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Coronavirus: पैदल यात्रा, पंडित की मदद, मस्जिद से ऐलान- पहाड़ी राज्यों में ऐसे चला टीकाकरण

देश में अब तक 18 साल से अधिक उम्र के 51 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्‍सीन की एक डोज दी जा चुकी है.(Pic- AP)

देश में अब तक 18 साल से अधिक उम्र के 51 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्‍सीन की एक डोज दी जा चुकी है.(Pic- AP)

Covid-19 Vaccination: मेघालय में अधिकारियों को ना सिर्फ मानसून के चलते बंद इलाकों तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा बल्कि स्थानीय भाषा की चुनौतियां भी झेलनी पड़ीं.

  • News18Hindi
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    हिमानी चंदना
    नई दिल्ली.
    कोरोना वायरस (Coronavirus) महामारी के खिलाफ जंग में टीकाकरण अभियान (Coronavirus Vaccination) को हर घर हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए पहाड़ी राज्यों ने कोई कसर उठा नहीं रखी है. चाहे वह मलाणा गांव के देवताओं को मनाना हो या लाहौल-स्पीति के बौद्ध भिक्षुकों को या फिर हरिद्वार के पंडितों को. यही नहीं पहाड़ी क्षेत्र के राज्यों ने टीकाकरण अभियान को पूरा करने के लिए दुर्गम इलाकों में हेलिकॉप्टर, नाव और रोपवे का भी इस्तेमाल किया ताकि वैक्सीन और स्वास्थ्यकर्मियों को एक से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सके.

    हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लेह-लद्दाख, जम्मू-कश्मीर के साथ मेघालय के दुर्गम इलाकों, मुश्किल मौसमी परिस्थितियां और वैक्सीन के प्रति लोगों के पूर्वाग्रह स्वास्थ्य कर्मियों के लिए मुख्य चुनौती के रूप में सामने आए. इन राज्यों में स्वास्थ्य कर्मियों को टीकाकरण के लिए मीलो पैदल चलना पड़ा तो कभी नाव का सहारा लेना पड़ा. वहीं स्थितियां ऐसी भी रहीं कि वन्य जीव अभ्यारण के बीच ही लोगों का टीकाकरण करना पड़ा.

    इंटरनेट नहीं मिला, तो रजिस्टर का सहारा
    पहाड़ी राज्यों में स्वास्थ्य कर्मियों के लिए एक चुनौती इंटरनेट और डाटा की भी रही. लिहाजा उन्होंने टीकाकरण करवाने वाले लोगों से जुड़ी जानकारी पहले अपने हाथों से एक रजिस्टर में दर्ज किया और फिर नेटवर्क वाले एरिया में आने के बाद कोविन पोर्टल पर अपलोड किया. जैसे कि हिमाचल प्रदेश में – यह देश का पहला राज्य है, जिसने अपने सभी निवासियों (वैक्सीन लगवाने के लिए आयु सीमा के मानक को पूरा करने वाले) को वैक्सीन की पहली डोज लगा दी है. यहां के बलोथ गांव में स्वास्थ्य कर्मियों को टीकाकरण कैंप तक पहुंचने के लिए 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा और इसमें लगभग 4 से 5 घंटे का समय लगा.

    इस तरह टीकाकरण कर्मियों को भूटान पोमैल गांव पहुंचने के लिए सड़क संपर्क के अभाव में नाव का सहारा लेना पड़ा. वहीं हिल्लोत्वान गांव (यह एक वन्य जीव अभ्यारण है) में बिस्तर पर पड़े मरीज के टीकाकरण के लिए स्वास्थ्य कर्मियों ने एक टीम का गठन किया, जहां तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है. हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव अमिताभ अवस्थी ने न्यूज18 से कहा, ‘हमने पहले लोगों के मन में वैक्सीन को लेकर व्याप्त पूर्वाग्रह को दूर करने की रणनीति अपनाई. इसके बाद शारीरिक श्रम पर फोकस किया, जिसके अच्छे नतीजे मिले.’

