अब किसको भर्ती किया जाए. यह फ़ैसला उम्र, मरीज़ की हालत आदि के आधार पर हो सकता है. कई बार हमें फ़ैसला करने के लिए चार बजे सुबह में बुला लिया जाता है. इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि अस्पताल में भर्ती मरीज़ को आईसीयू में जगह मिल ही जाएगी.”

जैसे ही सस्ट्रेचर पर किसी की लाश को रखकर उसे बाहर ले जाते हैं, नर्स दो बेड्ज़ के बीच एक एक्स-रे मशीन रख देती हैं. एक बेड जो कि अस्थायी है, वह थोड़ा कम ऊँचा है. दो महिलाएँ जिनकी उम्र 27 और 29 साल है, बगल के बेड्ज़ पर हैं. दोनों एक दूसरे को नहीं जानते अपर दोनों में एक बात आम है – दोनों 32 सप्ताह से प्रेगनेंट हैं. नर्सिंग में शामिल स्टाफ़ बंद ज़ुबान से इस बात की प्रार्थना करते रहते हैं कि इनके बच्चे सुरक्षित हों. दूसरी लहर में गर्भवती महिलाओं को ज़्यादा मुश्किलों में नहीं पाया गया है.

रे का कहना है कि स्थिति ऐसी है कि उनके स्टाफ़ महीनों से बिना छुट्टी लिए काम कर रहे हैं. इस अस्पताल की स्थापना 1953 में मेडिकल मिशन सिस्टर्ज़, होली फ़ैमिली ने की जिसने इसे बाद में दिल्ली कैथोलिक आर्च्डाययसेज़ को सौंप दिया और इस समय रेव्रंड अनिल ज़ेटी कूटो, दिल्ली के आर्चबिशप इस अस्पताल की शासकीय निकाय के अध्यक्ष हैं. रे इस पेशे में 31 साल से हैं और कई अस्पतालों में उन्होंने वरिष्ठ पदों पर काम किया है.

रे कहते हैं, “हमरे नर्स काफ़ी दयालु हैं, वे दिल से बोलते हैं और निजी स्तर पर मरीज़ों की देखभाल करते हैं … पूरा स्टाफ़ उन दो गर्भवती महिलाओं की देखभाल कर रहे हैं’.

कमरा नम्बर 4 के बांयी ओर एक गैलरी आईसीयू के दूसरे हिस्से को जाता है. आगे दो छोटे कमरे हैं जिनके दरवाज़े खुले हुए हैं जिसमें एक-दो नर्स को ब्रेक के दौरान जल्दबाजी में जूस पीते देखा जा सकता है.

कोरोना के मामले में जिस तरह की तेज़ी आयी है उसको देखते हुए नर्सिंग स्टाफ़ के शिफ़्ट को अब 12 घंटे का कर दिया गया है. पहले यह आठ घंटों के तीन शिफ़्ट में काम करते थे. नर्स हमेशा एक पर एक कई मास्क पहनती हैं और फिर पीपीई गाउन और ग्लव्ज़ भी लगाती हैं. शिफ़्ट के दौरान उन्हें खाने का समय नहीं मिलता.

इनमें से अधिकांश अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराए गए कमरे में अस्पताल के परिसर में ही रहते हैं. जो थोड़ी देर सोना चाहते हैं उनके लिए कमरे में एक चारपाई लगा दी गयी है.

लगभग 12.30 बजे दोपहर, दूसरे आईसीयू में दरवाज़े के पास एक बेड लगा है और इस मरीज़ का मॉनिटर अचानक ही बीप करने लगता है. छह लोग उधर भागते हैं. यह आदमी बेहोश है. यह देखते हुए कि उसका ऑक्सिजन स्तर नीचे गिर रहा है, टीम उसे उठाकर उसे पेट के बल लिटा देता है ताकि उसको साँस लेने में ज़्यादा तकलीफ़ नहीं हो.

यहीं पर एक अन्य बेड पर 51साल का एक व्यक्ति अपने हाथ पर सिर को टिकाए बैठा है और बीच बीच में अपने बोतल से पानी पीता है. वह थका हुआ लगता है और साँस लेने में तकलीफ़ की समस्या से जूझ रहा है और अंत में बोतल उसके हाथ से छूटने लगता है. एक नर्स यह सब देखती है और जाकर उसके हाथ में एक टैबलेट थमा देती है जिस पर वह अपने परिवार के लोगों को देखता है.

