कोरोना वायरसः टेस्टिंग के लिए देश में हो रहा इन तरीकों का इस्तेमाल

WHO ने ये नामकरण किया है. (सांकेतिक फोटो)

WHO ने ये नामकरण किया है. (सांकेतिक फोटो)

Saline Gargle Solution Covid-19 Test: नेशनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित सलाइन गार्गल सोल्यूशन के जरिए सैंपल लेना ना केवल आसान हो जाता है, बल्कि इससे समय और लागत की भी बचत होती है.

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस के खिलाफ टेस्टिंग एक अहम हथियार है. देश में कोविड का पहला केस एक साल पहले आया था और उसके देश में टेस्टिंग की तकनीक और क्षमता दोनों में इजाफा हुआ है. कोरोना टेस्टिंग के नए अविष्कारों में आरटी-पीसीआर टेस्ट के लिए खारे घोल से गरारा (Saline Gargle Solution) करना है, जिसे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने मंजूरी दे दी है. सलाइन गार्गल सोल्यूशन होम टेस्ट किट में भी उपलब्ध है.

आरटी-पीसीआरः बढ़िया है, लेकिन महंगा

आरटी-पीसीआर टेस्ट को कोविड टेस्ट का गोल्ड स्टैंडर्ड कहा जाता है, क्योंकि इस टेस्ट के जरिए व्यक्ति के पॉजिटिव या निगेटिव पाए जाने का सटीक पता चलता है. आरटी-पीसीआर टेस्ट का विकास 1980 के आसपास हुआ था, कोरोना वायरस एक आरएनए वायरस है और ऐसे में संक्रमण का पता लगाने के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट एक बेंच मार्क की तरह है. जैसा कि नाम से ही जाहिर है आरटी का मतलब रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन से है, जिसमें आरएनए सैंपल को डीएनए में तब्दील किया जाता है. पीसीआर से तात्पर्य पॉलिमरेज चेन रिएक्शन है. इन दोनों को मिलाकर आरटी-पीसीआर टेस्ट में एक विशेष आरएनए का पता लगाया जाता है.

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इस टेस्ट में लैब टेक्निशियन एक एन्जाइम का प्रयोग करता है, जिसमें वायरस के आरएनए को डीएनए में तब्दील किया जाता है. इस तरह डीएनए का एक सिंगल मोलिक्यूल को करोड़ों की संख्या में प्राप्त किया जा सकता है. यही कारण है कि आरटी-पीसीआर टेस्ट की सटीकता काफी ज्यादा होता है, अगर व्यक्ति के मुंह या नाक के स्वैब से एक भी कण मिलता है, तो टेस्ट के जरिए संक्रमण का पता लगाया जा सकता है.

इस टेस्ट में प्राइमर का भी इस्तेमाल किया जाता है, जोकि डीएनए के टुकड़े होते हैं और केवल कोरोना वायरस के डीएनए से ही चिपकते हैं, कोरोना के इन डीएनए को रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन के जरिए हासिल किया जा सकता है. इस टेस्ट में फ्लूरोसेंट डाई का भी प्रयोग किया जाता है, जोकि पीसीआर मशीन में जांच के दौरान वायरस की मौजूदगी का पता लगाकर उसे चिन्हित करती है.

आरटी-पीसीआर टेस्ट में व्यक्ति के मुंह और नाक से स्वैब लिया जाता है और फिर आगे की कार्रवाई लैब में होती है. ऐसे में नेशनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित सलाइन गार्गल सोल्यूशन के जरिए सैंपल लेना ना केवल आसान हो जाता है, बल्कि इससे समय और लागत की भी बचत होती है.



महामारी की शुरुआत के दिनों में आरटी-पीसीआर टेस्ट के लिए 4,500 रुपये खर्च करने पड़ते थे, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने अब आरटी-पीसीआर टेस्ट की दर को निर्धारित कर दिया है.

रैपिड एंटीजन टेस्टः आसान, तत्काल और सस्ता

रैपिड एंटीजन टेस्ट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इससे तुरंत रिजल्ट पाया जा सकता है, हालांकि रिजल्ट की एक्यूरेसी पर बहस की जा सकती है. रैट टेस्ट में कोरोना का पता लगाने के लिए एंटीजन, वायरस के स्पाइक प्रोटीन को चिन्हित करता है. इसी स्पाइक प्रोटीन के जरिए कोरोना वायरस मानव शरीर में घर बनाता है. एंटीजन दरअसल एक बाहरी तत्व होता है, जो मानव शरीर में इम्यून रिएक्शन को उत्प्रेरित करता है, जो किसी भी संक्रमण के खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी पैदा करने लगता है.

