मध्‍य प्रदेश में मिला ग्रीन फंगस का पहला केस, लक्षण और इंफेक्शन को कैसे रोके, जानें सबकुछ

ग्रीन फंगस क्या है, इसके लक्षण और इंफेक्शन. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

COVID-19 Green Fungus: जिन लोगों में कोविड पाया गया है या जो लोग ठीक हो चुके हैं उनमें एसपरजिलस चिंता का विषय इसलिए बन सकता है क्योंकि बीमारी के चलते उनके फेफड़े पहले से ही कमज़ोर हो चुके होते हैं.

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    ग्रीन फंगस संक्रमण का पहला मामला जो कोविड-19 से जुड़ा है, मध्य प्रदेश में सामने आया है. यहां संक्रमण से ठीक होने वाले एक मरीज में इसके लक्षण देखे गए हैं. ये रिपोर्ट तब आई है जब पहले ही कोविड-19 के मरीजों के बीच ब्लैक फंगस यानी म्यूकरमायकोसिस का डर बना हुआ है. आईए समझते हैं क्यो होता है ग्रीन फंगस और कैसे इस बीमारी से बचा जा सकता है.

    क्या होता है ग्रीन फंगस
    ये एक तरह का संक्रमण है जो एसपरजिलस यानी एक आम तरह के फंगस से होता है, ये फंगस घरों के अंदर और बाहर दोनों जगह पाया जाता है. इससे होने वाली बीमारी को एसपरजिलोसिस कहते हैं. यूएस के डिजीज वाचडॉग सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन (सीडीसी) के मुताबिक ज्यादातर लोग रोज़ाना ही सांसो के जरिए एसपरजिलस के स्पोर को अंदर लेते हैं और बीमार नहीं पड़ते हैं. स्पोर एक तरह का एककोशीय प्रजनन कोशिका होती है जो बैक्टीरिया, फंगस, एल्गी और पौधे किसी के भी ज़रिये पैदा हो सकता है.

    जिन लोगों में कोविड पाया गया है या जो लोग ठीक हो चुके हैं उनमें एसपरजिलस चिंता का विषय इसलिए बन सकता है क्योंकि बीमारी के चलते उनके फेफड़े पहले से ही कमज़ोर हो चुके होते हैं. सीडीसी के मुताबिक कमजोर इम्यून सिस्टम और फेफड़ों से जुड़ी बीमारी वालों में एसपरजिलस की वजह से होने वाली बीमारी का ज्यादा खतरा रहता है. जिससें उन्हें एलर्जिक रियेक्शन, फेफड़ों में इन्फेक्शन, और दूसरे अंगो में इन्फेक्शन हो सकता है.
    ग्रीन फंगस कई रूपों में हमला कर सकता है जिसमें लंग्स में इन्फ्लामेशन, एलर्जी के लक्षण, जैसे बलगम बनना, सांस में दिक्कत हो सकती है, और जब ये बढ़ता है तो साइनस में इन्फ्लामेशन, साइनस में संक्रमण के लक्षण जैसे दम घुटना, सरदर्द हो सकता है.

    क्या इससे कोई गंभीर बीमारी हो सकती है
    हालांकि कुछ एलर्जिक ग्रीन फंगस से संक्रमण का खतरा नहीं हो सकता है, सीडीसी का कहना है कि लेकिन इसकी वजह से कुछ मामलों में क्रोनिक पल्मोनरी एसपरजिलोसिस हो सकता है जिससे फेफड़ों में छेद हो जाता है और इसे ठीक होने में 3 महीने या ज्यादा वक्त लग जाता है.

    इसी तरह घातक एसपरजिलोसिस गंभीर संक्रमण का कारण भी हो सकता है जिससे, ऐसे लोग जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है, ऐसे लोग जिनका अंग या स्टेम सेलप्रत्यारोपण हुआ है उन्हें तकलीफ का सामना करना पड़ सकता है. एसपरजिलोसिस आमतौर पर फेफड़ों पर असर डालता है लेकिन ये दूसरे अंगो में भी फैल सकता है.

