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Opinion: पश्चिम बंगाल में TMC के किले में आईं दरारें, जिसका लाभ उठा रही है बीजेपी

ममता बनर्जी (फ़ाइल फोटो)
ममता बनर्जी (फ़ाइल फोटो)

Bengal Assembly Election 2021: हाल के वर्षों में आरएसएस से जुड़े विद्या भारती और शारदा विद्या मंदिर स्कूलों का राज्य में विस्तार हुआ है. इसके अलावा लगभग हर ब्लॉक में संघ की शाखा भी फैल रही है. हाल ही में उत्तर दिनाजपुर के अलग-अलग ब्लॉकों जैसे कि करानदीघी, हेमताबाद और रायगंज में नई शाखा शुरू हुई हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 5, 2021, 11:40 AM IST
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तरुशिखा सर्वेश और सोहेल अख्तर


पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव (Bengal Assembly Election 2021) से पहले राजनीतिक प्रतिशोध की एक संस्कृति देखने को मिल रही है. हाल ही में बंगाल में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ. इसके बाद बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच बहस शुरू हो गई. इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने काफिले पर हमले के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया. अब कुछ लोग इस निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि ममता अकेले अपने बयानों से बीजेपी को चुनौती दे सकती हैं.

पश्चिम बंगाल की समृद्ध संस्कृति 'सोनार बांग्ला' के मूल विचार का विस्तार रवींद्रनाथ टैगोर, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, राम मोहन राय और सत्यजीत रे जैसों ने किया. लेकिन अब भाजपा प्रमुख और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, कैलाश विजयवर्गीय, इस धरोहर को कुछ अलग तरह से बदलने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं.
हाल के वर्षों में, आरएसएस से जुड़े विद्या भारती और शारदा विद्या मंदिर स्कूलों का राज्य में विस्तार हुआ है. इसके अलवा लगभग हर ब्लॉक में संघ की शाखा भी फैल रही है. हाल ही में उत्तर दिनाजपुर के अलग-अलग ब्लॉकों जैसे कि करानदीघी, हेमताबाद और रायगंज में नई शाखा शुरू हुई हैं. इसके अलावा राज्य में बीजेपी की दूसरी नीति ये है कि वो ऐसे लोगों के करीब पहुंचने की कोशिश कर रही है जो टीएमसी शासन से नाखुश हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) के तहत नियुक्तियों को फिर से शुरू करके मतदाताओं के लिए नौकरियों का वादा किया है. इसके तहत राज्य सरकार ने जनवरी 2021 तक आयोग के तहत लगभग 3 लाख उम्मीदवारों की भर्ती को अधिसूचित किया, जो तीन वर्षों से रुकी हुई थीं.



संथाली-माध्यम सरकारी सहायता प्राप्त / प्रायोजित स्कूलों के लिए एक अलग अधिसूचना भी जारी की गई थी. ये बीजेपी को अनुसूचित जनजातियों के बीच पर्याप्त आधार को बनाए रखने में मदद कर सकता है. राज्य में शिक्षित बेरोजगार युवाओं के बीच रुकी हुई SSC भर्तियों ने जबरदस्त गुस्सा पैदा किया है. भाजपा ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में उसका समर्थन पैसे या बाहुबल के कारण नहीं बढ़ रहा है, बल्कि बेरोजगारी के कारण बढ़ रहा है. हाल ही में अमित शाह के भाषण ने इस ओर इशारा भी किया था.

अब लोग सवाल पूछ रहे हैं, क्या कोई शख्स जो गैर-बंगाली है वो बंगाल की राजनीति और संस्कृति को बदल सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या टीएमसी बीजेपी का मुकाबला कर सकती है. साल 2011 से बंगाल में राजनीतिक विचारधारा बदल गई है. खासकर राज्य में सीपीआई (एम) के सत्ता से हटने के बाद चीजें बदल गई हैं. मतदाताओं के लिए एक राजनीतिक दल के साथ बने रहने के लिए बहुत कम प्रोत्साहन-नैतिक, राजनीतिक या वित्तीय है. पश्चिम बंगाल में संसाधनों की सामान्य कमी है. बीजेपी इसी को बदलना चाहती है.

उत्तर दिनाजपुर के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'भाजपा चाहे जो भी राजनीतिक रणनीति अपनाए, बंगाल में ममता बनर्जी ही जीतेंगी. ममता रातों रात नेता नहीं बनी हैं उन्होंने वर्षों संघर्ष किया है. आने वाले चुनाव में इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा.'


साल 2011 में एआईटीसी-कांग्रेस गठबंधन को विधानसभा की 294 सीटों में से 227 सीटों पर जीत मिली थी. शुभम शील, बालुरघाट के एक युवक (भाजपा का एक मजबूत इलाका और जिसका संसद सदस्य बीजेपी से है) का कहना है कि कोविड -19 लॉकडाउन के कारण उसके परिवार ने अपने ट्रैक्टर-पार्ट्स की दुकान खो दी. वो अब अपने इलाके में बदलाव चाहते हैं. उनका मानना है कि मोदी शासन राज्य को बेहतर तरीके से चलाने में मदद कर सकता है. इस क्षेत्र के लोगों का मानना है कि टीएमसी यहां बड़े पैमाने पर अमीर या अच्छी तरह से स्थापित पुराने राजनीतिक सहयोगियों को जगह देती है. इसके विपरीत, एक अन्य युवा, शुभम घोष, एक अच्छे परिवार से और जिसका चाचा टीएमसी से जुड़ा हुआ है, का कहना है, 'ममता भले ही एक महिला हों, लेकिन वो मोदी से बेहतर पीएम हो सकती हैं.'