“आप लोग चिंता नहीं करें. हम सब लोग यहाँ ठीक हैं. आप सिर्फ अपना ख़याल रखें,” वीडियो कॉल पर उसका भाई उसे कहता है. “आपको पता है कि हमें स्मार्टफ़ोन से पीछा छुड़ाना पड़ा यहाँ? इतने लोग आपको कॉल करते थे कि टच स्क्रीन काम नहीं करता था. आप इतना ज़्यादा लोकप्रिय हैं,” उसके भाई ने कहा. मरीज़ मुस्कुराया, अपने बालों में हाथ फेरा और उन लोगों को थम्स अप किया.

नर्सों ने बताया कि उन्होंने परिवार के लोगों को आईसीयू का नंबर दे रखा है और मरीज़ों को टैबलेट दे दिया है क्योंकि कोविड वार्ड में किसी भी मरीज़ के रिश्तेदार को आने की इजाज़त नहीं है. “हम परिवार के सदस्यों को दिन में एक या दो कॉल करने की इजाज़त देते हैं. इससे उनका मनोबल ऊँचा बना रहता है”.

जैसे ही दोपहर के भोजन का समय होता है, कई खानोंवाला ट्रॉली जूस और गर्म पेय लेकर आता है. इसमें जोर पौष्टिक आहार पर होता है ताकि मरीज़ों को इलाज में सहूलियत हो. अधिकांश मरीज़ सिर्फ द्रव (liquid) ही ले पाते हैं. कुछ लोग स्वाद और गंध नहीं आने के कारण खाना नहीं खाना चाहते. नर्स ऐसे लोगों को मनाने की कोशिश करती हैं.

आईसीयू के बाहर भीड़ जमा होने लगी है. चूंकी अंदर किसी भी व्यक्ति को आने की इजाज़त नहीं है, सो परिवार के सदस्य डॉक्टर से मिल कर अपने अपने मरीज़ों का हाल जानना चाहते हैं. आईसीयू में एक हिस्से के आगे उन्हें आने नहीं दिया जाता फिर भी इनमें से कई सीढ़ियों या फ़र्श पर पर घंटों बैठे रहते हैं. जब भी दरवाज़ा खुलता है, वे उठकर खड़े हो जाते हैं और सब मेडिकल स्टाफ़ की ओर देखने लगते हैं.

भूतल पर जहां इमर्जन्सी सेक्शन है, वहाँ का हाल कुछ और होता है. यहां आनेवाले अधिकांश मरीज़ आइसोलेशन में रह चुके होते हैं और जब उन्हें ऑक्सिजन की ज़रूरत होती है, वे आते हैं. अस्पताल के स्टाफ़ को कह दिया गया है कि वे किसी को भी आने से मना नहीं करें जब तक कि एक भी सीट खाली है. लगभग हर मरीज़ को ऑक्सिजन दिया जाता है भले ही कम समय के लिए ही क्यों न दिया जाए.

प्रवेश के ठीक आगे एक पुरुष और एक महिला को केंद्रीय ऑक्सिजन आपूर्ति से जोड़ा गया है. पुरुष एक स्ट्रेचर पर है और उसका भाई उसको पंखा से हवा कर रहा है. “मेरे भाई को साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है. हम भाग्यशाली हैं कि हमें इमर्जन्सी में दो घंटे में जगह मिल गयी,” यह कहना है विरेंद्र सैनी का.

अब ये लोग बेड मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं. “अगर अस्पताल हमें बताता है कि बेड उपलब्ध है तो हम उसे भर्ती करा देंगे,” उसने कहा.

पास में खड़े दवा विक्रेता तुषार कुमार का कहना है कि उनके दादा-दादी की कोविड से कुछ ही दिनों के अंतर पर मौत हो चुकी है. अब चार दिनों से अस्पताल की खोज करते करते उसे इमर्जन्सी में अपने पिता के लिए एक स्ट्रेचर मिल गया है.

“हम कई जगह गए पर अब यहाँ आकर हमें जगह मिली है. इस समय उसे ऑक्सिजन की ज़रूरत है और अस्पताल का कहना है कि वे इसका प्रबंध कर सकते हैं,” कुमार ने कहा.

अन्य दिनों, इमर्जन्सी के सामने के सेक्शन जो कि रजिस्ट्रेशन काउंटर के पास है, उसको भी मिनी वार्ड में बदल दिया गया है.

इस तरह के कई अस्थायी इंतज़ाम किए गए हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों को रखा जा सके. इस तरह से रखे गए मरीज़ों के बेड के बीच बमुश्किल एक फ़ुट की दूरी होती है. यहाँ पर मरीज़ों का देखभाल करनेवालों का आवश्यक रूप से जाँच नहीं होता, वे अपने रिस्क पर होते हैं.

