क्या है भारत के कोरोना टीकाकरण में शामिल वैक्सीन के पीछे का विज्ञान, कैसे शरीर में करता है काम

भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ जारी टीकाकरण अभियान में कोवैक्सीन, कोविशील्ड और स्पुतनिक वी का इस्तेमाल हो रहा है.

India Coronavirus Vaccine: कोरोना वायरस के खिलाफ भारत में जारी दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान में कोवैक्सीन, कोविशील्ड और स्पूतनिक वी टीके का इस्तामल किया जा रहा है.

  • Share this:

    नई दिल्ली. जायडस कैडिला जल्दी ही अपनी डीएनए-प्लाज़मिड तकनीक पर बनी कोविड-19 वैक्सीन की आपात इस्तेमाल की मंजूरी यानि इमरजेंसी यूज ऑथराइजेशन (ईयूए) के लिए ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया से अनुमति ले सकती है. अगर ये अनुमति मिल जाती है, तो ये दुनिया की पहली डीएनए-प्लाजमिड वैक्सीन होगी.


    इससे पहले कंपनी 12-18 उम्र समूह पर भारत की पहली बच्चों की वैक्सीन का ट्रायल शुरू कर चुकी है. विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों पर कोविड-19 का कोई गंभीर प्रभाव नहीं होता है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बच्चों के कोविड मामले में बढ़ोतरी देखने को मिली और कुछ बच्चों की मौत भी हुई. केवल कोरोना वायरस ही नहीं, पिछले दो महीनों में कुछ मामले बच्चों के ब्लैक फंगस के भी सामने आए.


    वैक्‍सीन कितनी कारगर? कोरोना पॉजिटिव होने के बाद अपोलो की MD का बड़ा बयान


    भारत के दूसरी लहर के चपेट में आने के बाद, विशेषज्ञों का अब मानना है कि भारत में वैक्सीन ही सबसे कारगर इलाज है. भारत में जनवरी में ही बड़े स्तर पर लोगों में टीका लगाने का कार्यक्रम शुरु हुआ था. तब से अब तक आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक महज़ 11 फीसद आबादी को ही एक डोज लग सका है. वहीं केवल 3.4 फीसद आबादी ऐसी है जिनके दोनों डोज़ का कोर्स पूरा हो पाया है. भारत का शहरी इलाका जो दूसरी लहर में भारत की स्वास्थ्य सुविधाओं से दो-चार हो चुका है. वो बगैर देर किए वैक्सीन ले रहा है, लेकिन ग्रामीण आबादी को वैक्सीन देना एक गंभीर चुनौती बन कर उभरा है.


    हालांकि कुछ अध्ययन, जिसमें लैब पर आधारित काम, असल दुनिया का आंकड़ों का आकलन शामिल है, वो बताते हैं कि वर्तमान में लगाई जा रही कोविड वैक्सीन जितनी अल्फा वैरियंट पर फायदा पहुंचाती है, उतनी डेल्टा वैरियंट पर कारगर नहीं है. द गार्डियन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों का ये भी दावा है कि वैक्सीन सुरक्षा प्रदान करती है और डेल्टा वैरियंट से बचने के लिए दूसरा डोज़ बेहद ज़रूरी है.


    डिकोडिंग लॉन्ग कोविडः एक्सपर्ट से समझें महिला स्वास्थ्य और पुरुषों की प्रजनन शक्ति पर कोविड का असर


    वैक्सीन किस विज्ञान पर काम करती है: जायडस- जायकोव-डी एक प्लाजमिड डीएनए वैक्सीन है जो न्यूक्लिक एसिड वैक्सीन के अंतर्गत आती है. इसे डीएनए वैक्सीन प्लेटफॉर्म पर तैयार किया जाता है. जिसमें नॉन-रेप्लिकेंटिंग प्लासमिड का इस्तेमाल होता है. जो ‘जीन ऑफ इंट्रेस्ट’ को ले जाता है. जीन ऑफ इंट्रेस्ट का मतलब होता है टारगेट जीन या ऐसा जीन जिसका अध्ययन किया जा रहा हो या प्रयोग के दौरान जिस जीन में हेरफेर की जाती है. यानि जो डीएनए सीक्वेंस शरीर के अंदर छोड़ी जा रही है वो वायरस के सीक्वेंस पैटर्न से मेल खाएगी. इस तरह से वो शरीर को वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने को प्रेरित करती है.


