'99.5 प्रतिशत कारगर है RT-PCR टेस्ट, स्वैब कलेक्शन में हो सकती है गड़बड़ी'

RT-PCR रिपोर्ट्स को लेकर हाल के दिनों में सवाल उठे हैं. (तस्वीर-AP)

RT-PCR रिपोर्ट्स को लेकर हाल के दिनों में सवाल उठे हैं. (तस्वीर-AP)

डायग्नोस्टिक लैब चेन थायरोकेयर के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर ए. वेलुमनी (A. Velumani) का कहना है कि RT-PCR टेस्ट के नतीजे 99.5 फीसदी तक सही साबित होते हैं. उनका कहना है कि इस टेस्ट तकनीक बेहद मजबूत लेकिन स्वैब कलेक्शन की प्रक्रिया गड़बड़ हो सकती है.

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  • Last Updated: April 30, 2021, 5:57 AM IST
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नई दिल्ली. कोरोना महामारी की दूसरी लहर (2nd Wave Of Covid-19) के दौरान लोगों के सामने एक मुसीबत यह भी आ गई है कि अक्सर RT-PCR टेस्ट के नतीजे भी गलत आ रहे हैं. बीते साल कोरोना महामारी फैलने के बाद अब तक संक्रमण की जांच का सबसे भरोसेमंद तरीका RT-PCR टेस्ट को ही माना जाता रहा है. एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि RT-PCR टेस्ट के नतीजे 20 फीसदी तक गलत साबित हो रहे हैं. लेकिन डायग्नोस्टिक लैब चेन थायरोकेयर के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर ए. वेलुमनी (A. Velumani) का कहना है कि RT-PCR टेस्ट के नतीजे 99.5 फीसदी तक सही साबित होते हैं.

इंडिया स्पेंड को दिए एक इंटरव्यू में वेलूमनी ने कहा है कि RT-PCR पूरी तरह भरोसेमंद हैं. केवल 0.5 प्रतिशत एरर यानी गलती की गुंजाइश होती है और किसी भी लैब टेस्ट के साथ हो सकता है. RT-PCR की गलत रिपोर्ट्स पर उनका कहना है कि इस टेस्ट की तकनीक बेहद मजबूत है लेकिन स्वैब कलेक्शन की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो सकती है. अगर स्वैब कलेक्शन गड़बड़ होगा तो नतीजे भी गलत आ सकते हैं.

भारत में इस्तेमाल की जा रही है अच्छी क्वालिटी की टेस्टिंग किट

इंटरव्यू के दौरान वेलूमनी ने भारत में इस्तेमाल की जा रही टेस्टिंग किट पर भी अपनी राय दी है. उन्होंने कहा है कि महामारी आने के करीब दो महीने बाद से भारत में ज्यादा लैब द्वारा थ्री जीन टेस्टिंग किट का इस्तेमाल किया जा रहा है कि गुणवत्ता के मामले में बेहतर है. ऐसे में गलत नतीजे आने का रिस्क बेहद कम होता है.
पहले भी एक्सपर्ट्स कर चुके हैं खारिज

बता दें इससे पहले एपिडिमियोलॉजिस्ट और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अधिकारी रहे डॉ. रमन गंगाखेडेकर भी मीडिया मीडिया को खारिज कर चुके हैं. गंगाखेडेकर ने कहा था, 'अब तक दुनिया में कहीं भी ऐसा कोई डेटा या अध्ययन नहीं है, जिसमें RT-PCR टेस्ट को भी चकमा देकर कोई वैरिएंट जांच में पकड़ा ना गया हो. लेकिन इसके पर्याप्त सबूत हैं कि गलत स्वैबिंग और सैंपल कलेक्शन टेस्टिंग को प्रभावित कर सकता है.' अशोक विश्वविद्यालय में बायोसाइंसेज के स्कूल के हेड और वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील भी इस बात से सहमत हुए. उन्होंने कहा था कि बहुत से लोग जिन्हें स्वैब कलेक्शन के लिए भेजा जाता है, वे ट्रेन्ड नहीं होते हैं. और यही मेरी चिंता है. यहां चीजें गलत हो जाती हैं.'
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