    दलाई लामा का टीकाकरण
    उन्होंने कहा कि हमने वैक्सीन से जुड़े पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए लाहौल स्पीति के गोम्पा और अन्य जिलों के ट्राइबल नेताओं की मदद ली. उन्होंने बताया कि धर्मशाला में धार्मिक नेता दलाई लामा को वैक्सीन का टीका लगाए जाने का उदाहरण दिया. अवस्थी ने कहा कि दलाई लामा को टीका लगाने से जिले के बहुत सारे लोगों में वैक्सीन को लेकर पूर्वाग्रह दूर करने में मदद मिली. उन्होंने कहा कि इसी तरह मलाणा गांव के देवता (उनके प्रतिनिधियों के जरिए) को मनाने में कई हफ्तों का समय लगा, लेकिन हमने इसमें भी सफलता हासिल कर ली.

    उन्होंने कहा, ‘एक बार जब लोग वैक्सीन लगवाने के लिए तैयार हो गए तो हमारा विचार हर इलाके में वैक्सीन की सप्लाई सुनिश्चित करना था. टीम ने पैदल रास्ते तय किए, रोपवे का सहारा लिया, वहीं वैक्सीन को हेलिकॉप्टर के जरिए भी पहुंचाया गया, यह एक एडवेंचर की तरह था, लेकिन प्रयास सफल रहा.’ उत्तराखंड के अधिकारियों ने भी इस तरह की कहानी सुनाई है. राज्य में 87 फीसदी लोगों को कोरोना वैक्सीन की पहली डोज दे दी गई है. राज्य के कुछ इलाकों में जहां सड़कों की स्थिति अच्छी नहीं है, वरिष्ठ नागरिकों को लकड़ी की कुर्सियों पर उठाकर टीकाकरण कैंप तक लाया गया. ये काम स्थानीय युवाओं ने अंजाम दिया.

    दिल जीत ले गया उत्तराखंड के बुजुर्गों का उत्साह
    नेशनल हेल्थ मिशन उत्तराखंड के अधिकारी डॉ कुलदीप सिंह मरतोलिया ने कहा, ‘दुर्गम भौगोलिक इलाकों में हमने टीकाकरण के 100 फीसदी लक्ष्य को हासिल किया है. जैसे कि बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी में 100 फीसदी टीकाकरण हुआ है. कुछ इलाकों में तो डोली पर टीकाकरण कैंप तक लाए गए वरिष्ठ नागरिकों ने वैक्सीनेशन के प्रति बेहद उत्साह का प्रदर्शन किया.’ हालांकि वैक्सीन के प्रति लोगों की हिचक दूर करने के लिए राज्य के अधिकारियों ने मंदिरों और मस्जिदों के धार्मिक नेताओं का सहारा लिया. उन्होंने कहा, ‘मैदानी इलाकों, जैसेकि नैनीताल, उधम सिंह नगर और हरिद्वार में वैक्सीनेशन की रफ्तार पहाड़ी इलाकों के मुकाबले धीमी रही है. कोविड वैक्सीन को प्रमोट करने के लिए पंडित और मौलवी की भी मदद ली गई. वहीं टीके की डोज, लाभ और याद दिलाने के लिए मंदिरों और मस्जिदों से ऐलान किया गया.’

    कश्मीर और लद्दाख; घर-घर पहुंचे और नाइट कैंप लगाए
    कश्मीर में टीकाकरण अभियान के बारे में बात करते हुए एक सरकारी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘श्रीनगर और कश्मीर के कई जिलों में टीकाकरण अभियान द्रुत गति से चल रहा है. लोगों को वैक्सीन की डोज रात को भी लगाई जा रही है. कोशिश है कि बर्फबारी से पहले लोगों को वैक्सीन की दूसरी डोज दे दी जाए. सर्दी के मौसम में कई इलाकों से संपर्क टूट जाता है. जैसे गुरेज इलाके में रात को भी कैंप लग रहे हैं. यही समय होता है, जब कमाऊ सदस्य घर पर होता है. हमारी कोशिश है कि कोई भी छूटने ना पाए.’

