COVID-19: क्या होती है एंटीबॉडीज, कोरोना वायरस संक्रमण से लड़ने में कितनी है कारगर

एंटीबॉडी (Anitboides) का काम संक्रमण वाले रोगाणुओं की खोज कर उनकी पहचान करना होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

एंटीबॉडी (Anitboides) का काम संक्रमण वाले रोगाणुओं की खोज कर उनकी पहचान करना होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

एंटीबॉडीज़ (Antibodies) कोरोना संक्रमण से लड़ने में हमारी मदद करता है. ये हमें बीमारी से सुरक्षा प्रदान करता है. जैसे ही हमारा शरीर संक्रमित होता है या हमें वैक्सीन लगाई जाती है तो हमारे इम्यून सिस्टम के ज़रिये एक प्रोटीन तैयार होता है, जिसे एंटीबॉडीज़ कहते हैं.

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नई दिल्‍ली. कोरोना (Corona) के खिलाफ लड़ाई में एंटीबॉडीज (Antibodies) की बहुत बड़ी भूमिका है. एंटीबॉडीज वैक्सीन (vaccine) के ज़रिए या अगर कोई वायरस से संक्रमित (Corona Infection) हुआ है तो उसमें विकसित होती है. इसकी भूमिका वही होती है जो किसी सैनिक की देश की सुरक्षा में होती है. एंटीबॉडीज मानव शरीर के अंदर मौजूद दुश्मनों को ढूंढ कर नेस्तनाबूद करने में विशेषज्ञ सेना होती है.

एंटीबॉडीज़ संक्रमण से लड़ने में हमारी मदद करता है. ये हमें बीमारी से सुरक्षा प्रदान करता है. जैसे ही हमारा शरीर संक्रमित होता है या हमें वैक्सीन लगाई जाती है तो हमारे इम्यून सिस्टम के ज़रिये एक प्रोटीन तैयार होता है, जिसे एंटीबॉडीज़ कहते हैं.

कोरोना वायरस संक्रमण की लड़ाई में एंटीबॉडीज एक अहम हथियार की भूमिका निभाता है. जब कोई कोविड-19 से संक्रमित होता है तो मरीज का शरीर उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है. ये एंटीबॉडीज इम्यूनोग्लोब्यूलिन्स (IgM, IgA and IgG) के नाम से जाने जाते हैं और कोविड-19 के लड़ने में अहम होते हैं. इनमें से हर एक की अपनी अलग भूमिका होती है और हर एक की खून में मौजूदगी पता लगाने में अलग-अलग वक्त लगता है. इनकी अपनी अधिकतम संख्या तक पहुंचने और सिस्टम से जाने में अलग-अलग वक्त लगता है. ज्यादातर कोविड-19 के मरीज जिनमें कोई भी लक्षण नज़र नहीं आता है उनमें IgM का स्तर कम होता है, वहीं गंभीर लक्षण वाले मरीजों में IgA और IgG का स्तर ज्यादा होता है.


एंटीबॉडीज पता करने की जांच

अगर किसी को पहले वायरस संक्रमण हो चुका है तो उसके खून में एंटीबॉडी जांचने के लिए एंटीबॉडी या सीरोलॉजी टेस्ट किया जाता है. अगर किसी को संक्रमण हुआ है तो उसके एंटीबॉडी टेस्ट में कुछ परिणाम नहीं मिलते हैं क्योंकि संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बनने में 1-3 हफ्ते लगते हैं. अगर जांच ठीक से की गई है तो एंटीबॉडी टेस्ट में नेगेटिव आना मतलब जांच करवाने वाले को कभी कोविड-19 नहीं हुआ है. पॉजिटिव रिपोर्ट आना बताता है कि जांच करवाने वाले में एंटीबॉडी मौजूद है यानि वो कोविड-19 से संक्रमित हो चुका है.

कोरोना वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी कब तक टिकती है



रॉकफेलर यूनिवर्सिटी (न्यूयार्क) के एक अध्ययन के मुताबिक जो लोग कोविड-19 से ठीक हो चुके हैं, उनमें वायरस के खिलाफ कम से कम छह महीने या उससे ज्यादा एंटीबॉडी रहती है. एक अध्ययन में पाया गया कि इम्यून सिस्टम वायरस को याद रखता है और लगातार शरीर में एंटीबॉडी की गुणवत्ता को बनाए रखता है, भले ही संक्रमण कमजोर ही क्यों ना हो जाए. एंटीबॉडीज संक्रमण के महीनों बाद भी अपनी क्षमता को बनाए रखते हैं और म्यूटेंट वायरस के खिलाफ भी जंग जारी रखता है. इस खोज में पाया गया है कि कि जब ठीक हुए मरीज पर दूसरी बार वायरस का हमला होता है तो दोबारा संक्रमण को रोकने के लिए शरीर तेजी से प्रतिक्रिया देता है.


