अपने बच्चे को आखिरी बार गले तक नहीं लगा पाया कोविड मरीजों की देखभाल कर रहा ये वॉर्ड बॉय

अपने बच्चे को आखिरी बार गले तक नहीं लगा पाया कोविड मरीजों की देखभाल कर रहा ये वॉर्ड बॉय
बच्‍ची की पहचान राधिका के तौर पर हुई है. हादसे के वक्‍त वह पार्किंग एरिया में खेल रही थी. (प्रतिकात्मक तस्वीर)

मनीष कहते हैं- "मैं लड़के को गले भी नहीं लगा पाया. स्पेशल परमीशन लेकर मैं पीपीई किट (PPE Kit( पहनकर एक एंबुलेंस से केजीएमयू (KGMU) गया. वहां भी मैं अपने परिवार के पास नहीं जा सका. मैंने दूर से सिर्फ अपने बच्चे को आखिरी बार देखा."

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नई दिल्ली. मनीष कुमार त्यागी लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल में वॉर्ड बॉय के तौर पर कोविड-19 (Covid-19) के मरीजों की देखभाल करते हैं. लेकिन पिछले हफ्ते वह एक ऐसे हादसे से गुजरे जिसे वह जीवन भर नहीं भूल सकेंगे. मनीष के तीन साल के बच्चे की पिछले सप्ताह मौत हो गई और वह उसे गले तक नहीं लगा सके.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ (Lucknow) के लोकबंधु अस्पताल (Lokbandhu Hospital) जहां कोरोना वायरस (Coronavirus) के मरीजों का इलाज चल रहा है में काम करने वाले मनीष के अपने स्टाफ के बाकी साथियों की तरह 14 दिन के लिए पास के ही होटल में क्वारंटाइन के लिए चले गए. ये कवायद कोविड-19 का इलाज कर रहे सभी अस्पताल अपने स्टाफ के साथ कर रहे हैं.

अस्पतालों ने एडमिट करने से किया इनकार
मनीष कहते हैं- "रात के कोई 9 बजे होंगे कि मेरी पत्नी का मुझे फोन आया कि हमारा बच्चा बीमार है. वह उल्टियां कर रहा था और किसी पेट के संक्रमण के चलते उसकी तबियत खराब हो गई थी. मैं थोड़ी ही मदद कर सकता था, लेकिन परिवार के लोग पड़ोसी की मदद से जो कि टैक्सी चालक हैं बच्चे को चिनहट स्थित पास के अस्पताल ले गए. अस्पताल ने मेरे बच्चे को एडमिट करने से इनकार कर दिया इसके बाद परिवार वाले उसे आलमबाग के एक अस्पताल लेकर गए वहां भी उसे एडमिट करने से मना कर दिया गया."
"इसके बाद मेरी पत्नी उसे लेकर किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लेकर गईं. इस समय तक मैंने अस्पताल के अपने सीनियर्स को फोन कर दिया था जिन्होंने केजीएमयू में डॉक्टर्स को फोन कर तुरंत मेरे बेटे का इलाज करने के लिए कहा लेकिन तब तक बहुत समय निकल चुका था."



कोरोना पॉजिटिव नहीं था बेटा
उनके बेटे को कोरोना वायरस संक्रमण नहीं था. मनीष को लगता है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के संदेह में प्राइवेट अस्पतालों ने उनके बेटे को भर्ती करने से इंकार कर दिया.

मनीष ने कहा - कोई इमरजेंसी की स्थिति में किसी बच्चे का इस्तेमाल करने से कैसे मना कर सकता है.

'आखिरी बार गले तक नहीं लगा पाया'
मनीष कहते हैं- "मैं लड़के को गले भी नहीं लगा पाया. स्पेशल परमीशन लेकर मैं पीपीई किट पहनकर एक एंबुलेंस से केजीएमयू गया. वहां भी मैं अपने परिवार के पास नहीं जा सका. मैंने दूर से सिर्फ अपने बच्चे को आखिरी बार देखा. अगले दिन सुबह बच्चे को लखनऊ के पास ही हमारे गांव में दफना दिया गया."

मनीष ने कहा मैं अभी भी इस बात से उबर नहीं पा रहा हूं कि अगर प्राइवेट अस्पतालों ने उसका इलाज कर दिया होता तो वह आज जिंदा होता.

ड्यूटी पर लौट नहीं सके हैं मनीष
मनीष का क्वारंटाइन तो खत्म हो गया है लेकिन वह अभी भी अपनी ड्यूटी पर नहीं जा पाए हैं क्योंकि उनकी पत्नी इस सदमे से नहीं उबर पा रही हैं.

मनीष कहते हैं कि "मेरी पत्नी लगातार रोती जा रही है. मैंने हमेशा अपने परिवार के आगे अपने काम को तरजीह दी. कुछ दिन पहले ही मैंने अपने पिता को खोया है और अब यह. मुझे नहीं पता कि आगे जीवन क्या रूप लेगा."

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि वह लगातार अपने वॉर्ड बॉय मनीष के संपर्क में हैं जो कि पिछले चार सालों से कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं. वह फरवरी से कोविड ड्यूटी कर रहे हैं.

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