Coronavirus: भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों है अगस्त और सितंबर?

Coronavirus: भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों है अगस्त और सितंबर?
जुलाई से सितंबर के दौरान भारत में संक्रमण के मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं (फाइल फोटो)

भारत में कोरोना वायरस (Coronavirus India) के चलते रोज दर्ज किये जाने वाले मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. दूसरी ओर बुखार की वजह से होने वाले इंफेक्शन का मतलब है कि लोग अस्पताल की ओर रुख करेंगे भले ही वह बीमार ना हों.

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नई दिल्ली. भारत में कोरोना वायरस (Coronavirus) के मामले 16 लाख के पार हो गए हैं. वहीं, 10 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं. कोरोना से रिकवरी दर एक उम्मीद जगा रही है, लेकिन आशंका इस बात की भी है कि मॉनसून और ठंड में संक्रमण के मामले बढ़ सकते हैं. NSO द्वारा साल 2017-18 के लिए जारी किये गये डेटा के अनुसार जुलाई से सितंबर के दौरान भारत में संक्रमण के मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं. 10 में से 9 लोग जो संक्रमित होते हैं उनमें बुखार की शिकायत भी होती है. मौजूदा महामारी के परिप्रेक्ष्य में NSO के आंकड़ों को देखें तो यह खतरे की घंटी है. अगस्त और सितंबर का आना अभी भी बाकी है.

भारत में रोज दर्ज किये जाने वाले मामले और पॉजिटिविटी रेट में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. दूसरी ओर बुखार की वजह से होने वाले इंफेक्शन का मतलब है कि लोग अस्पताल की ओर रुख करेंगे भले ही वह बीमार ना हों. कोविड के लिए अलग-अलग टेस्टिंग्स के स्वरूपों के नफा-नुकसान हैं.

जून और सितंबर तिमाही के बीच  संक्रमण  1.5 गुना ज्यादा
आरटी-पीसीआर टेस्ट कोविड के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन उनका रिजल्ट देर से आता है. एंटीजन टेस्टिंग में रिजल्ट जल्दी मिलता है, लेकिन उनमें फॉल्स निगेटिव की आशंका अधिक है. ऐसे समय में जब संदिग्ध मामलों में वृद्धि होने की आशंका है, क्या भारत को एंटीजन परीक्षणों पर आरटी-पीसीआर को प्राथमिकता देनी चाहिए? पश्चिमी देशों के अनुभव को देखें तो यह जरूरी नहीं लगता है.
एनएसओ की रिपोर्ट के अनुसार जून और सितंबर तिमाही के बीच संक्रमण  1.5 गुना बढ़ जाता है. जून और सितंबर के बीच  1.6% से 3.6%  तक लोग संक्रमित होते हैं. लगभग 2 प्रतिशत अंतर का मतलब लगभग 1.3 अरब लोगों के देश में लगभग 2.5 करोड़ लोगों का अंतर है. मानसून के बाद अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भी लोगों संक्रमित हुए. संक्रमण के अलावा अन्य बीमारियों के लिए रिपोर्ट करने वाले लोगों की हिस्सेदारी बराबर थी और यह पैटर्न देश के शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेश में है.



अस्पतालों पर बढ़ सकता है बोझ
हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में (जब सर्वेक्षण किया गया था), 61% लोगों ने संक्रमण के इलाज के लिए गए. इसमें से लगभग 24% सरकारी अस्पताल में गए. चूंकि अधिकांश संक्रमण रोगियों में बुखार जैसे कोविड -19 लक्षण दिखाई देने के आसार हैं. इसका मतलब है कि अस्पतालों और क्लीनिक्स में संदिग्ध मामलों में वृद्धि  हो सकती है.

हालांकि कई राज्य ऐसे हैं जहां गंभीर बीमारियों को छोड़ दें तो संक्रमण के मामलों में लोग डॉक्टर के पास नहीं जाते. 15 प्रतिशत संक्रमित रोगियों ने कोई इलाज नहीं कराया. जो इलाज के लिए नहीं गए उनमें से 79% ने बीमारी को गंभीर नहीं माना.  इसी तरह, बिहार के 31% रोगियों ने बीमारी को गंभीर नहीं माना, वहीं तमिलनाडु में यह आंकड़ा 3% है. मसलन बिहार में संक्रमण से जूझ रहे 43 फीसदी लोग इलाज नहीं कराते.

तमिलनाडु में यह आंकड़ा 3.2 फीसदी है. यह दीगर है कि महामारी  में लोग ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग और इलाज चाह रहे हैं. एक और संभावना यह है कि लॉकडाउन और लोगों की आवाजाही से जुड़े एहतियाती  प्रतिबंधों के चलते  इस मॉनसून में संक्रमण कम हो सकता है.
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