    नोवावैक्स: स्‍टडी में दावा लगभग 90% प्रभावी है COVID-19 वैक्‍सीन


    इस प्लेटफॉर्म से आसानी से वैक्सीन का निर्माण किया जा सकता है क्योंकि इसमें बहुत कम बायोसुरक्षा (बीएसएल-1) की ज़रूरत होती है, जबकि वायरस को कमज़ोर करके बनाई जाने वाली वैक्सीन में उच्च स्तर की बीएसएल-3 और बीएसएल-4 श्रेणी की बायोसुरक्षा की ज़रूरत होती है. इसके संग्रहित करने के लिए कम ठंडक की भी ज़रूरत होती है जिससे इसे आसानी से लाया ले जाया जा सकता है.


    कोवैक्सीन- निष्क्रिय कोरोना वायरस वैक्सीन यानि कोवैक्सीन का निर्माण भारत बायोटेक ने राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के साथ मिलकर किया है. इसके ट्रायल में पता चला था कि ये वैक्सीन 78 फीसद प्रभावशाली है. इसमें पैथोजन (वायरस या बैक्टीरिया) जिनका गुणन नहीं हो सकता है यानि जो बढ़ नहीं सकते हैं उन्हें बांह में इन्जेक्शन के ज़रिए शरीर में डाला जाता है. इसमें फॉर्मेलिन जैसे केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, वैक्सीन शरीर में जाकर इम्यून सिस्टम को सार्स कोव वी -2 के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए प्रेरित करती है. इस निष्क्रिय वायरस को बहुत कम मात्रा में एल्यूमीनियम पर आधारित एक सहायक के साथ मिलाया जाता है. ये इम्यून सिस्टम को जगा देता है और वैक्सीन के असर को बढ़ा देता है.


    कोविशील्ड- यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड ने ब्रिटिश-स्वीडिश कंपनी एस्ट्राजेनका के साथ मिलकर ये वैक्सीन विकसित की जो वायरल वैक्टर प्लेटफॉर्म पर तैयार होती है. भारत में सीरम इन्स्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोविशील्ड के नाम से इस वैक्सीन को तैयार कर रहा है. वायरल वेक्टर पर आधारित वैक्सीन में दरअसल एंटीजन नहीं होता है, लेकिन इसके निर्माण के लिए उसकी कोशिकाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इसका इस्तेमाल संशोधित वायरस (वैक्टर) बनाने में होता है जो एंटीजन के लिए जेनेटिक कोड को ले जाने वाले वाहक का काम कर सके. कोविड-19 के मामले में वायरस का स्पाइक प्रोटीन (इसको आप ऐसे समझें, कोरोना की आभासी तस्वीर में दिखने वाली कांटे नुमा आकृति, जो वायरस का स्पाइक प्रोटीन है) जो वायरस की सतह पर पाया जाता है, उसे मानव कोशिकाओं में भेजा जाता है.


    कोरोना वायरस स्पाइक प्रोटीन जीन में दो तरह के एडीनोवायरस को जोड़ा गया है. जिसमें एक को एडी26 और दूसरे को एडी5 कहा जाता है. ये कोशिकाओं पर हमला तो बोल सकते हैं, लेकिन खुद को बढ़ा नहीं सकते हैं. एक बार संक्रमित होने के बाद कोशिका बड़ी मात्रा में एंटीजन तैयार करती है और वायरस के खिलाफ इम्यून की प्रक्रिया को उत्तेजित कर देता है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनका वैक्सीन में चिंपाजी में पाए जाने वाले एडिनोवायरस का इस्तेमाल किया गया है क्योंकि मानव शरीर में इस एडिनोवायरस से जुड़ी एंटीबॉडीज नहीं होंगी.




    स्पूतनिक V- रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय के गामालेया शोध संस्थान ने 'नॉन रेप्लिकेटिंग वायरल वेक्टर' यानि ऐसा वायरस जो शरीर में जाकर दोगुने ना हो, उनसे कोरोना वायरस वैक्सीन स्पूतनिक V तैयार की है. इसके दो डोज के असर की दर 91.6 फीसद थी. स्पूतनिक V में दो तरह के एडीनोवायरस को जोड़ा गया है जिसमें एक को एडी26 और दूसरे को एडी5 है. ये एडिनोवायरस कोशिका से टकराकर खुद को उसकी सतह पर प्रोटीन से चिपका लेता है. जब इसे शरीर में डाला जाता है, तो वैक्सीन वायरस हमारे शरीर को संक्रमित करना शुरू करता है और हमारे अंदर उनका जेनेटिक मैटेरियल जिसमें एंटीजन जीन भी शामिल होता है, उसे डालना शुरू करता है. इस तरह से मानव कोशिका एंटीजन का निर्माण शुरू कर देती है, जैसे वो कभी उसके ही प्रोटीन का हिस्सा रहा हो.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.