    केंद्रशासित प्रदेश के टीकाकरण अभियान में शामिल एक अधिकारी ने कहा, ‘लद्दाख में चुनौतियां बहुत कम थीं, हालांकि जो लोग वैक्सीन को ट्रांसपोर्ट कर रहे थे, उनके लिए यह आसान नहीं था. ऐसे में अधिकारियों को रोटेशन के आधार पर नीचे लाया गया.’ उन्होंने कहा, ‘लद्दाख की आबादी ज्यादा छितरी हुई नहीं है और उन तक पहुंचना आसान है. लोगों में वैक्सीन को लेकर कोई हिचक नहीं थी. और यह पहला केंद्रशासित प्रदेश था, जिसने पहली डोज के मामले में 100 फीसदी कवरेज हासिल किया.’

    अधिकारी ने कहा कि लद्दाख में सिर्फ एक परेशानी थी कि वैक्सीन का तापमान 2 से 8 डिग्री के बीच बनाए रखना था, क्योंकि यहां कुछ इलाकों में तापमान जीरो तक पहुंच जाता है. उन्होंने कहा कि हमने इसके लिए अंडर ग्राउंड स्टोरेज फैसिलिटी का इस्तेमाल किया, वहीं विशेष प्रकार के वाहनों और बॉक्स के जरिए भी वैक्सीन का तापमान मेंटेन किया गया. अन्यथा टीके की खुराक बर्बाद हो सकती थी.

    मेघालय; भाषा की चुनौतियां और वैक्सीन को लेकर हिचक
    मेघालय में अधिकारियों को ना सिर्फ मानसून के चलते बंद इलाकों तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा बल्कि स्थानीय भाषा की चुनौतियां भी झेलनी पड़ीं. राज्य में 50 फीसदी लोगों को वैक्सीन की पहली डोज लगाई गई है. टीकाकरण टीम के साथ काम कर रहे राज्य के एक अधिकारी ने कहा, ‘मिजोरम में लोग मिजो बोलते हैं, असम में असमिया और अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में लोग हिंदी भी बोलते हैं, लेकिन मेघालय में बहुत सारी बोलियां हैं और इससे बातचीत में मुश्किल आती है.’

    उन्होंने कहा, ‘पश्चिमी खासी जिले में लोग खासी बोलते हैं, जैंतिया की पहाड़ियों में नार बोलते हैं और गारो पहाड़ियों में लोग गारो बोलते हैं. गारो, खासी और नार से बिल्कुल अलग है. इसके अलावा स्थानीय लोग कई प्रकार की बोली बोलते हैं, जिसमें भाषाओं का मिश्रण होता है, जैसे असम और बंगाल की सीमा से लगे इलाकों में इन राज्यों की भाषा का मिश्रण होता है.’

    ऐसे में केंद्र सरकार की ओर दी गई सभी जानकारियों को पहले स्थानीय भाषा में ट्रांसलेट किया जाता था, फिर लोगों को बताया जाता था. हालांकि वैक्सीन को लेकर लोगों में व्याप्त हिचक को दूर करने में स्वास्थ्य कर्मियों को सफलता नहीं मिली, क्योंकि अलग-अलग स्थानीय बोलियों में अफवाहें तेजी से फैलतीं और उन्हें तेजी से हैंडल करना आसान नहीं था. और स्थानीय लोग अपने गांव के मुखिया के अलावा किसी पर विश्वास नहीं करते थे.’

    अधिकारी ने कहा, ‘हमारे लिए वैक्सीन की सप्लाई कोई मुद्दा नहीं थी, बल्कि टीकाकरण करवाने वाले लोगों द्वारा रखी जा रही मांग को पूरा करना चैलेंज था.’ उन्होंने कहा कि हम इसका हल ढूंढ़ने पर विचार कर रहे हैं कि किस रणनीति के साथ आगे बढ़ा जाए.

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