शोध में दावा जीवनभर शरीर में रहती है एंटीबॉडी

सेंट लुइस के वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं का कहना है कि एंटीबॉडी ताउम्र के लिए शरीर में रहती है. उनका कहना है कि यहां तक कोविड-19 के हल्के संक्रमण वाले मरीजों के ठीक होने के कई महीनों बाद भी उनमें इम्यून सेल्स मौजूद रहती है जो उनके शरीर की एंटीबॉडी को बाहर निकालने में मदद करता है. ऐसी कोशिकाएं जीवन भर शरीर में रह सकती हैं और इस दौरान एंटीबॉडी को भी निकालती रहती है. ये अध्ययन जरनल नेचर में मई 24 को प्रकाशित हुआ था. इस जरनल के वरिष्ठ लेखक अली एलेबेदी, पीएचडी, जो पैथोलॉजी एंड इम्यूनोलॉजी ऑफ मेडिसिन एंड मोलेक्यूलर बायलॉजी के असोसियेट प्रोफेसर हैं उनका कहना है कि अचानक हुए संक्रमण से एंटीबॉडी का नीचे जाना आम बात हैं लेकिन वो जीरो पर नहीं जाती है. उनका कहना है कि शोध में पता चला है कि वायरस संक्रमण के 11 महीने बाद तक शरीर में एंटीबॉडी बनना पाई गई है.

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फिर से संक्रमण होने पर कैसे काम करती है एंटीबॉडी

जब हमारा शरीर वायरस से संक्रमित होता है, एंटीबॉडी तेजी से इम्यून सेल्स यानि कोशिका का गुणन करती है और उसे खून में प्रवाहित करने लगती है, इस तरह से एंटीबॉडी का स्तर बड़ जाता है. अध्ययन बताता है कि एक बार जब संक्रमण ठीक हो जाता है तो ज्यादातर कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं, खून में एंटीबॉडी का स्तर गिर जाता है. एंटीबॉडी की कम मात्रा में कोशिकाएं,जिन्हें लंबे वक्त तक जीने वाली प्लाज्मा सेल्स कहते हैं, ये प्लाज्मा सेल्स अस्थि मज्जा यानि बोन मैरो में पहुंच जाता है, जहां से बहुत कम मात्रा में एंटीबॉडी का रिसाव होता रहता है और ये एंटीबॉडी शरीर में प्रवाहित खून के ज़रिये वायरस के खिलाफ अगली लड़ाई के लिए तैयार रहता है.

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अगले एक दशक में सर्दी जुखाम की तरह रह जाएगा वायरस

यूनिवर्सिटी ऑफ उताह की एक जरनल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, अगले एक दशक में कोरोनावायरस जो कोविड-19 के लिए ज़िम्मेदार है, वो महज़ सर्दी जुखाम की तरह रह जाएगा. खोज बताती है कि आने वाले वक्त में वायरस खुद में बदलाव नहीं करेगा बल्कि हमारा इम्यून सिस्टम खुद को उसके हिसाब से ढाल लेगा. गणितीय मॉडल से वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए भविष्य का एक खाका खींचा गया है कि किस तरह वक्त के साथ हमारे शरीर में बदलाव देखे जाएंगे. मॉडल बताता है कि ज्यादातर वयस्क संक्रमण या वैक्सीन के ज़रिये आंशिक तौर पर इम्यून हो चुके होंगे, गंभीर संक्रमण अगले एक दशक में लगभग गायब हो जाएगा. अंत में वायरस का जो पहली बार सामना करेंगे वो बच्चे होंगे और वो प्राकृतिक तौर पर गंभीर बीमारी से सुरक्षित हैं. वहीं येल वैज्ञानिकों का मानना है कि इम्यून सिस्टम का बदलना कोविड -19 के गंभीर मामलों में सबसे बड़ा कारण है. उनका कहना है कि एंटीबॉडी का विकसित होना जहां कोविड-19 वायरस के खिलाफ जंग में सबसे बड़ी उम्मीद हैं. वहीं कुछ मरीजों में देखा गया है कि यही एंटीबॉडी मरीज के शरीर के कोशिकाओं और ऊतकों को ही नुकसान पहुंचाने लगती है. कई मामलों में कोरोनावायरस की उपस्थिति की वजह से ऑटो एंटीबॉडी बनने लगती है जो शरीर को ही नुकसान पहुंचाती हैं.

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वैक्सीन लगने के बाद क्या होगा ?

भारत में अब तक लोगों को कोविशील्ड और कोवैक्सिन का इंजेक्‍शन दिया गया है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक बलराम भार्गव का कहना है कि जिन लोगों को कोविशील्ड का पहला डोज लग चुका है उनके शरीर में अच्छे स्तर पर एंटीबॉडी देखी गई है. हालांकि कोवैक्सीन के मामले में पर्याप्त इम्यून रिस्पांस दूसरे डोज के बाद ही आएगा. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के लेंसेट में प्रकाशित अध्ययन में दावा किया गया है कि जिन्हें पहले से कोविड -19 हो चुका है उनके लिए आरएनए वैक्सीन का एक ही डोज पर्याप्त होगा. ऐसा देखने को मिला है कि फाइजर और बायो एन टेक के आरएनए वैक्सीन (यूके से पारित) के सिंगल डोज़ के जिन्हें पहले से इन्फेक्शन नहीं हुआ था उनकी तुलना में जिन्हें इन्फेक्शन हो चुका है उनमें वायरस के खिलाफ अच्छे नतीजे देखने को मिले हैं. ये खोज भविष्य में टीकाकरण के मामले में काफी अहम साबित हो सकती है और इससे तय होगा कि पहले उन्हें प्राथमिकता दी जाए जो संक्रमित नहीं हुए हैं.

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