OPINION| कोरोना तोड़ पाएगा बिहार की राजनीति में जातिवाद का तिलिस्म! घर लौटे मजदूर ठान लें तो बदल जाएगी दिशा और दशा

OPINION| कोरोना तोड़ पाएगा बिहार की राजनीति में जातिवाद का तिलिस्म! घर लौटे मजदूर ठान लें तो बदल जाएगी दिशा और दशा
कोरोना से कितना बदलेगा बिहार में चुनावी मुद्दा.

लोकसभा चुनाव (Loksabha Elections) में बीजेपी ने बिहार (Bihar) की आधी सीटें जीती थी. इसके बाद से ही बिहार में बीजेपी को सत्ताधारी गठबंधन में बड़ा भाई बनाने की मांग भी तेज हुई थी, लेकिन पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने साफ-साफ कह दिया था विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा.

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कोरोना के बाद पहला चुनाव बिहार में होना है. बिहार में विधानसभा चुनाव कैसा होगा और किस तरह होगा. क्या ई-वोटिंग होगी! चुनाव की प्रक्रिया किस तरह की होगी. इन सभी सवालों पर तमाम मंचों पर चर्चाएं हो रही हैं. अभी तक की चर्चा में चुनाव आयोग ने ई-वोटिंग से साफ-साफ इंकार कर दिया है, हालांकि चुनाव प्रक्रिया को लेकर आयोग में तैयारियों का दौर जारी है. बिहार चुनाव से पहले मध्य प्रदेश विधानसभा की 24 सीटों के उपचुनाव में जो प्रक्रिया होगी उससे ये साफ हो जाएगा कि आगे क्या होगा. लेकिन बिहार चुनाव में सबसे ज्यादा जिस पर नजर होगी वो है, प्रमुख चुनावी मुद्दा. कोरोना संकटकाल में सबसे बड़ा मुद्दा तो मजदूरों का पलायन ही है. लेकिन सवाल ये है क्या बिहार की राजनीति में मजदूरों के पलायन का मुद्दा इस बार जातीय राजनीति का तिलिस्म तोड़ पाएगा!

कितना बदलेगा बिहार में चुनावी मुद्दा

बिहार विधानसभा चुनाव में मुद्दे क्या होगें, इस पर फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात जो साफ है वो है बिहार की राजनीति में जातिवाद. बिहार पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय से जातिवाद की राजनीति में उलझा हुआ है. लगातार कोशिश के बाद भी उससे बाहर नहीं आ पा रहा है. बिहार की राजनीति में लगातार कोशिश के बाद भी दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अभी तीसरे और चौथे नंबर की पार्टियां हैं.



विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी जहां तीसरे नंबर की पार्टी है, वही कांग्रेस चौथे नंबर पर है. दोनों राष्ट्रीय पार्टियां बिहार में अपने को मजबूत करने में लगी हैं. कांग्रेस के मुकाबले बिहार में बीजीपी काफी मजबूत स्थिति में है और अब वह राज्य में नंबर वन बनने की दौड़ में है.



लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य की आधी सीटें जीतकर इस बात के साफ संकेत भी दे दिए हैं. इसके बाद से ही बिहार में बीजेपी को सत्ताधारी गठबंधन में बड़ा भाई बनाने की मांग भी तेज हुई थी, लेकिन पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने साफ-साफ कह दिया था विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा. वही गठबंधन के मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी होगें. साफ है बिहार का चुनाव एनडीए और यूपीए के बीच ही लड़ा जाएगा. अब सवाल ये है कि क्या बिहार में चुनावी मद्दों पर जातीय राजनीति फिर हावी रहेगी.


तीन दशक से बिहार में सिर्फ 2 नेताओं का कब्जा
बिहार की राजनीति को करीब से देखें, तो पाएंगे कि पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय से राजनीति जेपी आंदोलने से उपजे तीन नेताओं के ईर्द-गिर्द ही रही है. ये नेता हैं लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान. इनमें से दो को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल चुकी है, जबकि तीसरे ने लगातार बिहार के दम पर दिल्ली में कैबिनट की बर्थ पर कब्जा जमा रखा है, लेकिन बिहार रोजगार के मामले में अभी भी वहीं है जहां तीन दशक पहले था.

