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Opinion- कोरोना के दिनों में : पहले मैं सन्‍नाटा बुनता हूं

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: March 25, 2020, 2:48 PM IST
Opinion- कोरोना के दिनों में : पहले मैं सन्‍नाटा बुनता हूं
लॉकडाउन के बाद कुछ ऐसा है नज़ारा

भले ही कुछ दिन के लिए ही सही. यह वर्क फ्रॉम होम का जलवा है कि उसने भागदौड़ में होम होते हुए जीवन को सांसें बख्‍श दी हैं. सबसे बुरा समय भी उतना बुरा नहीं होता है, जितना हम समझते हैं.

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  • Last Updated: March 25, 2020, 2:48 PM IST
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पहले मैं सन्‍नाटा बुनता हूं. कवि अज्ञेय की ये पंक्ति इन‍ दिनों लगातार साथ बनी रहती है. अपने कमरे से वर्क फ्रॉम होम करते बहुत से वे काम भी दिखाई देते रहते हैं, जो आंखों और कानों के समीप होते हुए भी मन से अछूते थे. कभी उनकी तरफ ध्‍यान नहीं जाता था. जैसे दिन भर पाकड़ के पेड़ पर गिलहरियों की धमाचौकड़ी होती रहती है. वे फिर छोटे दिखनौसी हवा हवाई पेड़ों पर भी सरपट भाग लेती हैं. वे लगातार आवाजें निकालती रहती हैं. एक तरह कि चटचटाहट सी करती हैं. शुरू में तो लगा कि क्‍या यह झींगुर की आवाज है, लेकिन फिर पहचान में आ गई कि यह गिलहरियों की कृपा है.

गिलहरियों से ध्‍यान हटाने के लिए कबूतर का जोड़ा आ जाता है. अब तक इन कबूतरों से यही रिश्‍ता था कि वे रात में आकर बालकनी के ऊपर एसी पर बैठे रहते थे. रात की उनकी मौजूदगी का पता सुबह बालकनी के फर्श पर पड़ी बीट से चलता था. लेकिन अब दिन में कमरे का दरवाजा खुला रहता है. कबूतरों की इच्‍छा है कि मेरे किताबों के रैक के ऊपर ही अपना घोंसला बना लें. शायद कबूतरी अंडा देना चाहती है. लेकिन मेरे पास इतनी गुंजाइश नहीं है कि अपना कमरा उसे दे सकूं. दोनों तरफ से संघर्ष बना रहता है. इसी संघर्ष में एक दिन कबूतर आकर गांधी जी की मूर्ति पर बैठ गया. शांति के प्रतीक के इस हमले से अहिंसा के पुजारी का बुत टूट गया.

लेकिन गांधी की महिमा अलग है. जैसे देश में जब कभी जब कहीं उनकी कोई मूर्ति गिराई जाती है तो बिना किसी दंगा फसाद के उनकी नई मूर्ति लग जाती है. ऐसा लगता है जैसे बापू नए होकर आ गए हों. ऐसा ही मेरे यहां हुआ. संयोग से कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में गांधी जी की नई मूर्ति मिली थी, नई मूर्ति ने पुरानी की जगह ले ली.

इतना लिखते लिखते फिर पेड़ की आवाजें ध्‍यान खींच रही हैं. कुछ चिडि़या चहक रही हैं. वे कई नस्‍ल की जान पड़ती हैं. क्‍योंकि एक सी आवाज की जगह अलग अलग तरह की आवाजों का गुलदस्‍ता कान में गूंज रहा है.



इमारत की एक बीम पर मधुमख्खियों ने फिर अपना छत्‍ता बना लिया है. इसे कई साल बाद कुछ समय पहले तुड़वाया गया था. लेकिन उन्‍होंने अपनी कॉलोनी नए सिरे बना ली है. पेड़ पर नई फुनगियां भी आ रही हैं. उन पर पीली बर्र और पीली तितलियां मंडराती रहती हैं. कभी कभी कोई बर्र टहलते हुए मेरी टेबल तक चली आती है. आने के बाद जाने में अक्‍सर उसे दिक्‍कत आती है. कांच के परदे उसे भरमा देते हैं. काम छोड़कर दरवाजे और खिड़की खोलो तो बाहर जाती है.

शाम के समय नीले आसमान में कभी बगुले, कभी तोते तो कभी चीलें दिखाई देती हैं. बगुले बमुश्किल दो तीन ही एक साथ दिख रहे हैं. तोते तो सिर्फ दो ही एक साथ जाते दिखे. झुंड कितने छोटे हो गए हैं. बगुले तो पंक्ति बनाकर कम से कम 20-25 के समूह में उड़ते देखा करता था. वे तो कालिदास से लेकर महादेवी जी तक भारतीय कवियों की प्रेरणा रहे हैं. महादेवी जी ने लिखा था न, बक पातों के अरविंद हार. उन्‍हें आसमान में उड़ते बगुलों में श्‍वेत कमल के विचरते हुए हार दिखते थे. और तोते तो मैंने हमेशा से बड़े झुंड में बडे सपाटे से उड़ते हुए ही हमेशा देखे थे, अब सिर्फ दो बचे हैं.

मुझे लगा था कि हमारा स्‍वभाव और हालात ही हमने सत्‍यानाश किए हैं, लेकिन हमारी लालसा ने पक्षियों का सामाजिक तानाबाना भी तोड़ दिया है. ये बड़े बुरे बदलाव हैं. सब तरफ तन्‍हाई का भूत सवार हुआ जा रहा. लेकिन इस तन्‍हाई को कोयल की कूक अब भी वैसे ही तोड़ देती है, जैसे बचपन से तोड़ती आई थी. कोयल को देखना हमेशा की तरह आज भी दुर्लभ, लेकिन उसकी आवाज हमेशा की तरह आज भी ऊंची, मीठी और सुरीली है. यह नर कोयल की प्रणय निवेदन की आवाज है. यानी नई सृष्टि के सृजन के निहोरे की धुन है. कोयल किसी पेड़ की शिखर से ठीक नीचे पत्‍तों के बीच छुपी बैठी होगी. सुर्ख काली, कौवे से थोड़ी बड़ी और अपने हुनर पर इतराती और शरमाती हुई. अपने बोल से सारे पक्षी वर्ग में अद्वितीय होती हुई.

कोयल, बर्र, बगुला, तोता, गिलहरी सब जीवन में लौट आए हैं, भले ही कुछ दिन के लिए ही सही. यह वर्क फ्रॉम होम का जलवा है कि उसने भागदौड़ में होम होते हुए जीवन को सांसें बख्‍श दी हैं. सबसे बुरा समय भी उतना बुरा नहीं होता है, जितना हम समझते हैं. जिनकी अंटी में पैसा और घर में राशन है, वे इस तरह सोच सकते हैं. अपने सन्‍नाटे को बुन सकते हैं. जिनके पास यह सब नहीं है, उनका खुदा हाफिज.​

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First published: March 25, 2020, 1:51 PM IST
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