शौचालय के पास एक बेड पर एक बेटा अपनी मां का पीठ सहला रहा है ताकि उसे साँस लेने में आसानी हो. यह जगह सामानों के लिए है जहां दवा आदि रखे गए हैं पर यहीं पर एक बेड लगा दिया गया है और एक सिलिंडर भी. इस कॉरिडर के अंत में भी इसी तरह एक बेड लगा दिया गया है और बमुश्किल यहाँ दरवाज़े के खुलने की जगह बची है.

बेड के अलावा कुर्सियों पर भी मरीज़ हैं – स्टील की 15 कुर्सियाँ वार्ड के बीचोंबीच बेतरतीब रख दी गयी हैं जिन पर ऑक्सिजन की व्यवस्था है. कुछ मरीज़ों को सेंट्रल लाइन से LMO (लिक्विड मेडिकल ऑक्सिजन) दिया जा रहा है जबकि कुछ अन्य D-आकार के सिलिंडर से साँस ले रहे हैं जिसकी क्षमता 40-60 लीटर की है. कुछ मरीज़ अपना सिलिंडर खुद लाए हैं.

70 वर्ष की एक महिला स्टूल पर बैठी है और उसका बेटा वहीं स्ट्रेचर पर और जार-जार आंसू बहाए जा रही है. एक अन्य महिला नर्स से अपने पति को देखने को कहती है. दो जवान बेटे अपने बाप के मास्क को ठीक से लगाए जाने के लिए नर्स को बेसब्री से ढूँढ रहे हैं क्योंकि वह सिलिंडर से बार-बार हट जाता है.

कई बार स्टाफ़ को दौड़ते हुए देखा जा सकता है.

एक कोने में दो भाई स्टाफ़ से अपने पिता को भर्ती कर लेने की अपील कर रहे हैं. स्टाफ़ बताता है कि अगर कोई अस्पताल से छोड़ा जाता है तभी वे ऐसा कर पाएँगे. “अगर उन्हें यहाँ जगह नहीं मिली तो मेरे पिता कहाँ जाएंगे? हमारे पास घर पर भी ऑक्सिजन नहीं है,” वे बोलते हैं, उनके हाथ में एक प्लास्टिक का झोला है जिसमें उनके बाप की सारी रिपोर्ट है.

चिकित्सा अधीक्षक के कमरे में इमर्जन्सी का कोलाहल नहीं पहुँचता. यहाँ पर एक अन्य तरह का संकट पैदा हो रहा है. डॉक्टर रे को खबर मिली है कि बतरा अस्पताल में ऑक्सिजन की कमी के कारण आठ मरीज़ मर गए हैं.

दिन जैसे जैसे आगे बढ़ता है, रे कहते हैं, उनकी चिंता बढ़ती जाती है. “जब भी ऑक्सिजन आपूर्ति की बात होती है, हर दिन हम साँसत में होते हैं. सिलिंडर लाने जो ट्रक भेजा गया है उसके 24 घंटे के बाद आने की उम्मीद होती है. हमारे पास पर्याप्त LMO है पर मांग बढ़ रही है. इसका समाधान ज़रूरी है”.

एम्बुलेंस के सायरन की आवाज़ पर रे कहते हैं, “हमारे बड़े नेताओं ने तो कह दिया कि कोरोना खतम हो गया …आज भी कई राज्य इस बारे में सूचना छिपा रहे हैं…अस्पतालों और डाक्टर्ज़ के लिए कितना कुछ किया जाना बाक़ी है ताकि वे मरीज़ों की मदद कर सकें”.

और उनकी माँग सिर्फ इतनी है. “नर्स, स्टाफ़ दिन-रात काम करते हैं … हम नहीं चाहते कि ऑक्सिजन हमें धोखा दे,डॉक्टर रे ने कहा और इसके बाद वे रात की तैयारी में टीम के लोगों के साथ लग जाते हैं.

हालाँकि, इस मुश्किल समय में आशा भी जागती है. ठीक हो रहे मरीज़ों पर जश्न का कोई समय नहीं होता. हर व्यक्ति जो ठीक होकर घर पहुँचता है, ईश्वर की कृपा से संभव होता है. डॉक्टर रे कहते हैं, “हमारे पास बच्चों के लिए 40 बेड हैं और एक 14 साल का एक बच्चा वेंटीलेटर पर था. पर उसे कुछ नहीं हुआ. कुछ दिनों बाद वह ठीक हो गया और अब अपने घर जा चुका है. अभी भी उम्मीद है”.  (साभार इंडियन एक्सप्रेस)

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