देश में 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनने और मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के साथ ही एक नया वोट बैंक बना. यह वोट बैंक था ओबीसी का. बाद में हिंदी भाषी इलाकों में राजनीति अगड़े और पिछले वोटरों के दो ध्रुव में बंट गई. बिहार में तो 1990 के बाद अब तक कोई सामान्य वर्ग का नेता मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. 1990 से लेकर अब तक के 30 वर्षों में लालू और नीतीश दोनों को 15-15 साल की कुर्सी मिली. हालांकि इसमें लालू ने कुछ समय के लिए अपनी पत्नी राबड़ी देवी तो नीतीश ने अपने वफादार समझे जाने वाले जीतनराम मांझी को कुर्सी दी, लेकिन अब तक कोई तीसरा चेहरा इतना ताकतवर नहीं हुआ जो सीएम की कुर्सी पर जा सके.

लालू-नीतीश दोनो से मिला जातिवाद को संरक्षण
इन दोनों नेताओं मे पिछले तीन दशक में बिहार की राजनीति में जातिवाद के वटवृक्ष को और मजबूत ही किया है. लालू यादव ने जहां अपने माई-मुस्लिम-यादव समीकरण के बल पर पंद्रह साल तक राज किया, वहीं नीतिश अतिपिछड़ा और महादलित के बहाने कभी बीजेपी के साथ मिलकर, तो कभी आरजेडी के साथ मिलकर अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे हैं.

1990 से लेकर लगातार डेढ़ दशक तक बिहार की राजनीति पर अपना कब्जा जमाए रखने वाले लालू प्रसाद यादव जेल जाने के बाद भले ही कमजोर हो गए हों, लेकिन पिछली बार जहां उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर अपना आधिपत्य स्थापित रखा, वहीं इस बार वह अपने बेटे तेजस्वी के बहाने जेल से ही बिहार की राजनीति पर नियंत्रण रखने की कोशिश में लगे हैं.


2005 में लालू को पटखनी देकर सत्ता में आए नीतीश कुमार ने भी जातिवाद की राजनीति का दामन नहीं छोड़ा. नीतीश ने गैर-यादव ओबीसी और बीजेपी के सवर्ण वोटों के सहारे लालू को पटखनी दी और फिर उन्होंने खुद को और मजबूत करने के लिए अतिपिछड़ा और महादलित का मास्टरकार्ड खेला.

क्या रोजगार और स्वास्थ्य बन पाएंगे चुनावी मुद्दे
बिहार की राजनीति में जो सबसे परेशान करने वाली बात है वो है कि पिछले तीन दशक में बिहार में रोजगार पर बात करता हुआ कोई भी राजनीतिक दल नहीं दिखा.

जातिवाद से आगे बढ़ने के बाद बिहार की राजनीति कानून व्यवस्था पर खत्म हो जाती है, लेकिन उद्योग, रोजगार और स्वास्थ्य सेवा यहां कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाते. कोरोना के बाद पलायन का सबसे ज्यादा दर्द जिन राज्यों ने महसूस किया है, वो हैं उत्तर प्रदेश और बिहार. दोनों राज्यों में देश के अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे कामगार और मजदूर लाखों की संख्या में लौट रहे हैं.

बिहार लौटे लोग ही बदलेंगे बिहार की तस्वीर
कोराना संकट के दौर में मजदूरों के हालात किसी से छुपे नहीं हैं. साथ ही बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल है, इसको बताने की जरूरत नहीं है. ऐसे में जब कोरोना संकट के ठीक बाद या यूं कहें कि कोरोना संकट के बीच में ही जब बिहार में विधानसभा के चुनाव होंगे, तो बड़ा सवाल है कि क्या बिहार के मतदाता इस बार अपने जातिगत स्वार्थ को को छोड़कर बिहार के विकास के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं, औद्योगिक विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दे पर मतदान करेंगे.

वैसे भी इस दौर में जो सबसे बड़ा संकट उत्तर प्रदेश और बिहार में दिखा है वो रोजगार का है. रोजगार के संकट ने इन दोनों राज्यों के लोगों को देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने पर मजबूर कर दिया था और अब कोरोना संकट ने वापस लौटने पर मजबूर कर दिया है.


मजदूरों की वापसी को लेकर भी बिहार में खासी राजनीति हो रही है. बिहार में लाखों की संख्या में मजदूर देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंच रहे हैं. यहां तक कि लाखों मजदूर पैदल और अलग-अलग साधनों से बिहार पहुंचे हैं. सड़कों के हालात ऐसे हैं जिनकी कल्पना करना भी मुश्किल था. बिहार की जमीनी हकीकत बदली है, लेकिन इसका चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह तो फिलहाल कहना मुश्किल है, लेकिन एक बात तय है कि जो लोग लौटे हैं अगर वो अपनी पर आ जाएं, तो बिहार की राजनीति भी बदलेगी और बिहार का विकास भी होगा.

(लेखक News18 से जुड़े हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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First published: May 29, 2020, 1:32 PM IST
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