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दूसरी लहर के दौरान जिसे समझ रहे थे ‘चमत्कारिक’ दवा, वो मौत के खतरे को भी नहीं करती कम

दूसरी लहर के दौरान जिसे समझ रहे थे ‘चमत्कारिक’ दवा, वो मौत के खतरे को भी नहीं करती कम

रेमडेसिविर को लेकर चौंकाने वाला खुलासा. (File pic)

रेमडेसिविर को लेकर चौंकाने वाला खुलासा. (File pic)

Remdesivir: दूसरी लहर के प्रकोप से पहले नवंबर 2020 में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रेमडेसिविर के इस्तेमाल को लेकर अपना परामर्श जारी करते हुए कहा था कि कोविड के मरीजों को बचाने में यह दवा कारगर है ऐसे फिलहाल कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने सॉलिडेरिटी ट्रायल के आधार पर यह सुझाव दिया कि, मृत्युदर,वेंटिलेटर, रोगी में सुधार का समय जैसे मामलों में दवा का कोई खास असर नजर नहीं आता है.

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नई दिल्‍ली. कोरोना की दूसरी लहर (Coronavirus Wave) के दौरान जितनी खबरें लोगों के मरने  (Corona Deaths) और ऑक्सीजन की कमी की आ रही थी, उतनी ही सुर्खियां एक दवा ने बटोरी थी, रेमडेसिविर (Remdesivir). जिस दवा का नाम कई लोग ठीक से नहीं ले पा रहे थे, वही दवा (Covid 19 Medicine) दूसरी लहर के दौरान अपनी कीमत से 5 गुना ज्यादा कीमत पर बिकी थी. यही नहीं इससे भी खास बात यह रही कि कई लोग तो ऐसे भी रहे जिन्होंने अपनों को बचाने के लिए 5 गुना कीमत चुकाई और उन्हें असली दवा भी नहीं मिली. कितने मामले ऐसे आए जब रेमडेसिविर के इंजेक्शन की जगह ग्लूकोज से भर कर दिया गया. अप्रैल महीने के मध्य का वह दौर जब दूसरी लहर अपने भयावह रूप में थी और पूरा सोशल मीडिया रेमडेसिविर और प्लाज्मा की गुहार से भरा हुआ था. कई लोग जो बच नहीं पाए और उनका परिवार, उनके अपने इस बात को लेकर शोक में डूबे हुए हैं और पछतावे में है कि काश अगर उन्हें रेमडेसिविर मिल गयी होती तो उनके अपने की जान बच गई होती.

तो क्या रेमडेसिविर वाकई में जान बचा सकती थी
तो भारत के तमाम लोग जो यह सोचते हैं कि रेमडेसिविर नहीं मिल पाने की वजह से उनके अपनों की जान गई उन्हें शायद इस बात से संतोष मिल सकता है कि रेमडेसिविर एक प्रायोगिक दवा थी, कोई चमत्कारिक दवा नहीं थी, इसलिए जैसा हम सोच रहे थे रेमडेसिवर या प्लाज्मा ऐसा कोई असर नहीं डालती है.

रेमडेसिविर के तथ्य और सत्य
कई अध्ययनों से पता चलने के बाद कि प्लाज़्मा का कोविड-19 के उपचार में कोई योगदान नहीं है, इसे उपचार के दिशानिर्देश से बाहर कर दिया गया. इसी तरह भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसके इस्तेमाल को भी कम करने के निर्देश दिए है. अब यह दवा सिर्फ उन मरीजों को दी जा सकती है जिन्हें ऑक्सीजन दी जा रही है लेकिन जो मरीज वेंटिलेटर पर या एक्मो पर है उन्हें भी यह दवा नहीं दी जाती है. इस तरह से इसके इस्तेमाल को सीमित कर दिया है. दिशानिर्देश से साफ होता है कि पांच दिन से ज्यादा इस दवा के इस्तेमाल से कोई लाभ के साक्ष्य नहीं मिलते हैं.

दूसरी लहर के प्रकोप से पहले नवंबर 2020 में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रेमडेसिविर के इस्तेमाल को लेकर अपना परामर्श जारी करते हुए कहा था कि कोविड के मरीजों को बचाने में यह दवा कारगर है ऐसे फिलहाल कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने सॉलिडेरिटी ट्रायल के आधार पर यह सुझाव दिया कि, मृत्युदर,वेंटिलेटर, रोगी में सुधार का समय जैसे मामलों में दवा का कोई खास असर नजर नहीं आता है.

इस सॉलिडेरिटी ट्रायल को 30 देशों के 405 अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों पर संचालित किया गया जिसमें पाया गया कि 2750 ऐसे मरीज जिन्हें रेमडसिविर दिया गया था उनकी भी मौत ठीक उन्हीं 2708 मरीजों की तरह हुई जिनका सामान्य इलाज किया जा रहा था. जिससे साफ था कि दवा ने मृत्यु को रोकने में कोई महती भूमिका नहीं निभाई थी. इसी तरह फ्रांस, यूरोपियन संघ समिति और अन्य देशों के प्रायोजित रिकवरी ट्रायल में भी इस दवा के कोई फायदे नहीं दिखे थे.

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एसपी कालांतरी का कहना है कि तमाम तरह के क्लीनिकल ट्रायल के 7000 मरीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि रेमडेसिविर मृत्यु के खतरे को कम नहीं करती है. डॉ. कालांतरी का कहना है कि जनता को यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह जीवन बचाने वाली दवा नहीं है.

सिर्फ 9 लाख लोगों को मिली रेमडेसिविर
IQVIA का डेटा बताता है कि नवंबर 2019-2020 और नवंबर 2020-21 के दौरान करीब 54 लाख रेमडेसिविर के इंजेक्शन बेचे गए. अगर इलाज के आधार पर समझें तो एक मरीज को 6 इंजेक्शन की ज़रूरत होती है जिनमें से पहले दिन 2 और बाकी 4 दिन एक इंजेक्शन लगाया जाता है. अगर इस आधार पर समझें तो कुल 9 लाख लोगों को रेमडेसिविर दिया गया, हालांकि इस डेटा में काले बाजार में उपलब्ध दवा का जिक्र नहीं है. लेकिन फिर भी भारत में कुल 3.80 करोड़ लोग कोरोना के शिकार हुए और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 5 लाख लोगों की जान गई. इस मुकाबले में यह डेटा ऊंट के मुंह में जीरा साबित होता है.

रेमडेसिविर को कुछ अध्ययन का समर्थन
हाल ही में प्रकाशित न्यू इंग्लैड जरनल ऑफ मेडिसिन के शोधार्थियों ने पाया कि रेमडेसिविर के तीन दिन के कोर्स से अस्पताल में भर्ती होने की आशंका 87.5 फीसद कम होती है. इसी तरह एक अध्ययन बताता है कि ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे लोगों के लिए यह दवा कारगर साबित हो सकती है. लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि रेमडेसिविर को जिस उद्देश्य के साथ कोविड के इलाज के लिए लाया गया था कि इससे मृत्युदर में कमी आएगी. ऐसे कुछ खास परिणाम इससे नहीं मिले हैं, हालांकि लगातार अलग-अलग दवाओं के इस्तेमाल से हम कोरोना की स्ट्रेन को दवाओं के खिलाफ और मजबूत कर सकते हैं और इस तरह उसका म्यूटेशन ज्यादा खतरनाक हो सकता है. इसलिए रेमडेसिविर को एक चमत्कारी दवा के तौर पर लिया जाना छोड़ देना चाहिए.

Tags: Coronavirus, COVID 19, Remdesivir

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