राज्य में वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य विशेषाधिकार प्राप्त और वंचितों के बीच एक गहरे और बढ़ते विभाजन का संकेत है. बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत के बाद कटिहार से चार बार जीतने वाले विधायक तारकिशोर प्रसाद को बिहार का उपमुख्यमंत्री बना दिया. दरअसल कटिहार की सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है. ऐसे में बिहारी बंगालियों को लुभाने की कोशिश की गई है. जो ज्यादातर कोलकाता, हुगली, हावड़ा और आसनसोल जिलों में रहते हैं.


रायगंज में मधुपुर के विवश कुमार दास चाहते हैं कि उनका वोट बीजेपी को जाए. जबकि उनके पिता वामपंथियों के साथ हैं. विवश सरकारी नौकरी पाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अभी तक उन्हें कामयाबी नहीं मिली है. इसलिए वो टीएमसी के खिलाफ हैं. बिहार में भाजपा की हालिया जीत ने भी उसे प्रभावित किया है. उत्तर दिनाजपुर का रायगंज शहर कभी कांग्रेस का गढ़ था, जहां से दीपा दासमुंशी संसद सदस्य थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में, माकपा के मोहम्मद सलीम ने कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों को यहां से हराया. वो 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के देबाश्री चौधरी से हार गए. तब से भाजपा की पैठ यहां बढ़ती जा रही है.

भाजपा उत्तर बंगाल में चाय बागान मजदूरों का भी मुद्दा उठा रही है. इन मजदूरों ने राज्य सरकार के सामने अपनी मांगे रखी हैं लेकिन अब तक इनकी बातें ठीक तरीके से नहीं सुनी गई हैं. भाजपा के स्थानीय नेता उन क्षेत्रों में भी प्रचार कर रहे हैं जहां अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के सदस्य रहते हैं. बीजेपी ने यहां कहा है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो राज्य में एनआरसी लागू किया जाएगा. मुसलमानों के स्वामित्व वाली भूमि फिर उनके हाथों में आ सकती हैं.


कांग्रेस पार्टी की स्थिति लगातार टीएमसी और भाजपा की लोकप्रियता से खराब हो रही है. उत्तर दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद और मालदा को कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था क्योंकि इसमें दासमुंशी, गनी खान चौधरी और अधीर रंजन चौधरी जैसे दिग्गज नेताओं का दबदबा रहा है. खान और दासमुंशी के निधन से कांग्रेस अपनी जड़ों से हिल गई है. 2014 के लोकसभा चुनाव में वह राज्य में केवल चार सीटें ही जीत सकी. अब उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर, और मध्य और उत्तर बंगाल के अन्य हिस्सों जैसे मालदा उत्तर, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, कूच बिहार, बालुरघाट, अलीपुरद्वार और पूर्वी बर्धमान में भाजपा ऐसी सीटें जीत रही है जहां दलित और आदिवासी मतदाताओं की अहम मौजूदगी है.

2018 में हुए पंचायत चुनावों में, कई मतदान केंद्रों में टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा बूथ-कैप्चरिंग की खबरें आईं. सीपीआई (एम) और कांग्रेस नेताओं को धमकियां भी मिलीं. कई सीटों पर, वाम मोर्चा के समर्थकों को अपना वोट डालने नहीं दिया गया. हताशा में उन्होंने टीएमसी की आक्रामक राजनीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा को वोट दिया. फिर भी, टीएमसी द्वारा 18,652 ग्राम पंचायतों, 1,570 पंचायत समिति और 2018 में 19 जिला परिषद सीटों के बाद ममता सरकार की मजबूत पकड़ है.

ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी चुनाव में एक फैक्टर बन कर उभरे हैं. पार्टी पर उनकी गहरी पकड़ है, लेकिन इससे टीएमसी के दिग्गज नेता उनसे ज्यादा खुश नहीं हैं. हाल ही में, सुनील कुमार मंडल ने कहा कि पोल रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम वरिष्ठ नेताओं और 'उन्हें राजनीति सिखाने का दबाव बना रही है. निष्पक्ष होने के लिए, धारणा यह है कि जो लोग भाजपा के लिए टीएमसी छोड़ रहे हैं, वे कथित रूप से चिट फंड घोटाले में शामिल हैं, जैसा कि सुवेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय के साथ देखा जाता है.

माना जाता है कि अगर टीएमसी ने राजनीतिक विपक्ष के रूप में वाम दलों को अधिक स्थान दिया होता, तो हालात काफी अलग होते. भाजपा का उदय ज्यादातर उत्तर बंगाल में हुआ है. संयोगवश, मुस्लिम आबादी उत्तरी क्षेत्रों में केंद्रित है, जो भाजपा की राजनीति को बढ़ावा दे सकती है.

(तरुशिखा सर्वेश, एडवांस्ड सेंटर फॉर वुमेन स्टडीज, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफेसर हैं और सोहेल अख्तर सेंटर फॉर हेल्थ एंड मेंटल हेल्थ साइंसेज, TISS मुंबई और बंगाल और बिहार में एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ये इन दोनों के निजी विचार हैं.)
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