Covid Lockdown: लॉकडाउन में लौटे प्रवासी कामगारों ने फंसे श्रमिकों से की 5 गुना ज्यादा कमाई- स्टडी

पिछले साल लॉकडाउन के बाद केवल 45 प्रतिशत महिला प्रवासी अपने शहरी कार्यस्थलों पर लौटी हैं (PTI)

पिछले साल लॉकडाउन के बाद केवल 45 प्रतिशत महिला प्रवासी अपने शहरी कार्यस्थलों पर लौटी हैं (PTI)

येल विश्वविद्यालय (Yale University survey) ने अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के बीच उत्तर और मध्य भारत में 5000 प्रवासियों पर ये सर्वे किया था. सर्वे के नतीजे बुधवार को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जारी होंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 28, 2021, 7:25 AM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस की दूसरी लहर में देशव्यापी तालाबंदी की आशंका के बीच अलग-अलग बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) का पलायन जारी है. इस बीच हालिया स्टडी में एक बड़ी जानकारी सामने आई है. येल विश्वविद्यालय (Yale University survey) के सर्वे के मुताबिक, पहले कोरोना लॉकडाउन (Covid Lockdown) के बाद शहरों में लौटे प्रवासी मजदूरों ने लॉकडाउन में फंस गए प्रवासी कामगारों की तुलना में लगभग पांच गुना ज्यादा कमाई की. वहीं, पिछले साल के लॉकडाउन ने महिला मजदूर पुरुषों से ज्यादा प्रभावित हुई. येल विश्वविद्यालय ने अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के बीच उत्तर और मध्य भारत में 5000 प्रवासियों पर ये सर्वे किया था.

सर्वे के नतीजे बुधवार को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जारी होंगे. इसके मुताबिक पिछले साल लॉकडाउन के बाद केवल 45 प्रतिशत महिला प्रवासी अपने शहरी कार्यस्थलों पर लौटी हैं- उनमें से 40 प्रतिशत ने एक सप्ताह में कोई कमाई नहीं की. उन्हें इस सर्वे के लिए फरवरी 2021 में ट्रैक किया गया था. इनमें से सिर्फ एक तिहाई मजदूरों की फरवरी के एक सप्ताह तक कोई इनकम नहीं थी.

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सर्वेक्षण से पता चलता है कि काम के लिए शहरी क्षेत्रों में लौटने वाले पुरुष प्रवासी श्रमिक अपनी पूर्व-महामारी की कमाई का 90 प्रतिशत तक कमाने में कामयाब रहे, लेकिन जिन महिलाओं ने ऐसा किया, उन्होंने महामारी से पहले अपनी आय का 72 प्रतिशत तक कमाया. सर्वेक्षण में पाया गया कि औसतन यह प्रति सप्ताह 2,355 रुपये या पूर्व-महामारी आय का 85 प्रतिशत है.
दूसरी ओर, सर्वेक्षण में पाया गया है कि घर पर रहने वाले पुरुष प्रवासी श्रमिकों ने अपनी पूर्व-महामारी आय का केवल 23 प्रतिशत और महिला प्रवासी श्रमिकों ने केवल 13 प्रतिशत कमाया. सर्वेक्षण में पाया गया कि यह औसतन 451 रुपये प्रति सप्ताह या पूर्व-महामारी की कमाई का 18 प्रतिशत है.


इसके अलावा, घर पर रहने 40 प्रतिशत से अधिक प्रवासी मजदूर फसल के मौसम के बाद भोजन की समस्या को लेकर चिंतिंत थे. सर्वे में 20 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों ने स्वीकार किया कि महामारी में तालाबंदी के कारण वो सामान्य से कम खा रहे थे. सर्वेक्षण ने दो स्रोत राज्यों के प्रवासियों को ट्रैक किया गया, जो भारत में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले हुए हैं.

कोरोना की दूसरी लहर में देशव्यापी लॉकडाउन की बड़ी आशंका के बीच इस सर्वे में शहरी क्षेत्रों में श्रमिकों को बनाए रखने और महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नीतिगत प्रयासों की अपील की गई है.



रिपोर्ट में कहा गया है, 'जो लोग ग्रामीण क्षेत्रों में घर पर बने हुए थे, उनके बेरोजगार होने, भोजन की खपत को कम करने, गिरवी रखने या संपत्ति बेचने, बचत खर्च करने और समाप्त होने के लिए ऋण लेने की क्षमता बढ़ाने की अधिक संभावना थी. यह संभव है कि जो लोग शहरी क्षेत्रों में लौट आए हैं, वे स्थानीय लॉकडाउन के माध्यम से शहरों में रहें. नियोक्ता राशन के माध्यम से और उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करके रोक कर रख सकते हैं.'

येल यूनिवर्सिटी के मैकमिलन सेंटर में साउथ एशिया इकोनॉमिक्स रिसर्च के निदेशक चैरिटी मूर और निदेशक ने कहा, 'मौजूदा कोरोना की लहर भारत के प्रवासी कामगारों के लिए एक अतिरिक्त संकट नहीं है, बल्कि ये संकट तो पिछले साल ही शुरू हो गया था और अब तक चल रहा है.'


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रिपोर्ट में कहा गया है कि हमें इन कामगारों को आर्थिक तौर पर सुरक्षित रखने की जरूरत है. ये शहरी क्षेत्रों में लॉकडाउन के बाद जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इनकी सबसे बड़ी समस्या खाने की है. इनकी खाद्य असुरक्षा की भावना को नियोक्ता आर्थिक सहायता और भोजन देकर कुछ हद तक कम कर सकते हैं.'
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