रैपिड एंटीजन टेस्ट में व्यक्ति के नाक और मुंह से स्वैब का सैंपल लिया जाता है. फिर उसे एक सोल्यूशन में डाला जाता है, ताकि वायरस को डिएक्टिवेट किया जा सके. इसके बाद सोल्यूशन की कुछ बूंदे एक टेस्ट स्ट्रिप में डाली जाती है, जिसमें कोरोना वायरस की आर्टिफिशियल एंटीबॉडी होती हैं. अगर व्यक्ति का सैंपल पॉजिटिव है, तो स्ट्रिप में रंगीन लाइनें उभरकर आती हैं. इसमें 15 से 20 मिनट का समय लगता है.

रैपिड एंटीजन टेस्ट सैंपल के जेनेटिक मैटेरियल को बढ़ाता नहीं है. ऐसे में अगर स्वैब में पर्याप्त एंटीजन की मात्रा नहीं हैं, तो संक्रमण की स्थिति में भी रिजल्ट निगेटिव हो सकता है. इसे फॉल्स निगेटिव रिजल्ट कहा जाता है. हालांकि एंटीजन टेस्ट का इस्तेमाल बदस्तूर जारी है, क्योंकि अगर व्यक्ति में संक्रमण के लक्षण हैं, तो रिजल्ट सही आ सकता है. इससे समय और पैसे की भी बचत होती है. आरटी-पीसीआर के मुकाबले एंटीजन टेस्ट में काफी कम पैसा लगता है.

लेकिन स्वास्थ्य संगठनों और एजेंसियों का सुझाव है कि अगर व्यक्ति में संक्रमण के लक्षण हैं और एंटीजन टेस्ट निगेटिव है, तो इसकी पुष्टि के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट करवाना चाहिए.

TRUENAT (ट्रूनॉट): मेड इन इंडिया टेस्ट किट

ट्रूनॉट टेस्ट भी आरटी-पीसीआर टेस्ट की तरह है. इस टेस्ट का विकास टीबी की बीमारी का पता लगाने के लिए किया गया था. कोरोना महामारी के समय इस टेस्ट का इस्तेमाल सिर्फ स्क्रीनिंग के लिए किया गया. बाद में इस टेस्ट में थोड़ा बदलाव किया गया और एन्जाइम जोड़ा गया, जो कोरोना वायरस के आरएनए को चिन्हित करता है. ट्रूनॉट टेस्ट किट का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसमें चिप लगा है और यह बैटरी से चलता है. इस तरह इस टेस्ट किट का इस्तेमाल देश के दूर-दराज के इलाकों में भी हो सकता है, जहां आरटी-पीसीआर और एंटीजन टेस्ट उपलब्ध नहीं है.

ट्रूनॉट टेस्ट में व्यक्ति के नाक और मुंह से स्वैब का सैंपल लिया जाता है, लेकिन 30 मिनट के भीतर ही रिजल्ट मिल जाता है. आरटी-पीसीआर टेस्ट के मुकाबले यह सस्ता भी है. ट्रूनॉट टेस्ट को गोवा स्थित स्टार्ट अप कंपनी मोलबॉयो डॉयग्नोस्टिक्स ने विकसित किया है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ भारत में हो रहा है.

एंटीबॉडी टेस्टः कोरोना की चपेट में आए कि नहीं?

एंटीबॉडी टेस्ट को सीरोलॉजिकल टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है. इस टेस्ट में व्यक्ति के सक्रिय संक्रमण को टेस्ट नहीं किया जाता है, बल्कि ये बताया जाता है कि व्यक्ति कोरोना का शिकार हुआ था या नहीं. इस टेस्ट में व्यक्ति में संक्रमण का पता लगाने के लिए ब्लड सैंपल लिया जाता है. सैंपल के जरिए व्यक्ति के खून में दो एंटीबॉडी की पहचान की जाती है. पहला IgM एंटीबॉडीज, जोकि संक्रमण के शुरुआती दिनों में शरीर में पैदा होता है, दूसरा IgG एंटीबॉडीज, जोकि उस व्यक्ति में पाया जाता है, जो कोरोना संक्रमण से उबर चुका होता है.

इस टेस्ट में व्यक्ति के ब्लड सैंपल को कोरोना वायरस प्रोटीन से भरे एक कैट्रिज में डाला जाता है. अगर सैंपल में कोरोना संक्रमण की एंटीबॉडी मौजूद है तो यह कैट्रिज में वायरस की प्रोटीन के साथ जुड़ जाती है, जिसका मतलब है कि व्यक्ति का रिजल्ट पॉजिटिव है. भारत में एंटीबॉडी टेस्ट का खर्चा तकरीबन 1 हजार रुपये पड़ता है.

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