    इसके अलावा त्वचा से जुड़ा एसपरजिलोसिस भी है जो कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में होता है, जब ग्रीन फंगस उनकी कटी फटी त्वचा के ज़रिये शरीर में प्रवेश कर जाता है. ऐसे कुछ मामले देखने को मिले हैं जब ग्रीन फंगस त्वचा से शरीर के दूसरे अंग जैसे फेफड़ों में पहुंच गया हो.

    लक्षण क्या होते हैं?
    अलग अलग तरह के संक्रमणों में ग्रीन फंगस से अलग तरह के लक्षण उभरते हैं. मसलन जब ग्रीन फंगस फेफड़ों में एलर्जी को बढ़ाता है तो इससे ठीक वैसे ही लक्षण सामने आते हैं जैसे अस्थमा में होते हैं यानी सांस लेने में तकलीफ, घुटन होना, ठीक से सांस नहीं ले पाना, बलगम आना, कुछ मामलों में बुखार भी आता है. जब साइनस में एलर्जी होती है तो घुटन, नाक बहना, सरदर्द और कोविड-19 जैसे लक्षण यानी गंध का पता नहीं चलना जैसे लक्षण उभरते हैं. क्रोनिक पल्मोनरी एसपरजिलोसिस जो फेफड़ों पर असर डालता है उसकी वजह से वजन घटना, बलगम आना, बलगम में खून आने, थकावट और सांस में तकलीफ की शिकायत हो सकती है.

    सीडीसी के मुताबिक एसपरजिलोसिस आमतौर पर उन्ही पर हमला करता है जो पहले से ही किसी बीमारी से जूझ रहे हैं. दूसरे लक्षण तब उभरते हैं जब संक्रमण फेफड़ों से शरीर के दूसरे अंगो में फैल जाए.

    किसको है खतरा
    जैसा पहले भी हमने बताया कि ग्रीन फंगस आमतौर पर वातावरण में पाया जाता है औऱ खराब पत्तों, कंपोस्ट, पौधों, पेड़ों, फसल में हो सकता है. यूएसकी मेयो क्लीनिक के मुताबिक, रोज़मर्रा में एसपरजिलस से कोई खतरा नहीं होता है खासकर उन्हें जिनका इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. जब इसके स्पोर सांस के ज़रिये अंदर जाते हैं तो हमारा इम्यून सिस्टम इसे घेर कर मार देता है.

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    लेकिन ग्रीन फंगस से जुड़े अलग अलग तरह के संक्रमण आमतौर पर ऐसे लोगों में देखे जा सकते हैं जिन्हें सिस्टिक फाइब्रोसिस या अस्थमा या फेफड़ों की बीमारी जैसे टीबी हो.

    क्रोनिक पल्मोनरी एसपरजिलोसिस जो इसे नाम दिया गया है वो उन पर असर डालता है जिनको फेफड़ों की बीमारी हो, जैसे ट्यूबरकुलोसिस, क्रोनिक ऑबस्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), ऐसे लोग जिनका अंग प्रत्यारोपण हुआ है, या कैंसर के चलते जिनकी कीमोथेरेपी चल रही हो, जो कोर्टिकोस्टेरॉयड के हाइडोज ( जैसे कोविड के मरीजों को दिया जाता है) पर हों. उन्हें इस बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. हालांकि एसपरजिलोसिस लोगों के बीच में या लोगों से जानवरों में नहीं फैलता है.

    इसकी पहचान कैसे हो
    डॉक्टर फेफड़ें या शरीर के दूसरे हिस्से में ग्रीन फंगस के बारे में पता करने के लिए एक्स-रे और सीटी स्केन के बारे में बोल सकते हैं. ऐसे लोग जिनमें ग्रीन फंगस के संक्रमण का संशय हो उनकी श्वास नली से द्रव लिया जा सकता है. कुछ मामलों में टिश्यू बायोप्सी, भी की जा सकती है. जिनका इम्यूस सिस्टम कमजोर होता है उनका खून का सैंपल भी लिया जाता है.

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