डिजिटल प्राइम टाइम: हिंसा- प्रदर्शन से बेपटरी होती देश की अर्थव्यवस्था

डिजिटल प्राइम टाइम: हिंसा- प्रदर्शन से बेपटरी होती देश की अर्थव्यवस्था
दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन के बाद बस को क्षतिग्रस्त कर दिया गया.

दुनियाभर में हजारों सालों से विरोध होता आया है. लेकिन हाल के सालों में विरोध-प्रदर्शन हिंसक होते जा रहे हैं. इस हिंसा ने सिर्फ जान-माल का जबकि GDP का भी बड़ा नुकसान होता है. पेश है एक रिपोर्ट...

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 16, 2019, 9:02 PM IST
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नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Act)  के खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहा है. लेकिन इस विरोध प्रदर्शन का सबसे ज्यादा नुकसान सरकारी संपत्तियों को हो रहा है. देश भर से जो खबरें आ रही हैं उसमें साफ है कि चाहे वह गुवाहाटी (Guwahati) हो, दिल्ली (Delhi) हो या उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh), हर जगह आंदोलनकारी सरकारी संपत्तियों को निशाना बना रहे हैं और उनको नुकसान पहुंचा रहे हैं. प्रदर्शन के दौरान सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और आंदोलन के हिंसात्मक होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ रहा है.

देश में जहां निवेश करने वाले निवेशक ऐसे महौल में घबराते हैं वहीं जहां-जहां हिंसा होती है उसके आसपास के इलाकों में हर तरह का व्यापार बंद हो जाता है. आम जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है. ऐसा नहीं है कि आंदोलन के दौरान सिर्फ सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है बल्कि सरकारी सम्पत्तियों के साथ-साथ आम लोगों की संपत्तियां जैसे पार्किंग में खड़ी गाड़ियां, सड़क पर जा रही बसें और आसपास के घर भी हिंसा के दौरान आगजनी के शिकार हो रहे हैं.

प्रदर्शनकारी भले ही ये कहते हो कि सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं लेकिन सच है कि हिंसा के दौरान सरकार के साथ-साथ आम लोगों की संपत्तियों का बड़ा नुकसान होता है. चाहे इस तरह का प्रदर्शन जम्मू कश्मीर में हो, या हरियाणा में जाट आंदोलन हुआ हो या आरक्षण के विरोध में और समर्थन में आंदोलन हुआ हो. इस हिंसा से देश की अर्थव्यवस्था पटरी से नीचे उतर रही है.




हिंसा से नुकसान के आंकड़े आश्चर्यजनक



हिंसा के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर कितना बुरा परिणाम है, इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं. भारत में विरोध प्रदर्शन के नाम पर होने वाली हिंसा, आगजनी और झड़प देश की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचा रही है इसका आंकड़ा ऑस्ट्रेलियाई संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पीस आईआईपी ने अपनी रिपोर्ट में किया है. आईआईपी की रिपोर्ट की मानें तो भारत में 2017 में हिंसा और हिंसा के कारण बंद हुए व्यापार और हिंसा को कंट्रोल करने में करीब 80 लाख करोड़ रुपए खर्च हुए. ये 80 लाख करोड़ रुपए भारत की जीडीपी के करीब 9 फीसदी है. आईआईपी ने ये आकड़ा भारतीयों की खरीदारी के आधार पर तय किया है, अगर इस आंकड़े को भारत के प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो एक व्यक्ति का करीब ₹40 हजार रुपया हिंसा की भेट चढ़ गया.



कुछ इसी तरह का नुकसान 2015-16 में जाट आंदोलन के दौरान देखने को मिला उद्योग मंडल एसोचैम का दावा है कि जाट आंदोलन के दौरान केवल हरियाणा राज्य को करीब ₹20000 करोड़ का नुकसान हुआ. अगर आसपास के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली के व्यापार घाटे को जोड़ें तो आंकड़ा बहुत आगे जाएगा. जाट आंदोलन के दौरान 7 रेलवे स्टेशन बर्बाद कर दिए गए, करीब 800 ट्रेनें महीनों रद्द रही और करीब एक हजार से ज्यादा प्राइवेट और सरकारी वाहनों को जला दिया गया. साथ ही इस हिंसा में करीब 500 से ज्यादा दुकानें जला दी गई, ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं हिंसा किस तरह से देश की अर्थव्यवस्था को हर साल बर्बाद कर रही है.


पूरी दुनिया पर हिंसा का असर
आंदोलन के दौरान हिंसा के नुकसान के आकड़े भारत ही नहीं पूरी दुनिया भर में चौंकाने वाले हैं, हिंसा से अगर नुकसान की बात करें तो एक दुनिया की जीडीपी का 12.4 फीसदी हिस्सा जो 2017 में प्रति व्यक्ति के आधार पर 198 करोड़ डॉलर होता है हिंसा की भेट चढ़ जाता है. आईआईपी ने अपने इस आकलन में हिंसा पर पड़े प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभाव समेत अन्य आर्थिक कार्य और उनके प्रभाव को भी शामिल किया गया. 2017 के आकड़ों में भारत हिंसा के कारण नुकसान झेलने वालों 163 देशों में 59वें स्थान पर था. हिंसा के कारण दुनिया में सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान झेलने वालों देशों में सीरिया नंबर 1 पर है. सीरिया के जीडीपी का करीब 68 फ़ीसदी हिस्सा हिंसा के कारण बर्बाद हो जाता है. इसके बाद 63 परसेंट के साथ अफगानिस्तान नंबर दो और 51 फ़ीसदी के साथ इराक नंबर 3 पर है. हिंसा के कारण सबसे कम नुकसान जिस देश को हुआ है वो देश है स्विटजरलैंड.

क्यों नहीं रुक पा रही है ऐसी हिंसा?
हिंसा के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में हर राज्य में अलग-अलग कानून है. उत्तर प्रदेश सरकार भी आंदोलन के दौरान हिंसा कर रहे हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए सख्त कानून बना रही है, जबकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश इस तरह के आंदोलन में होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए कानून है. ऐसा ही कानून पश्चिंम बंगाल में भी है. बात करें देश के अलग-अलग राज्यों की तो देश के करीब करीब दो तिहाई राज्य ऐसा कानून बना चुके हैं जिसमें आंदोलन के दौरान हिंसा होने पर जो सरकारी संपत्ति का या निजी संपत्ति का नुकसान हो उसकी भरपाई आंदोलन करने वालों से की जाए. लेकिन आंदोलन में हिंसा करने वालों की भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि उनकी पहचान करना और उनसे वसूलना बहुत मुश्किल होता है. दरअसल किसी भी आंदोलन के दौरान हिंसा करने वाले लोग की आर्थिक हैसियत इतनी ज्यादा नहीं होती है कि उनसे होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके. कानून प्रभावी होता नहीं दिख रहा है. साफ है देश में हिंसा रोकने के लिए सरकार कानूनों के साथ-साथ सामाजिक जागरुकता बढ़ाने की भी जरूरत है.
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